मिली हमें जो आज़ादी,
अपने सपूतों के बलिदान से।
मिली हमें जो आज़ादी,
अंग्रेजों के अपमान से।।
मिली हमें जो आज़ादी,
वीरों के प्राण से।
मिली हमें जो आज़ादी,
खुद्दारों के अभिमान से।।
उस आज़ादी को हम,
व्यर्थ कर रहे हैं।
अपने भारतवर्ष को हम,
असमर्थ कर रहे हैं।।
अंदर ही अंदर हम
भारत को तोड़ रहे हैं।
अपनी इस कर्मभूमि को,
हम खुद ही निचोड़ रहे हैं।।
रो रहीं हैं भारत माँ,
माँग रही बलिदान हैं।
सभी हैवानो के,
माँग रही प्राण हैं।।
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हर्ष नाथ झा

