हिंदी साहित्य की अमर धरोहर • छायावाद विशेषांक
आंसू : जयशंकर प्रसाद (Aansu : Jaishankar Prasad) — सम्पूर्ण कविता, गहन भावार्थ, शिल्प-सौंदर्य और दार्शनिक विश्लेषण
क्या एक इंसान का निजी टूटा हुआ दिल पूरे संसार के दुःखों की आवाज़ बन सकता है? जब महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपने जीवन के सबसे अंधेरे दौर में कलम उठाई, तो पन्नों पर स्याही नहीं, बल्कि 'आंसू' गिरे।
यह केवल एक विरह-काव्य नहीं है, बल्कि हिंदी साहित्य का वह मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक मोड़ है, जहाँ व्यक्तिगत वेदना तपकर 'विश्व-कल्याण' की शीतल ओस में बदल जाती है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम 'आंसू' के सम्पूर्ण मूल पाठ (Word-by-Word Full Text) के साथ-साथ इसके कठिन शब्दार्थ, व्याकरण, छंद-विधान, समकालीन राजनीतिक-दार्शनिक संदर्भ और परीक्षा उपयोगी प्रश्नों का गहन विश्लेषण करेंगे।
⚡ त्वरित सारांश (TL;DR — एक नज़र में 'आंसू')
- मूल संवेदना: स्मृति के माध्यम से जागृत हुई विरह-वेदना, जो अंततः स्वार्थ से उठकर लोक-मंगल (समष्टि चेतना) में परिणत होती है।
- ऐतिहासिक विकास: प्रथम संस्करण (1925 ई.) में 126 छंद थे जो घोर नैराश्यपूर्ण थे; द्वितीय परिमार्जित संस्करण (1933 ई.) में 190 छंदों के साथ आनंदवाद और आशावाद जोड़ा गया।
- काव्य रूप एवं छंद: यह एक 'प्रगीत मुक्तक' या 'स्मृति-काव्य' (Elegiac Lyric) है, जो 14-14 मात्राओं की यति वाले 28 मात्राओं के 'आंसू छंद' (सखी छंद) में रचित है।
- दार्शनिक आधार: बौद्ध करुणावाद, सूफी प्रेम-तत्त्व और कश्मीरी शैव दर्शन (प्रत्यभिज्ञा दर्शन) का अद्भुत समन्वय।
| काव्य तत्व (Attribute) | विवरण (Details) |
|---|---|
| कृति का नाम | आंसू (Aansu) |
| रचयिता | महाकवि जयशंकर प्रसाद (1889–1937 ई.) |
| साहित्यिक युग | छायावाद (Chhayavad Era) |
| प्रकाशन वर्ष | प्रथम संस्करण: 1925 ई. | द्वितीय परिमार्जित संस्करण: 1933 ई. |
| प्रधान रस एवं गुण | वियोग शृंगार (विप्रलंभ शृंगार) एवं करुण रस | माधुर्य एवं प्रसाद गुण |
| प्रमुख अलंकार | विरोधाभास, मानवीकरण, रूपक, उपमा, रूपकातिशयोक्ति, अनुप्रास |
| भाषा एवं शब्द-शक्ति | तत्सम-प्रधान लाक्षणिक खड़ी बोली | लक्षणा एवं व्यंजना शब्द-शक्ति |
छायावाद के स्तंभ महाकवि जयशंकर प्रसाद, जिनकी लेखनी ने व्यक्तिगत अश्रुओं को विश्व-वेदना का दर्पण बना दिया।
'आंसू' की रचना-प्रक्रिया, समकालीन राजनीति और दार्शनिक प्रेरणा
'आंसू' को केवल एक प्रेमी के विलाप के रूप में पढ़ना इसके साथ अन्याय होगा। 20वीं सदी के तीसरे दशक (1920–1930) का भारत एक गहरे सांस्कृतिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक मंथन के दौर से गुज़र रहा था। एक ओर महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के स्थगन के बाद देश के युवाओं में एक वैचारिक उथल-पुथल थी, तो दूसरी ओर हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग की कोरी उपदेशात्मकता (इतिवृत्तात्मकता) के विरुद्ध व्यक्ति की आंतरिक संवेदना का विद्रोह फूट रहा था, जिसे 'छायावाद' कहा गया।
जयशंकर प्रसाद का व्यक्तिगत जीवन भी त्रासदियों की एक लंबी श्रृंखला था—अल्प आयु में माता-पिता और बड़े भाई शंभू रत्न का निधन, गृहकलह, ऋण का बोझ और दो पत्नियों का असमय विछोह। किंतु प्रसाद जी ने अपनी इस घनीभूत पीड़ा को जयशंकर प्रसाद के साहित्यिक दर्शन के अनुरूप आत्म-दया में सिमटने नहीं दिया।
🔍 1925 बनाम 1933 का संस्करण : आलोचकों को प्रसाद का ऐतिहासिक उत्तर
जब 1925 में 'आंसू' का प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ, तब समकालीन आलोचकों ने छायावाद पर 'पलायनवाद' और 'व्यक्तिवादी निराशा' का आरोप लगाया। प्रसाद जी ने 1933 के द्वितीय संस्करण में कविता की संरचना में क्रांतिकारी बदलाव किया। उन्होंने इसमें बौद्ध करुणा (सर्वं दुःखं से सर्व-कल्याण), सूफी तसव्वुफ़ (इश्क़-ए-मजाज़ी से इश्क़-ए-हक़ीक़ी) और कश्मीरी शैव दर्शन (आनंदवाद) का समावेश कर यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची वेदना मनुष्य को कायर नहीं बनाती, बल्कि उसे संपूर्ण मानवता के दुःख से जोड़कर संवेदनशील और कर्मठ बनाती है।
जिस प्रकार महाकवि निराला ने अपनी पुत्री के देहावसान के निजी शोक को सरोज स्मृति में सामाजिक पाखंड के विरुद्ध एक कालजयी शोकगीत बना दिया, और राम की शक्ति पूजा में हताशा पर शक्ति की विजय दिखाई, ठीक उसी प्रकार प्रसाद जी ने 'आंसू' को वैयक्तिक पीड़ा से उठाकर विश्व-चेतना के शिखर पर स्थापित किया। प्रसाद जी की अन्य समस्त रचनाओं का संदर्भ आप हिन्दवी के जयशंकर प्रसाद संकलन पर भी देख सकते हैं।
आंसू : जयशंकर प्रसाद — सम्पूर्ण कविता (Complete Original Text)
नीचे महाकवि जयशंकर प्रसाद रचित 'आंसू' का सम्पूर्ण मूल पाठ दिया गया है। पाठकों और शोधार्थियों की सुविधा के लिए हमने इसके प्रवाह को पाँच वैचारिक सोपानों (पड़ावों) में विभाजित किया है, ताकि आप कविता के मनोवैज्ञानिक विकास को पंक्ति-दर-पंक्ति महसूस कर सकें:
प्रथम सोपान : करुणा कलित हृदय और स्मृतियों का विरह-ज्वार
इस करुणा कलित हृदय में
अब विकल रागिनी बजती
क्यों हाहाकार स्वरों में
वेदना असीम गरजती?
मानस सागर के तट पर
क्यों लोल लहर की घातें
कल कल ध्वनि से हैं कहती
कुछ विस्मृत बीती बातें?
आती हैं शून्य क्षितिज से
क्यों लौट प्रतिध्वनि मेरी
टकराती बिलखाती-सी
पगली-सी देती फेरी?
क्यों व्यथित व्योम गंगा-सी
छिटका कर दोनों छोरें
चेतना तरंगिनी मेरी
लेती हैं मृदल हिलोरें?
बस गयी एक बस्ती हैं
स्मृतियों की इसी हृदय में
नक्षत्र लोक फैला है
जैसे इस नील निलय में।
ये सब स्फुलिंग हैं मेरी
इस ज्वालामयी जलन के
कुछ शेष चिह्न हैं केवल
मेरे उस महा मिलन के।
शीतल ज्वाला जलती हैं
ईधन होता दृग जल का
यह व्यर्थ साँस चल-चल कर
करती हैं काम अनिल का।
बाड़व ज्वाला सोती थी
इस प्रणय सिन्धु के तल में
प्यासी मछली-सी आँखें
थी विकल रूप के जल में।
बुलबुले सिन्धु के फूटे
नक्षत्र मालिका टूटी
नभ मुक्त कुन्तला धरणी
दिखलाई देती लूटी।
छिल-छिल कर छाले फोड़े
मल-मल कर मृदुल चरण से
धुल-धुल कर बह रह जाते
आँसू करुणा के कण से।
इस विकल वेदना को ले
किसने सुख को ललकारा
वह एक अबोध अकिंचन
बेसुध चैतन्य हमारा।
अभिलाषाओं की करवट
फिर सुप्त व्यथा का जगना
सुख का सपना हो जाना
भींगी पलकों का लगना।
इस हृदय कमल का घिरना
अलि अलकों की उलझन में
आँसू मरन्द का गिरना
मिलना निश्वास पवन में।
मादक थी मोहमयी थी
मन बहलाने की क्रीड़ा
अब हृदय हिला देती है
वह मधुर प्रेम की पीड़ा।
सुख आहत शान्त उमंगें
बेगार साँस ढोने में
यह हृदय समाधि बना हैं
रोती करुणा कोने में।
चातक की चकित पुकारें
श्यामा ध्वनि सरल रसीली
मेरी करुणार्द्र कथा की
टुकड़ी आँसू से गीली।
अवकाश भला हैं किसको,
सुनने को करुण कथाएँ
बेसुध जो अपने सुख से
जिनकी हैं सुप्त व्यथाएँ
जीवन की जटिल समस्या
हैं बढ़ी जटा-सी कैसी
उड़ती हैं धूल हृदय में
किसकी विभूति हैं ऐसी?
जो घनीभूत पीड़ा थी
मस्तक में स्मृति-सी छायी
दुर्दिन में आँसू बनकर
वह आज बरसने आयी।
मेरे क्रन्दन में बजती
क्या वीणा, जो सुनते हो
धागों से इन आँसू के
निज करुणापट बुनते हो।
रो-रोकर सिसक-सिसक कर
कहता मैं करुण कहानी
तुम सुमन नोचते सुनते
करते जानी अनजानी।
मैं बल खाता जाता था
मोहित बेसुध बलिहारी
अन्तर के तार खिंचे थे
तीखी थी तान हमारी
झंझा झकोर गर्जन था
बिजली थी सी नीरदमाला,
पाकर इस शून्य हृदय को
सबने आ डेरा डाला।
घिर जाती प्रलय घटाएँ
कुटिया पर आकर मेरी
तम चूर्ण बरस जाता था
छा जाती अधिक अँधेरी।
द्वितीय सोपान : प्रियतम का आगमन, नख-शिख सौंदर्य और मिलन-स्मृति
बिजली माला पहने फिर
मुसक्याता था आँगन में
हाँ, कौन बरस जाता था
रस बूँद हमारे मन में?
तुम सत्य रहे चिर सुन्दर!
मेरे इस मिथ्या जग के
थे केवल जीवन संगी
कल्याण कलित इस मग के।
कितनी निर्जन रजनी में
तारों के दीप जलाये
स्वर्गंगा की धारा में
उज्जवल उपहार चढायें।
गौरव था , नीचे आये
प्रियतम मिलने को मेरे
मै इठला उठा अकिंचन
देखे ज्यों स्वप्न सवेरे।
मधु राका मुसक्याती थी
पहले देखा जब तुमको
परिचित से जाने कब के
तुम लगे उसी क्षण हमको।
परिचय राका जलनिधि का
जैसे होता हिमकर से
ऊपर से किरणें आती
मिलती हैं गले लहर से।
मै अपलक इन नयनों से
निरखा करता उस छवि को
प्रतिभा डाली भर लाता
कर देता दान सुकवि को।
निर्झर-सा झिर झिर करता
माधवी कुंज छाया में
चेतना बही जाती थी
हो मन्त्र मुग्ध माया में।
पतझड़ था, झाड़ खड़े थे
सूखी-सी फूलवारी में
किसलय नव कुसुम बिछा कर
आये तुम इस क्यारी में।
शशि मुख पर घूँघट डाले
अंचल में चपल चमक-सी
आँखों मे काली पुतली
पुतली में श्याम झलक-सी।
प्रतिमा में सजीवता-सी
बस गयी सुछवि आँखों में
थी एक लकीर हृदय में
जो अलग रही लाखों में।
माना कि रूप सीमा हैं
सुन्दर! तव चिर यौवन में
पर समा गये थे, मेरे
मन के निस्सीम गगन में।
लावण्य शैल राई-सा
जिस पर वारी बलिहारी
उस कमनीयता कला की
सुषमा थी प्यारी-प्यारी।
बाँधा था विधु को किसने
इन काली जंजीरों से
मणि वाले फणियों का मुख
क्यों भरा हुआ हीरों से?
काली आँखों में कितनी
यौवन के मद की लाली
मानिक मदिरा से भर दी
किसने नीलम की प्याली?
तिर रही अतृप्ति जलधि में
नीलम की नाव निराली
कालापानी वेला-सी
हैं अंजन रेखा काली।
अंकित कर क्षितिज पटी को
तूलिका बरौनी तेरी
कितने घायल हृदयों की
बन जाती चतुर चितेरी।
कोमल कपोल पाली में
सीधी सादी स्मित रेखा
जानेगा वही कुटिलता
जिसमें भौं में बल देखा।
विद्रुम सीपी सम्पुट में
मोती के दाने कैसे
हैं हंस न, शुक यह, फिर क्यों
चुगने की मुद्रा ऐसे?
विकसित सरसित वन-वैभव
मधु-ऊषा के अंचल में
उपहास करावे अपना
जो हँसी देख ले पल में!
मुख-कमल समीप सजे थे
दो किसलय से पुरइन के
जलबिन्दु सदृश ठहरे कब
उन कानों में दुख किनके?
थी किस अनंग के धनु की
वह शिथिल शिंजिनी दुहरी
अलबेली बाहुलता या
तनु छवि सर की नव लहरी?
चंचला स्नान कर आवे
चंद्रिका पर्व में जैसी
उस पावन तन की शोभा
आलोक मधुर थी ऐसी!
छलना थी, तब भी मेरा
उसमें विश्वास घना था
उस माया की छाया में
कुछ सच्चा स्वयं बना था।
वह रूप रूप ही केवल
या रहा हृदय भी उसमें
जड़ता की सब माया थी
चैतन्य समझ कर मुझमें।
मेरे जीवन की उलझन
बिखरी थी उनकी अलकें
पी ली मधु मदिरा किसने
थी बन्द हमारी पलकें।
ज्यों-ज्यों उलझन बढ़ती थी
बस शान्ति विहँसती बैठी
उस बन्धन में सुख बँधता
करुणा रहती थी ऐंठी।
हिलते द्रुमदल कल किसलय
देती गलबाँही डाली
फूलों का चुम्बन, छिड़ती
मधुप की तान निराली।
मुरली मुखरित होती थी
मुकुलों के अधर बिहँसते
मकरन्द भार से दब कर
श्रवणों में स्वर जा बसते।
परिरम्भ कुम्भ की मदिरा
निश्वास मलय के झोंके
मुख चन्द्र चाँदनी जल से
मैं उठता था मुँह धोके।
थक जाती थी सुख रजनी
मुख चन्द्र हृदय में होता
श्रम सीकर सदृश नखत से
अम्बर पट भीगा होता।
सोयेगी कभी न वैसी
फिर मिलन कुंज में मेरे
चाँदनी शिथिल अलसायी
सुख के सपनों से तेरे।
तृतीय सोपान : निष्ठुर विछोह, बुझता दीपक और जीवन-मरुस्थल
लहरों में प्यास भरी है
है भँवर पात्र भी खाली
मानस का सब रस पी कर
लुढ़का दी तुमने प्याली।
किंजल्क जाल हैं बिखरे
उड़ता पराग हैं रूखा
हैं स्नेह सरोज हमारा
विकसा, मानस में सूखा।
छिप गयी कहाँ छू कर वे
मलयज की मृदु हिलोरें
क्यों घूम गयी हैं आ कर
करुणा कटाक्ष की कोरें।
विस्मृति हैं, मादकता हैं
मूचर्छना भरी हैं मन में
कल्पना रही, सपना था
मुरली बजती निर्जन में।
हीरे-सा हृदय हमारा
कुचला शिरीष कोमल ने
हिमशीतल प्रणय अनल बन
अब लगा विरह से जलने।
अलियों से आँख बचा कर
जब कुंज संकुचित होते
धुँधली संध्या प्रत्याशा
हम एक-एक को रोते।
जल उठा स्नेह, दीपक-सा,
नवनीत हृदय था मेरा
अब शेष धूमरेखा से
चित्रित कर रहा अँधेरा।
नीरव मुरली, कलरव चुप
अलिकुल थे बन्द नलिन में
कालिन्दी वही प्रणय की
इस तममय हृदय पुलिन में।
कुसुमाकर रजनी के जो
पिछले पहरों में खिलता
उस मृदुल शिरीष सुमन-सा
मैं प्रात धूल में मिलता।
व्याकुल उस मधु सौरभ से
मलयानिल धीरे-धीरे
निश्वास छोड़ जाता हैं
अब विरह तरंगिनि तीरे।
चुम्बन अंकित प्राची का
पीला कपोल दिखलाता
मै कोरी आँख निरखता
पथ, प्रात समय सो जाता।
श्यामल अंचल धरणी का
भर मुक्ता आँसू कन से
छूँछा बादल बन आया
मैं प्रेम प्रभात गगन से।
विष प्याली जो पी ली थी
वह मदिरा बनी नयन में
सौन्दर्य पलक प्याले का
अब प्रेम बना जीवन में।
कामना सिन्धु लहराता
छवि पूरनिमा थी छाई
रतनाकर बनी चमकती
मेरे शशि की परछाई।
छायानट छवि-परदे में
सम्मोहन वेणु बजाता
सन्ध्या-कुहुकिनी-अंचल में
कौतुक अपना कर जाता।
मादकता से आये तुम
संज्ञा से चले गये थे
हम व्याकुल पड़े बिलखते
थे, उतरे हुए नशे से।
अम्बर असीम अन्तर में
चंचल चपला से आकर
अब इन्द्रधनुष-सी आभा
तुम छोड़ गये हो जाकर।
मकरन्द मेघ माला-सी
वह स्मृति मदमाती आती
इस हृदय विपिन की कलिका
जिसके रस से मुसक्याती।
हैं हृदय शिशिरकण पूरित
मधु वर्षा से शशि! तेरी
मन मन्दिर पर बरसाता
कोई मुक्ता की ढेरी।
शीतल समीर आता हैं
कर पावन परस तुम्हारा
मैं सिहर उठा करता हूँ
बरसा कर आँसू धारा
मधु मालतियाँ सोती हैं
कोमल उपधान सहारे
मैं व्यर्थ प्रतीक्षा लेकर
गिनता अम्बर के तारे।
निष्ठुर! यह क्या छिप जाना?
मेरा भी कोई होगा
प्रत्याशा विरह-निशा की
हम होगे औ' दुख होगा।
जब शान्त मिलन सन्ध्या को
हम हेम जाल पहनाते
काली चादर के स्तर का
खुलना न देखने पाते।
अब छुटता नहीं छुड़ाये
रंग गया हृदय हैं ऐसा
आँसू से धुला निखरता
यह रंग अनोखा कैसा!
कामना कला की विकसी
कमनीय मूर्ति बन तेरी
खिंचती हैं हृदय पटल पर
अभिलाषा बनकर मेरी।
मणि दीप लिये निज कर में
पथ दिखलाने को आये
वह पावक पुंज हुआ अब
किरनों की लट बिखराये।
बढ़ गयी और भी ऊँठी
रूठी करुणा की वीणा
दीनता दर्प बन बैठी
साहस से कहती पीड़ा।
यह तीव्र हृदय की मदिरा
जी भर कर-छक कर मेरी
अब लाल आँख दिखलाकर
मुझको ही तुमने फेरी।
नाविक! इस सूने तट पर
किन लहरों में खे लाया
इस बीहड़ बेला में क्या
अब तक था कोई आया।
उम पार कहाँ फिर आऊँ
तम के मलीन अंचल में
जीवन का लोभ नहीं, वह
वेदना छद्ममय छल में।
प्रत्यावर्तन के पथ में
पद-चिह्न न शेष रहा है।
डूबा है हृदय मरूस्थल
आँसू नद उमड़ रहा है।
अवकाश शून्य फैला है
है शक्ति न और सहारा
अपदार्थ तिरूँगा मैं क्या
हो भी कुछ कूल किनारा।
तिरती थी तिमिर उदधि में
नाविक! यह मेरी तरणी
मुखचन्द्र किरण से खिंचकर
आती समीप हो धरणी।
सूखे सिकता सागर में
यह नैया मेरे मन की
आँसू का धार बहाकर
खे चला प्रेम बेगुन की।
चतुर्थ सोपान : सुख-दुःख का दार्शनिक द्वंद्व और नियति नटी का खेल
यह पारावार तरल हो
फेनिल हो गरल उगलता
मथ डाला किस तृष्णा से
तल में बड़वानल जलता।
निश्वास मलय में मिलकर
छाया पथ छू आयेगा
अन्तिम किरणें बिखराकर
हिमकर भी छिप जायेगा।
चमकूँगा धूल कणों में
सौरभ हो उड़ जाऊँगा
पाऊँगा कहीं तुम्हें तो
ग्रहपथ मे टकराऊँगा।
इस यान्त्रिक जीवन में क्या
ऐसी थी कोई क्षमता
जगती थी ज्योति भरी-सी।
तेरी सजीवता ममता।
हैं चन्द्र हृदय में बैठा
उस शीतल किरण सहारे
सौन्दर्य सुधा बलिहारी
चुगता चकोर अंगारे।
बलने का सम्बल लेकर
दीपक पतंग से मिलता
जलने की दीन दशा में
वह फूल सदृश हो खिलता!
इस गगन यूथिका वन में
तारे जूही से खिलते
सित शतदल से शशि तुम क्यों
उनमे जाकर हो मिलते?
मत कहो कि यही सफलता
कलियों के लघु जीवन की
मकरंद भरी खिल जायें
तोड़ी जाये बेमन की।
यदि दो घड़ियों का जीवन
कोमल वृन्तों में बीते
कुछ हानि तुम्हारी है क्या
चुपचाप चू पड़े जीते!
सब सुमन मनोरथ अंजलि
बिखरा दी इन चरणों में
कुचलो न कीट-सा, इनके
कुछ हैं मकरन्द कणों में।
निर्मोह काल के काले-
पट पर कुछ अस्फुट रेखा
सब लिखी पड़ी रह जाती
सुख-दुख मय जीवन रेखा।
दुख-सुख में उठता गिरता
संसार तिरोहित होगा
मुड़कर न कभी देखेगा
किसका हित अनहित होगा।
मानस जीवन वेदी पर
परिणय हो विरह मिलन का
दुख-सुख दोनों नाचेंगे
हैं खेल आँख का मन का।
इतना सुख ले पल भर में
जीवन के अन्तस्तल से
तुम खिसक गये धीरे-से
रोते अब प्राण विकल से।
क्यों छलक रहा दुख मेरा
ऊषा की मृदु पलकों में
हाँ, उलझ रहा सुख मेरा
सन्ध्या की घन अलकों में।
लिपटे सोते थे मन में
सुख-दुख दोनों ही ऐसे
चन्द्रिका अँधेरी मिलती
मालती कुंज में जैसे।
अवकाश असीम सुखों से
आकाश तरंग बनाता
हँसता-सा छायापथ में
नक्षत्र समाज दिखाता।
नीचे विपुला धरणी हैं
दुख भार वहन-सी करती
अपने खारे आँसू से
करुणा सागर को भरती।
धरणी दुख माँग रही हैं
आकाश छीनता सुख को
अपने को देकर उनको
हूँ देख रहा उस मुख को।
इतना सुख जो न समाता
अन्तरिक्ष में, जल थल में
उनकी मुट्ठी में बन्दी
था आश्वासन के छल में।
दुख क्या था उनको, मेरा
जो सुख लेकर यों भागे
सोते में चुम्बन लेकर
जब रोम तनिक-सा जागे।
सुख मान लिया करता था
जिसका दुख था जीवन में
जीवन में मृत्यु बसी हैं
जैसे बिजली हो घन में।
उनका सुख नाच उठा है
यह दुख द्रुम दल हिलने से
ऋंगार चमकता उनका
मेरी करुणा मिलने से।
हो उदासीन दोनों से
दुख-सुख से मेल कराये
ममता की हानि उठाकर
दो रूठे हुए मनाये।
चढ़ जाय अनन्त गगन पर
वेदना जलद की माला
रवि तीव्र ताप न जलाये
हिमकर को हो न उजाला।
नचती है नियति नटी-सी
कन्दुक-क्रीड़ा-सी करती
इस व्यथित विश्व आँगन में
अपना अतृप्त मन भरती।
सन्ध्या की मिलन प्रतीक्षा
कह चलती कुछ मनमानी
ऊषा की रक्त निराशा
कर देती अन्त कहानी।
"विभ्रम मदिरा से उठकर
आओ तम मय अन्तर में
पाओगे कुछ न,टटोलो
अपने बिन सूने घर में।
इस शिथिल आह से खिंचकर
तुम आओगे-आओगे
इस बढ़ी व्यथा को मेरी
रोओगे अपनाओगे।"
वेदना विकल फिर आई
मेरी चौदहो भुवन में
सुख कहीं न दिया दिखाई
विश्राम कहाँ जीवन में!
उच्छ्वास और आँसू में
विश्राम थका सोता है
रोई आँखों में निद्रा
बनकर सपना होता है।
निशि, सो जावें जब उर में
ये हृदय व्यथा आभारी
उनका उन्माद सुनहला
सहला देना सुखकारी।
तुम स्पर्श हीन अनुभव-सी
नन्दन तमाल के तल से
जग छा दो श्याम-लता-सी
तन्द्रा पल्लव विह्वल से।
पंचम सोपान : ज्वाला से ज्योति, जागृति और विश्व-सदन में करुणा-वर्षा
सपनों की सोनजुही सब
बिखरें, ये बनकर तारा
सित सरसित से भर जावे
वह स्वर्ग गंगा की धारा
नीलिमा शयन पर बैठी
अपने नभ के आँगन में
विस्मृति की नील नलिन रस
बरसो अपांग के घन से।
चिर दग्ध दुखी यह वसुधा
आलोक माँगती तब भी
तम तुहिन बरस दो कन-कन
यह पगली सोये अब भी।
विस्मृति समाधि पर होगी
वर्षा कल्याण जलद की
सुख सोये थका हुआ-सा
चिन्ता छुट जाय विपद की।
चेतना लहर न उठेगी
जीवन समुद्र थिर होगा
सन्ध्या हो सर्ग प्रलय की
विच्छेद मिलन फिर होगा।
रजनी की रोई आँखें
आलोक बिन्दु टपकाती
तम की काली छलनाएँ
उनको चुप-चुप पी जाती।
सुख अपमानित करता-सा
जब व्यंग हँसी हँसता है
चुपके से तब मत रो तू
यब कैसी परवशता है।
अपने आँसू की अंजलि
आँखो से भर क्यों पीता
नक्षत्र पतन के क्षण में
उज्जवल होकर है जीता।
वह हँसी और यह आँसू
घुलने दे-मिल जाने दे
बरसात नई होने दे
कलियों को खिल जाने दे।
चुन-चुन ले रे कन-कन से
जगती की सजग व्यथाएँ
रह जायेंगी कहने को
जन-रंजन-करी कथाएँ।
जब नील दिशा अंचल में
हिमकर थक सो जाते हैं
अस्ताचल की घाटी में
दिनकर भी खो जाते हैं।
नक्षत्र डूब जाते हैं
स्वर्गंगा की धारा में
बिजली बन्दी होती जब
कादम्बिनी की कारा में।
मणिदीप विश्व-मन्दिर की
पहने किरणों की माला
तुम अकेली तब भी
जलती हो मेरी ज्वाला।
उत्ताल जलधि वेला में
अपने सिर शैल उठाये
निस्तब्ध गगन के नीचे
छाती में जलन छिपाये
संकेत नियति का पाकर
तम से जीवन उलझाये
जब सोती गहन गुफा में
चंचल लट को छिटकाये।
वह ज्वालामुखी जगत की
वह विश्व वेदना बाला
तब भी तुम सतत अकेली
जलती हो मेरी ज्वाला!
इस व्यथित विश्व पतझड़ की
तुम जलती हो मृदु होली
हे अरुणे! सदा सुहागिनि
मानवता सिर की रोली।
जीवन सागर में पावन
बड़वानल की ज्वाला-सी
यह सारा कलुष जलाकर
तुम जलो अनल बाला-सी।
जगद्वन्द्वों के परिणय की
हे सुरभिमयी जयमाला
किरणों के केसर रज से
भव भर दो मेरी ज्वाला।
तेरे प्रकाश में चेतन-
संसार वेदना वाला,
मेरे समीप होता है
पाकर कुछ करुण उजाला।
उसमें धुँधली छायाएँ
परिचय अपना देती हैं
रोदन का मूल्य चुकाकर
सब कुछ अपना लेती हैं।
निर्मम जगती को तेरा
मंगलमय मिले उजाला
इस जलते हुए हृदय को
कल्याणी शीतल ज्वाला।
जिसके आगे पुलकित हो
जीवन है सिसकी भरता
हाँ मृत्यु नृत्य करती है
मुस्क्याती खड़ी अमरता ।
वह मेरे प्रेम विहँसते
जागो मेरे मधुवन में
फिर मधुर भावनाओं का
कलरव हो इस जीवन में।
मेरी आहों में जागो
सुस्मित में सोनेवाले
अधरों से हँसते-हँसते
आँखों से रोनेवाले।
इस स्वप्नमयी संसृत्ति के
सच्चे जीवन तुम जागो
मंगल किरणों से रंजित
मेरे सुन्दरतम जागो।
अभिलाषा के मानस में
सरसिज-सी आँखे खोलो
मधुपों से मधु गुंजारो
कलरव से फिर कुछ बोलो।
आशा का फैल रहा है
यह सूना नीला अंचल
फिर स्वर्ण-सृष्टि-सी नाचे
उसमें करुणा हो चंचल
मधु संसृत्ति की पुलकावलि
जागो, अपने यौवन में
फिर से मरन्द हो
कोमल कुसुमों के वन में।
फिर विश्व माँगता होवे
ले नभ की खाली प्याली
तुमसे कुछ मधु की बूँदे
लौटा लेने को लाली।
फिर तम प्रकाश झगड़े में
नवज्योति विजयिनि होती
हँसता यह विश्व हमारा
बरसाता मंजुल मोती।
प्राची के अरुण मुकुर में
सुन्दर प्रतिबिम्ब तुम्हारा
उस अलस ऊषा में देखूँ
अपनी आँखों का तारा।
कुछ रेखाएँ हो ऐसी
जिनमें आकृति हो उलझी
तब एक झलक! वह कितनी
मधुमय रचना हो सुलझी।
जिसमें इतराई फिरती
नारी निसर्ग सुन्दरता
छलकी पड़ती हो जिसमें
शिशु की उर्मिल निर्मलता
आँखों का निधि वह मुख हो
अवगुंठन नील गगन-सा
यह शिथिल हृदय ही मेरा
खुल जावे स्वयं मगन-सा।
मेरी मानसपूजा का
पावन प्रतीक अविचल हो
झरता अनन्त यौवन मधु
अम्लान स्वर्ण शतदल हो।
कल्पना अखिल जीवन की
किरनों से दृग तारा की
अभिषेक करे प्रतिनिधि बन
आलोकमयी धारा की।
वेदना मधुर हो जावे
मेरी निर्दय तन्मयता
मिल जाये आज हृदय को
पाऊँ मैं भी सहृदयता।
मेरी अनामिका संगिनि!
सुन्दर कठोर कोमलते!
हम दोनों रहें सखा ही
जीवन-पथ चलते-चलते।
ताराओं की वे रातें
कितने दिन-कितनी घड़ियाँ
विस्मृति में बीत गईं वें
निर्मोह काल की कड़ियाँ
उद्वेलित तरल तरंगें
मन की न लौट जावेंगी
हाँ, उस अनन्त कोने को
वे सच नहला आवेंगी।
जल भर लाते हैं जिसको
छूकर नयनों के कोने
उस शीतलता के प्यासे
दीनता दया के दोने।
फेनिल उच्छ्वास हृदय के
उठते फिर मधुमाया में
सोते सुकुमार सदा जो
पलकों की सुख छाया में।
आँसू वर्षा से सिंचकर
दोनों ही कूल हरा हो
उस शरद प्रसन्न नदी में
जीवन द्रव अमल भरा हो।
जैसे जीवन का जलनिधि
बन अंधकार उर्मिल हो
आकाश दीप-सा तब वह
तेरा प्रकाश झिलमिल हो।
हैं पड़ी हुई मुँह ढककर
मन की जितनी पीड़ाएँ
वे हँसने लगीं सुमन-सी
करती कोमल क्रीड़ाएँ।
तेरा आलिंगन कोमल
मृदु अमरबेलि-सा फैले
धमनी के इस बन्धन में
जीवन ही हो न अकेले।
हे जन्म-जन्म के जीवन
साथी संसृति के दुख में
पावन प्रभात हो जावे
जागो आलस के सुख में ।
जगती का कलुष अपावन
तेरी विदग्धता पावे
फिर निखर उठे निर्मलता
यह पाप पुण्य हो जावे।
सपनों की सुख छाया में
जब तन्द्रालस संसृति है
तुम कौन सजग हो आई
मेरे मन में विस्मृति है!
तुम! अरे, वही हाँ तुम हो
मेरी चिर जीवनसंगिनि
दुख वाले दग्ध हृदय की
वेदने! अश्रुमयि रंगिनि!
जब तुम्हें भूल जाता हूँ
कुड्मल किसलय के छल में
तब कूक हूक-सू बन तुम
आ जाती रंगस्थल में।
बतला दो अरे न हिचको
क्या देखा शून्य गगन में
कितना पथ हो चल आई
रजनी के मृदु निर्जन में!
सुख तृप्त हृदय कोने को
ढँकती तमश्यामल छाया
मधु स्वप्निल ताराओं की
जब चलती अभिनय माया।
देखा तुमने तब रुककर
मानस कुमुदों का रोना
शशि किरणों का हँस-हँसकर
मोती मकरन्द पिरोना।
देखा बौने जलनिधि का
शशि छूने को ललचाना
वह हाहाकार मचाना
फिर उठ-उठकर गिर जाना।
मुँह सिये, झेलती अपनी
अभिशाप ताप ज्वालाएँ
देखी अतीत के युग की
चिर मौन शैल मालाएँ।
जिनपर न वनस्पति कोई
श्यामल उगने पाती है
जो जनपद परस तिरस्कृत
अभिशप्त कही जाती है।
कलियों को उन्मुख देखा
सुनते वह कपट कहानी
फिर देखा उड़ जाते भी
मधुकर को कर मनमानी।
फिर उन निराश नयनों की
जिनके आँसू सूखे हैं
उस प्रलय दशा को देखा
जो चिर वंचित भूखे हैं।
सूखी सरिता की शय्या
वसुधा की करुण कहानी
कूलों में लीन न देखी
क्या तुमने मेरी रानी?
सूनी कुटिया कोने में
रजनी भर जलते जाना
लघु स्नेह भरे दीपक का
देखा है फिर बुझ जाना।
सबका निचोड़ लेकर तुम
सुख से सूखे जीवन में
बरसों प्रभात हिमकन-सा
आँसू इस विश्व-सदन में ।
प्रमुख छंदों की सप्रसंग व्याख्या एवं गहन भावार्थ
विश्वविद्यालयी परीक्षाओं (BA/MA Hindi), संघ लोक सेवा आयोग (UPSC Hindi Optional) और UGC-NET/JRF में 'आंसू' के निम्नलिखित छंदों की व्याख्या सर्वाधिक पूछी जाती है:
असीम वेदना का उद्गम और 'शीतल ज्वाला' का विरोधाभास
संदर्भ पंक्तियाँ: "इस करुणा कलित हृदय में... करती हैं काम अनिल का।"
व्याख्या: कवि अपने ही अंतर्मन से प्रश्न करता है कि इस करुणा से भरे हृदय में आज यह व्याकुल कर देने वाली रागिनी क्यों बज उठी है? जिस प्रकार नीले आकाश में असंख्य तारे बसते हैं, उसी प्रकार मेरे सूने हृदय में प्रियतम की स्मृतियों की एक पूरी बस्ती बस गई है। ये स्मृतियाँ उस 'महामिलन' की चिंगारियाँ (स्फुलिंग) हैं। कवि यहाँ एक अद्भुत विरोधाभास रचता है—विरह की यह आग 'शीतल ज्वाला' है, जिसमें आँसुओं का जल पानी का नहीं बल्कि ईंधन (घी/तेल) का काम कर रहा है, और कवि की आहें (निश्वास) हवा बनकर उस अग्नि को और भड़का रही हैं।
घनीभूत पीड़ा और स्मृति का मेघ-रूपक
संदर्भ पंक्तियाँ: "जो घनीभूत पीड़ा थी, मस्तक में स्मृति-सी छायी / दुर्दिन में आँसू बनकर, वह आज बरसने आयी।"
व्याख्या: यह छायावादी काव्य की सबसे प्रसिद्ध चौपाई/छंद है। यहाँ 'श्लेष' और 'रूपक' का चमत्कार है। जिस प्रकार गर्मी से भाप बनकर उठी जल-राशि आकाश में घने बादल (घनीभूत) के रूप में जमा हो जाती है और 'दुर्दिन' (वर्षा ऋतु के मेघाच्छन्न दिन) में पानी बनकर बरस पड़ती है; ठीक उसी प्रकार कवि के मस्तक में जो गहरा दुःख 'स्मृति' बनकर जमा था, वह जीवन के 'दुर्दिन' (बुरे और एकाकी दिनों) में आँसू बनकर आँखों से बरस पड़ा है।
छायावादी सौंदर्य-विधान : अतींद्रिय रूप-चित्रण
संदर्भ पंक्तियाँ: "बाँधा था विधु को किसने, इन काली जंजीरों से... आलोक मधुर थी ऐसी!"
व्याख्या: रीतिकालीन कवियों का सौंदर्य-वर्णन स्थूल और मांसल था, किंतु प्रसाद जी का सौंदर्य-वर्णन सूक्ष्म, अशरीरी और आभा-मंडित है। प्रियतम के चंद्रमा जैसे मुख (विधु) को काली अलकों (केशों) ने जंजीरों की तरह बाँध रखा है। मोतियों से भरी माँग ऐसी लगती है मानो काले सर्पों (फणियों) के मुख हीरों से भरे हों। प्रेयसी के पावन शरीर की कांति ऐसी है मानो बिजली (चंचला) स्वयं पूर्णिमा की चाँदनी के पर्व में स्नान करके बाहर निकली हो—यहाँ उज्ज्वलता और पवित्रता का चरम उत्कर्ष है।
नियतिवाद और सुख-दुःख का दार्शनिक समन्वय
संदर्भ पंक्तियाँ: "मानस जीवन वेदी पर, परिणय हो विरह मिलन का... नचती है नियति नटी-सी, कन्दुक-क्रीड़ा-सी करती।"
व्याख्या: व्यक्तिगत शोक से उबरते हुए कवि दार्शनिक सत्य को पहचानता है। वह कहता है कि मानव मन रूपी वेदी पर मिलन और विरह का विवाह होना ही सृष्टि का नियम है। जैसे मालती के कुंज में चाँदनी और अंधकार एक साथ लिपटे रहते हैं, वैसे ही जीवन में सुख और दुःख अविभाज्य हैं। 'नियति' (प्रकृति/भाग्य) एक नर्तकी (नटी) की भाँति इस दुखी संसार के आँगन में गेंद से खेल रही है (कन्दुक-क्रीड़ा)—कभी सुख ऊपर आता है, कभी दुःख।
लोक-मंगल का चरमोत्कर्ष : अश्रु से विश्व-कल्याण
संदर्भ पंक्तियाँ: "फिर उन निराश नयनों की, जिनके आँसू सूखे हैं... बरसों प्रभात हिमकन-सा, आँसू इस विश्व-सदन में।"
व्याख्या: कविता के अंतिम भाग में कवि अपनी 'वेदना' को अपनी चिर-संगिनी मानकर उससे पूछता है कि तुमने संसार में भ्रमण करते हुए क्या देखा? क्या तुमने उन शोषित, चिर-वंचित और भूखे लोगों की प्रलय-दशा देखी जिनकी आँखों के आँसू भी सूख चुके हैं? (यहाँ निराला की भिक्षुक कविता जैसी यथार्थवादी करुणा दिखाई देती है)। अंततः कवि अपने आँसुओं को आदेश देता है कि वे संसार के समस्त दुःखों का निचोड़ लेकर इस तप्त विश्व-रूपी भवन (विश्व-सदन) में प्रभात की शीतल ओस (हिमकण) की तरह बरस जाएँ, ताकि सूखे और प्यासे जीवनों में फिर से हरियाली लौट सके।
📚 साहित्यशाला विशेष : भारतीय काव्य में 'पीड़ा और प्रतिरोध' की परंपरा
यदि आप 'आंसू' की संवेदना को भारतीय साहित्य के वृहत्तर कैनवास पर समझना चाहते हैं, तो आपको यह देखना चाहिए कि विभिन्न युगों और भाषाओं में कवियों ने दुःख को कैसे साधा है:
- अध्यात्म और शाश्वत मूल्य: भारतीय मानस में मर्यादा और करुणा का मूल स्रोत राम के शाश्वत चरित्र में मिलता है, जिसे छायावाद से लेकर आधुनिक काल तक हर कवि ने नए रूप में व्याख्यायित किया।
- प्रयोगवाद और आधुनिक अस्तित्ववाद: प्रसाद के बाद सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' ने अपनी अज्ञेय की प्रमुख कविताओं में लिखा—"दुःख सबको माँजता है", जो 'आंसू' के दर्शन का ही आधुनिक विस्तार है।
- प्रगतिवाद और मोहभंग का यथार्थ: जब छायावादी कल्पना का युग बीता, तो निराला की व्यंग्य-कृति कुकुरमुत्ता, गजानन माधव मुक्तिबोध की अंधेरे समय की पड़ताल करती चाँद का मुँह टेढ़ा है और सुदामा पांडेय 'धूमिल' की पूरबिया सूरज कविता ने आम आदमी की पीड़ा को सीधी राजनीतिक आवाज़ दी।
- उर्दू और मैथिली की समानांतर संवेदना: विरह की जो नज़ाकत हमें क्लासिकल उर्दू ग़ज़ल मिसाल-ए-दस्त-ए-ज़ुलेखा टपकना चाहता है और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की इंकलाबी नज़्म बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे में मिलती है, वही माधुर्य विद्यापति की परंपरा वाली मैथिली कविताओं के संसार में भी रचा-बसा है।
- डिजिटल युग में हिंदी: आज जब जेन-ज़ी (Gen-Z) हिंदी के नए डिजिटल कर्णधार बन रहे हैं, तब 'आंसू' जैसी क्लासिक रचनाएँ युवा पीढ़ी को भावनात्मक गहराई (Emotional Intelligence) सिखाने का सबसे सशक्त माध्यम हैं।
व्याकरण, छंद-विधान, अलंकार और शिल्प-सौंदर्य (Poetic Craft)
'आंसू' का कला-पक्ष (शिल्प) उतना ही समृद्ध है जितना इसका भाव-पक्ष। यदि आप किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं या अलंकार की पहचान कैसे करें (ट्रिक और उदाहरण) समझना चाहते हैं, तो 'आंसू' के निम्नलिखित शिल्पगत बिंदुओं को अवश्य नोट करें:
छंद-विधान : 'आंसू छंद' (सखी या पियूषवर्षी छंद का नूतन रूप)
संपूर्ण 'आंसू' काव्य एक विशेष मात्रिक छंद में लिखा गया है, जिसे स्वयं प्रसाद जी की लोकप्रियता के कारण 'आंसू छंद' कहा जाने लगा। शास्त्रीय दृष्टि से यह 14 मात्राओं के 'सखी छंद' का द्विपदी रूप है:
- प्रत्येक छंद में 4 चरण होते हैं (जिन्हें दो-दो चरणों की पंक्तियों में भी गिना जाता है)।
- प्रत्येक चरण में 14 मात्राएँ होती हैं (दो चरणों को मिलाकर 14 + 14 = 28 मात्राएँ)।
- प्रत्येक चरण के अंत में प्रायः गुरु (S = 2) या गुरु-लघु का विधान है, जिससे कविता में एक स्वतःस्फूर्त संगीतात्मक लय (Lyrical Cadence) और सिसकी जैसा नाद-सौंदर्य उत्पन्न होता है।
प्रमुख अलंकारों का सटीक प्रयोग
- विरोधाभास अलंकार (Oxymoron): "शीतल ज्वाला जलती है, ईंधन होता दृग जल का" (ज्वाला का शीतल होना और जल का ईंधन बनना) तथा "सुन्दर कठोर कोमलते!"।
- रूपक अलंकार (Metaphor): "मानस सागर के तट पर", "चेतना तरंगिनी मेरी", "इस हृदय कमल का घिरना", "जीवन की जटिल समस्या है बढ़ी जटा-सी कैसी"।
- रूपकातिशयोक्ति अलंकार: "बाँधा था विधु को किसने, इन काली जंजीरों से" (यहाँ उपमेय 'मुख' और 'केश' का नाम लिए बिना सीधे उपमान 'विधु/चंद्रमा' और 'काली जंजीरों' का कथन किया गया है)।
- मानवीकरण अलंकार (Personification): पाश्चात्य प्रभाव और छायावादी वैशिष्ट्य के तहत अमूर्त भावों को नारी रूप दिया गया है—जैसे प्रतिध्वनि का "पगली-सी देती फेरी", नियति का "नचती है नियति नटी-सी", और रात्रि का "रजनी की रोई आँखें"।
- उपमा अलंकार (Simile): "प्यासी मछली-सी आँखें", "चंचला स्नान कर आवे चंद्रिका पर्व में जैसी", "बरसों प्रभात हिमकन-सा"।
- वीप्सा एवं पुनरुक्ति प्रकाश: करुणा की तीव्रता दिखाने के लिए "छिल-छिल कर", "मल-मल कर", "धुल-धुल कर", "रो-रोकर सिसक-सिसक कर" का सजीव प्रयोग।
भाषा-शैली, शब्द-शक्ति और प्रतीक विधान
प्रसाद जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ (तत्सम-प्रधान) खड़ी बोली है, किंतु उसमें कहीं भी क्लिष्टता या रूखापन नहीं है। उन्होंने अभिधा (सीधे अर्थ) के स्थान पर लक्षणा और व्यंजना शब्द-शक्ति का सर्वाधिक सहारा लिया है। 'झंझा', 'प्रलय घटा', 'मरुस्थल', 'पतझड़' और 'बड़वानल' कवि के आंतरिक हाहाकार के प्रतीक हैं, जबकि 'प्रभात हिमकण', 'आकाशदीप', 'स्वर्ण शतदल' और 'मधुवन' आत्मिक शांति एवं लोक-कल्याण के प्रतीक हैं।
कठिन शब्दार्थ कोश (Comprehensive Vocabulary Glossary)
'आंसू' में प्रयुक्त प्रमुख तत्सम एवं साहित्यिक शब्दों के सरल हिंदी अर्थ नीचे तालिका में दिए गए हैं:
| कठिन शब्द | सरल हिंदी अर्थ | कठिन शब्द | सरल हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|
| करुणा कलित | करुणा (दुःख/दया) से भरा हुआ या युक्त | विकल रागिनी | व्याकुल या बेचैन कर देने वाली धुन |
| लोल लहर | चंचल या हिलती हुई तरंगें | व्योम गंगा | आकाशगंगा (Milky Way) |
| नील निलय | नीला घर अर्थात् नीला आकाश | स्फुलिंग | आग की चिंगारी |
| दृग जल | नेत्रों का जल अर्थात् आँसू | बाड़व ज्वाला / बड़वानल | समुद्र के भीतर लगने वाली आग |
| मुक्त कुन्तला | खुले हुए केशों (बालों) वाली | अकिंचन | अत्यंत दीन या जिसके पास कुछ न हो |
| मरन्द / मकरन्द | फूलों का रस (पराग-मधु) | घनीभूत | सघन होकर एकत्रित हुआ (मेघ के समान) |
| राका / हिमकर | पूर्णिमा की रात्रि / चंद्रमा | विधु | चंद्रमा (यहाँ प्रियतम के मुख का प्रतीक) |
| विद्रुम सीपी | मूँगे जैसी लाल सीपी (अधर/होंठ) | अनंग / शिंजिनी | कामदेव / धनुष की डोरी (प्रत्यंचा) |
| परिरम्भ कुम्भ | आलिंगन रूपी मदिरा का घड़ा | किंजल्क | कमल का केसर या तंतु |
| प्रत्यावर्तन | पीछे लौटना या वापसी का मार्ग | सिकता सागर | रेत का समुद्र (मरुस्थल) |
| कन्दुक-क्रीड़ा | गेंद से खेलने का खेल | तम तुहिन | अंधकार रूपी पाला या बर्फ |
| कादम्बिनी | मेघों की घनी घटा (बादलों की पंक्ति) | अम्लान स्वर्ण शतदल | कभी न मुरझाने वाला सोने का सौ पंखुड़ियों वाला कमल |
'आंसू' काव्य का भावपूर्ण वीडियो पाठ
छायावादी कविता का वास्तविक आनंद उसके नाद-सौंदर्य और संगीतात्मक प्रवाह को सुनने में है। नीचे दिए गए वीडियो में आप महाकवि जयशंकर प्रसाद की इस कालजयी कृति का भावपूर्ण पाठ सुन सकते हैं:
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs — परीक्षा एवं शोध विशेष)
जयशंकर प्रसाद की 'आंसू' कविता का मूल विषय और केंद्रीय भाव क्या है?
'आंसू' का मूल विषय स्मृतिजन्य विरह-वेदना का उदात्तीकरण (Sublimation of Personal Grief) है। कविता एक प्रेमी के व्यक्तिगत विछोह और एकाकीपन से प्रारंभ होती है, किंतु धीरे-धीरे कवि की चेतना का विस्तार होता है और वह अपनी निजी पीड़ा को संपूर्ण मानवता की पीड़ा से जोड़कर 'विश्व-कल्याण' की कामना करता है।
'आंसू' का प्रथम और द्वितीय संस्करण कब प्रकाशित हुआ और दोनों में क्या अंतर है?
'आंसू' का प्रथम संस्करण 1925 ई. में साहित्य सदन, चिरगाँव (झाँसी) से प्रकाशित हुआ था, जिसमें 126 छंद थे और उसका स्वर अत्यंत निराशावादी था। इसका द्वितीय परिमार्जित संस्करण 1933 ई. में भारती भंडार से प्रकाशित हुआ, जिसमें छंदों की संख्या बढ़ाकर 190 कर दी गई और अंत में प्रत्यभिज्ञा दर्शन व लोक-मंगल का आशावादी संदेश जोड़ा गया।
'आंसू' को हिंदी का 'मेघदूत' क्यों कहा जाता है?
जिस प्रकार महाकवि कालिदास के संस्कृत काव्य 'मेघदूत' में यक्ष अपनी विरह-व्यथा को मेघ (बादल) के माध्यम से व्यक्त करता है और वह विरह अत्यंत ललित एवं लोक-संवेदी बन जाता है, उसी प्रकार प्रसाद जी ने 'आंसू' में अपनी घनीभूत पीड़ा को अश्रु-मेघ के रूपक से व्यक्त किया है। इसी विरह-माधुर्य के कारण आलोचकों ने इसे 'हिंदी का मेघदूत' कहा है।
'आंसू' महाकाव्य है, खंडकाव्य है या प्रगीत काव्य?
काव्य-रूप की दृष्टि से 'आंसू' एक 'प्रगीत काव्य' (Lyric Poetry) या 'विरह-काव्य' है। इसमें प्रबंध काव्य (महाकाव्य या खंडकाव्य) की तरह कोई बाह्य इतिवृत्तात्मक कथा नहीं है, फिर भी भावों की आंतरिक अन्विति और क्रमिक मनोवैज्ञानिक विकास इसे एक 'भाव-प्रबंध' का गौरव प्रदान करते हैं।
"जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति-सी छायी" पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
इस प्रसिद्ध छंद में श्लेष, उपमा और सांगरूपक अलंकार का अद्भुत समन्वय है। 'घनीभूत' (अत्यंत सघन पीड़ा / घने बादल) और 'दुर्दिन' (बुरे दिन / वर्षा के मेघाच्छन्न दिन) शब्दों में दोहरे अर्थ चिपके होने से श्लेष अलंकार है, तथा 'स्मृति-सी' में उपमा अलंकार है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जयशंकर प्रसाद की 'आंसू' के विषय में क्या मत दिया है?
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में 'आंसू' की लाक्षणिक भंगिमा और कल्पना की उड़ान की प्रशंसा करते हुए लिखा कि इसमें "अंतर्मुखी वेदना की बड़ी ही मर्मस्पर्शी और चित्रमयी अभिव्यंजना" हुई है, जहाँ कवि की व्यक्तिगत अनुभूति अंततः लोक-सामान्य की भूमि पर पहुँच जाती है।