Kaarwan Guzar Gya - कारवाँ गुज़र गया Gopaldas Neeraj Hindi Kavita स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से, लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से, और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे! नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई, पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई, पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई, चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई, गीत अश्क बन गए, छंद हो दफन गए, साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये, और हम झुके-झुके, मोड़ पर रुके-रुके उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे। Gopaldas Neeraj Hindi Kavita क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा, क्या सुरूप था कि देख आइना सिहर उठा, इस तरफ ज़मीन उठी तो आसमान उधर उठा, थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा, एक दिन मगर यहाँ, ऐसी कुछ हवा चली, लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली, और हम लुटे-लुटे, वक्त से पिटे-पिटे, साँस की शराब का खुमार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे। हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ, होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ, दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ, और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी प...
“झाँसी की रानी” 1857 के विद्रोह को लोक-स्मृति, वीर रस और नारी शक्ति के रूप में रूपांतरित करने वाली अमर कविता है। झाँसी की रानी (Jhansi Ki Rani) केवल एक कविता नहीं, बल्कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम का 'विजय गीत' है। सुभद्रा कुमारी चौहान की यह रचना 1857 की क्रांति और नारी शक्ति का सर्वोच्च उदाहरण है। साहित्यशाला (Sahityashala) पर आज हम इस कविता का संपूर्ण पाठ (Full Text) , Hinglish Transliteration , और गहन विश्लेषण (Detailed Analysis) प्रस्तुत कर रहे हैं। "बुझा दीप झाँसी का..." – The fierce defense of Jhansi Fort. यह कविता हमें याद दिलाती है कि कैसे महिलाओं ने अपनी इच्छा से विद्रोह किया और इतिहास बदल दिया, ठीक वैसे ही जैसे हमने कुछ औरतों की विद्रोही कहानियों में पढ़ा है। Exam Relevance (UPSC / NET / Academic) विषय: 1857 का स्वतंत्रता संग्राम (History) साहित्य: वीर रस और राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा (Hindi Literature) महत्व: ...