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Mangal Rang Lyrics in Hindi & Meaning: Ramayana (2026) Song Guide

आज सिन्धु में ज्वार उठा है – Lyrics, Meaning & Analysis | Atal Bihari Vajpayee

प्रस्तावना: एक हुंकार जो आज भी गूंजती है

कविता केवल शब्दों का मेल नहीं होती, वह समय के माथे पर लिखा हुआ इतिहास होती है।

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी की कलम से निकली कविता 'आज सिन्धु में ज्वार उठा है' (Aaj Sindhu Me Jwar Utha Hai) केवल एक रचना नहीं, बल्कि एक सुप्त राष्ट्र को जगाने वाला पाञ्चजन्य शंखनाद है। जब हम अटल जी के राजनीतिक जीवन और 100वीं जयंती के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं, तो पाते हैं कि उनकी रगों में जो कवि बसता था, वह राजनेता से कहीं बड़ा था।

यह कविता उस कालखंड का दस्तावेज है जब भारत अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष कर रहा था। जैसे अपनी एक अन्य रचना में वे पूछते हैं कि कौन कौरव कौन पांडव, वैसे ही यहाँ वे इतिहास के पन्नों को पलटते हुए भारतीय संस्कृति की अमरता का उद्घोष करते हैं।

नोट: यह कविता शैक्षणिक, साहित्यिक विश्लेषण और शोध के उद्देश्य से यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। सर्वाधिकार मूल रचनाकार के सुरक्षित हैं।

आज सिन्धु में ज्वार उठा है (Lyrics)

आज सिंधु में ज्वार उठा है,
नगपति फिर ललकार उठा है,
कुरुक्षेत्र के कण–कण से फिर,
पांचजन्य हुँकार उठा है।

शत–शत आघातों को सहकर,
जीवित हिंदुस्थान हमारा,
जग के मस्तक पर रोली-सा,
शोभित हिंदुस्थान हमारा।

(यह पंक्तियाँ उस शाश्वत सत्य को रेखांकित करती हैं जिसे अटल जी ने अपनी कविता 'हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन' में भी विस्तार दिया है।)

दुनियाँ का इतिहास पूछता,
रोम कहाँ, यूनान कहाँ है?
घर–घर में शुभ अग्नि जलाता,
वह उन्नत ईरान कहाँ है?

दीप बुझे पश्चिमी गगन के,
व्याप्त हुआ बर्बर अँधियारा,
किंतु चीरकर तम की छाती,
चमका हिंदुस्थान हमारा।

हमने उर का स्नेह लुटाकर,
पीड़ित ईरानी पाले हैं,
निज जीवन की ज्योति जला,
मानवता के दीपक बाले हैं।

जग को अमृत का घट देकर,
हमने विष का पान किया था,
मानवता के लिये हर्ष से,
अस्थि–वज्र का दान दिया था।

जब पश्चिम ने वन–फल खाकर,
छाल पहनकर लाज बचाई,
तब भारत से साम गान का,
स्वर्गिक स्वर था दिया सुनाई।

अज्ञानी मानव को हमने,
दिव्य ज्ञान का दान दिया था,
अम्बर के ललाट को चूमा,
अतल सिंधु को छान लिया था।

साक्षी है इतिहास, प्रकृति का,
तब से अनुपम अभिनय होता,
पूरब से उगता है सूरज,
पश्चिम के तम में लय होता।

विश्व गगन पर अगणित गौरव,
के दीपक अब भी जलते हैं,
कोटि–कोटि नयनों में स्वर्णिम,
युग के शत–सपने पलते हैं।

किन्तु आज पुत्रों के शोणित से,
रंजित वसुधा की छाती,
टुकड़े-टुकड़े हुई विभाजित,
बलिदानी पुरखों की थाती।

तट से अपना सर टकराकर,
झेलम की लहरें पुकारती,
यूनानी का रक्त दिखाकर,
चन्द्रगुप्त को है गुहारती।

पढ़ें: अटल जी की वह कविता जो चुनौतियों को स्वीकारने का साहस देती है - आए जिस-जिस की हिम्मत हो

रो-रोकर पंजाब पूछता,
किसने है दोआब बनाया?
किसने मंदिर-गुरुद्वारों को,
अधर्म का अंगार दिखाया?

खड़े देहली पर हो,
किसने पौरुष को ललकारा?
किसने पापी हाथ बढ़ाकर
माँ का मुकुट उतारा?

काश्मीर के नंदन वन को,
किसने है सुलगाया?
किसने छाती पर,
अन्यायों का अम्बार लगाया?

आंख खोलकर देखो! घर में
भीषण आग लगी है,
धर्म, सभ्यता, संस्कृति खाने,
दानव क्षुधा जगी है।

हिन्दू कहने में शर्माते,
दूध लजाते, लाज न आती,
घोर पतन है, अपनी माँ को,
माँ कहने में फटती छाती।

जिसने रक्त पीला कर पाला,
क्षण-भर उसकी ओर निहारो,
सूनी-सूनी मांग निहारो,
बिखरे-बिखरे केश निहारो।

जब तक दु:शासन है,
वेणी कैसे बंध सकती,
कोटि-कोटि संतति है,
माँ की लाज न सकती है।

कठिन शब्दों के अर्थ (Word Meanings)

नगपति (Nagpati) हिमालय पर्वत (King of Mountains)
पांचजन्य (Panchjanya) भगवान कृष्ण का शंख (युद्ध का उद्घोष)
शोणित (Shonit) रक्त / खून (Blood)
थाती (Thati) अमानत / धरोहर (Heritage/Trust)
तम (Tam) अँधेरा / अज्ञान (Darkness)

साहित्यिक एवं भावगत समीक्षा (Analysis)

इस कविता को समझने के लिए हमें अटल जी के ह्रदय में झांकना होगा। शताब्दी समारोह के इस दौर में, यह कविता उनकी राष्ट्रभक्ति का प्रमाण है।

1. ऐतिहासिक चेतना (Historical Consciousness)

कविता में रोम, यूनान (Greece), और ईरान का प्रतीकात्मक उल्लेख है। कवि का दृष्टिकोण यह है कि जहाँ विश्व की कई प्राचीन सभ्यताएं अपनी मूल पहचान खो बैठीं, वहीं भारत (हिन्दुस्थान) हजारों वर्षों के संघर्ष के बाद भी अपनी सनातन संस्कृति (Eternal Culture) के साथ खड़ा है। यह वही भाव है जो 'यह परंपरा का प्रवाह है' कविता में भी परिलक्षित होता है।

2. विभाजन की पीड़ा (The Pain of Partition)

"टुकड़े-टुकड़े हुई विभाजित, बलिदानी पुरखों की थाती" - यह पंक्तियाँ 1947 के विभाजन और कश्मीर की स्थिति पर कवि की वेदना को दर्शाती हैं। जब वे कहते हैं कि "माँ का मुकुट उतारा", तो यह कश्मीर की ओर स्पष्ट संकेत है, जिसे बचाने के लिए उन्होंने अपनी एक अन्य कविता 'खून क्यों सफ़ेद हो गया' में भी देशवासियों का आह्वान किया था।

3. रस और अलंकार (Literary Devices)

साहित्यिक दृष्टि से यह कविता वीर रस (Heroic Sentiment) का उत्कृष्ट उदाहरण है।

  • मानवीकरण (Personification): "रो-रोकर पंजाब पूछता", "झेलम की लहरें पुकारती" - यहाँ प्रकृति को मानवीय संवेदनाओं के साथ दिखाया गया है।
  • रूपक (Metaphor): "अधर्म का अंगार", "सुख की दीवाली"।
  • शैली: ओजपूर्ण (Vigorous)। यह वही शैली है जो उनकी रचना 'गगन में लहरता है भगवा हमारा' में केसरिया ध्वज के प्रति सम्मान में दिखती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

'आज सिन्धु में ज्वार उठा है' का मुख्य भाव क्या है?

इस कविता का मुख्य भाव 'राष्ट्रवाद' और 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' है। यह भारत की प्राचीन गरिमा को याद दिलाते हुए वर्तमान चुनौतियों (जैसे कश्मीर समस्या और विभाजन) के प्रति युवाओं को जागरूक करती है।

अटल जी ने इसमें किन देशों का जिक्र किया है?

कविता में रोम (Rome), यूनान (Greece) और ईरान (Iran) का जिक्र किया गया है, जो मिट गईं, जबकि भारतीय सभ्यता आज भी जीवित है।

इस कविता में 'दुःशासन' का क्या अर्थ है?

यहाँ 'दुःशासन' उन आततायी शक्तियों और आक्रमणकारियों का प्रतीक है जिन्होंने भारत माता (द्रौपदी) की गरिमा और सीमाओं को भंग करने का प्रयास किया है।

कविता पाठ सुनें (Recitation)

अटल जी के ओजस्वी स्वरों को साक्षात् अनुभव करें:

निष्कर्ष: अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता आज के भू-राजनीतिक परिदृश्य में और भी प्रासंगिक हो गई है। यह हमें याद दिलाती है कि शांति की बात वही देश कर सकता है जो शक्तिशाली हो। साहित्यशाला पर हमारा प्रयास है कि हम ऐसी कालजयी रचनाओं को आप तक पहुँचाते रहें।

अन्य विभाग: Finance • English Lit • Maithili • Sports

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