नोबेल पुरस्कार विजेता रबिन्द्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) की कविताएँ केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा का संगीत हैं। जहाँ उनकी रचना विविध वासनाएँ हैं मेरी (Vividh Vasnaye) हमें ईश्वर के प्रति समर्पण सिखाती है, वहीं आज की यह कविता 'लगी हवा यों मन्द-मधुर इस' हमें जीवन की यात्रा का आनंद लेना सिखाती है।
यह एक बेहतरीन Inspirational Poem In Hindi है, जो एक नाविक और उसकी नाव के रूपक (Metaphor) के माध्यम से अज्ञात की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है। ठीक वैसे ही जैसे पिंजरे की चिड़िया (Pinjre Ki Chidiya) मुक्त गगन में उड़ना चाहती है।
लगी हवा यों मन्द-मधुर इस
Inspirational Poems in Hindi by Rabindranath Tagore
लगी हवा यों मन्द-मधुर इस
नाव-पाल पर अमल-धवल है;
नहीं कभी देखा है मैंने
किसी नाव का चलना ऐसा।
लाती है किस जलधि-पार से
धन सुदूर का ऐसा, जिससे-
बह जाने को मन होता है;
फेंक डालने को करता जी
तट पर सभी चाहना-पाना !
पीछे छरछर करता है जल,
गुरु गम्भीर स्वर आता है;
मुख पर अरुण किरण पड़ती है,
छनकर छिन्न मेघ-छिद्रों से।
कहो, कौन हो तुम ? कांडारी।
किसके हास्य-रुदन का धन है ?
सोच-सोचकर चिन्तित है मन,
बाँधोगे किस स्वर में यन्त्र ?
मन्त्र कौन-सा गाना होगा ?
कविता का भावार्थ (Critical Analysis)
इस कविता में टैगोर जीवन की यात्रा को एक नाव (Boat) के रूप में देखते हैं। वह 'अज्ञात' (Unknown) की ओर जाने के लिए इतने आतुर हैं कि वह तट पर अपनी सभी सांसारिक इच्छाओं (चाहना-पाना) को त्यागने को तैयार हैं।
यह भाव हमें उनकी अन्य रचनाओं में भी मिलता है। जहाँ झाँसी की रानी (Jhansi Ki Rani) में वीरता का स्वर है, वहीं टैगोर की कविताओं में एक शांत, आध्यात्मिक गहराई है। यदि आप जीवन में नई ऊर्जा चाहते हैं, तो साहित्यशाला पर उपलब्ध देशभक्ति कविताएं और टैगोर का काव्य संग्रह अवश्य पढ़ें।