परिचय: क्रांति का आह्वान और 'कवि आज सुना वह गान रे'
अटल बिहारी वाजपेयी केवल एक कुशल राजनेता ही नहीं थे, बल्कि उनकी अंतरात्मा एक संवेदनशील और विद्रोही कवि की थी। जब भी हिंदी की सर्वश्रेष्ठ देशभक्ति कविताओं (Patriotic poems in Hindi) की चर्चा होती है, तो उनकी कविता 'कवि आज सुना वह गान रे' अग्रिम पंक्ति में खड़ी नज़र आती है। यह मात्र एक Atal Bihari Vajpayee Hindi Poem नहीं है, बल्कि सदियों से शोषित, दबे-कुचले वर्ग की चीत्कार और सामाजिक न्याय (Social Justice) का शंखनाद है।
कवि आज सुना वह गान रे
- अटल बिहारी वाजपेयी
कवि आज सुना वह गान रे,
जिससे खुल जाएँ अलस पलक।
नस–नस में जीवन झंकृत हो,
हो अंग–अंग में जोश झलक।
ये – बंधन चिरबंधन
टूटें-फूटें प्रासाद गगनचुम्बी
हम मिलकर हर्ष मना डालें,
हूकें उर की मिट जाएँ सभी।
यह भूख-भूख सत्यानाशी
बुझ जाय उदर की जीवन में।
हम वर्षों से रोते आए
अब परिवर्तन हो जीवन में।
क्रंदन – क्रंदन चीत्कार और,
हाहाकारों से चिर परिचय।
कुछ क्षण को दूर चला जाए,
यह वर्षों से दुख का संचय।
हम ऊब चुके इस जीवन से,
अब तो विस्फोट मचा देंगे।
हम धू–धू जलते अंगारे हैं,
अब तो कुछ कर दिखला देंगे।
अरे! हमारी ही हड्डी पर,
इन दुष्टों ने महल रचाए।
हमें निरंतर चूस – चूसकर,
झूम – झूमकर कोष बढ़ाए।
रोटी – रोटी के टुकड़े को,
बिलख–बिलखकर लाल मरे हैं।
इन – मतवाले उन्मत्तों ने,
लूट-लूट कर गेह भरे हैं।
पानी फेरा मर्यादा पर,
मान और अभिमान लुटाया
इस जीवन में कैसे आए,
क्या पाया?
रोना, भूखों मरना, ठोकर खाना,
क्या यही हमारा जीवन है?
हम स्वच्छंद जगत में जन्मे,
फिर कैसा यह बंधन है?
मानव स्वामी बने और—
मानव ही करे गुलामी उसकी।
किसने है यह नियम बनाया,
ऐसी है आज्ञा किसकी?
सब स्वच्छंद यहाँ पर जन्मे,
और मृत्यु सब पाएँगे।
फिर यह कैसा बंधन जिसमें,
मानव पशु से बंध जाएँगे?
अरे! हमारी ज्वाला सारे—
बंधन टूक-टूक कर देगी।
पीड़ित दलितों के हृदयों में,
अब न एक भी हूक उठेगी।
हम दीवाने आज जोश की—
मदिरा पी उन्मत्त हुए।
सब में हम उल्लास भरेंगे,
ज्वाला से संतप्त हुए।
रे कवि! तू भी स्वरलहरी से,
आज आग में आहुति दे。
और वेग से भभक उठें हम,
हृद्-तंत्री झंकृत कर दे।
भावार्थ और काव्यगत विश्लेषण (Poem Meaning & Literary Analysis)
यह कविता हिंदी साहित्य के विद्रोही स्वर का प्रतिनिधित्व करती है। बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' की प्रसिद्ध कविता "कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ" की ही तरह, अटल जी की इस रचना में सामाजिक न्याय (Social Justice) की गहरी तड़प है।
पहला और दूसरा भाग: कविता की शुरुआत एक आह्वान से होती है जहाँ एक आम इंसान (या स्वयं कवि की अंतरात्मा) साहित्यकार से कहता है कि वह कुछ ऐसा रचे जिससे समाज की 'अलस पलकें' (नींद) खुल जाएँ। वह चाहता है कि सदियों से चली आ रही गुलामी की जंजीरें टूटें और अमीरों के गगनचुंबी महल (प्रासाद) ढह जाएं ताकि ग़रीबों की छाती की हूक शांत हो सके।
शोषण और विषमता का मार्मिक चित्रण: "रोटी-रोटी के टुकड़े को बिलख-बिलखकर लाल मरे हैं"—ये पंक्तियाँ पाठक को भीतर तक झकझोर देती हैं। अटल जी उस व्यवस्था पर कड़ा प्रहार करते हैं जहाँ शोषक वर्ग ने गरीबों की 'हड्डियों' पर अपने महल खड़े किए हैं। जिस तरह रामधारी सिंह 'दिनकर' ने अपनी रचनाओं में शोषण के विरुद्ध शंखनाद किया है, वैसे ही अटल जी यहाँ पूंजीपतियों द्वारा गरीबों को लूटकर अपना खजाना भरने पर आक्रोश व्यक्त करते हैं।
अस्तित्ववादी प्रश्न: "मानव स्वामी बने और— मानव ही करे गुलामी उसकी।" कवि समाज के इस कृत्रिम नियम पर सवाल उठाता है। जब सभी मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुए हैं और सभी को एक दिन मृत्यु को प्राप्त होना है, तो फिर धरती पर यह पशुओं जैसा बंधन क्यों?
काव्य शिल्प और ओज गुण (Literary Craft)
- रस और गुण: यह कविता पूर्णतः 'वीर रस' और 'ओज गुण' से परिपूर्ण है। इसमें शब्दों का चयन (जैसे- क्रंदन, चीत्कार, हाहाकार, प्रासाद, उन्मत्त) भावनाओं के वेग को और तीव्र करता है।
- प्रेरणात्मक तत्व: हिंदी की अन्य प्रेरणादायक कविताओं की तरह, इसका अंत निराशा में नहीं बल्कि एक 'जलते अंगारे' और 'विस्फोट' के संकल्प के साथ होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
उत्तर: इस कविता का मुख्य संदेश सामाजिक असमानता, शोषण और अन्याय के खिलाफ विद्रोह करना है। यह कवियों का आह्वान करती है कि वे अपनी लेखनी से सोए हुए समाज में क्रांति की ज्वाला भड़काएं।
उत्तर: इसका तात्पर्य उस शोषक (Oppressor) वर्ग से है, जो गरीबों और मजलूमों का खून पसीना चूसकर अपनी संपत्ति और अट्टालिकाएं (महल) खड़े करते हैं।
उत्तर: यह कविता मुख्य रूप से 'वीर रस' और 'ओज गुण' से परिपूर्ण है, जो पाठकों के मन में विद्रोह और क्रांति (Revolution) का उत्साह जगाती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
अंत में, अटल जी कवि से कहते हैं कि "तू भी स्वरलहरी से, आज आग में आहुति दे"। यह पंक्ति दर्शाती है कि समाज में परिवर्तन केवल हथियारों से नहीं आता; एक सच्चे वैचारिक आंदोलन और साहित्यकारों की कलम भी क्रांति की सबसे बड़ी मशाल होती है। 'कवि आज सुना वह गान रे' हर उस इंसान की आवाज़ है जो व्यवस्था के अत्याचारों से ऊब चुका है और अब एक नया, समान और स्वच्छंद जगत बनाना चाहता है।
क्या आपके अंदर भी इस कविता को पढ़कर राष्ट्रप्रेम और बदलाव की भावना जागी? नीचे कमेंट करके अपनी राय अवश्य दें!
लेख संपादन एवं विश्लेषण: Harsh Nath Jha | हिंदी साहित्य विश्लेषण, समकालीन काव्य अध्ययन एवं Social Philosophy