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आज देश की मिट्टी बोल उठी है | Aaj Desh Ki Mitti Bol Uthi Hai (Lyrics & Meaning)

हिंदी साहित्य में जब भी राष्ट्रप्रेम और विद्रोह की बात होती है, शिवमंगल सिंह 'सुमन' का नाम स्वर्ण अक्षरों में चमकता है। उनकी कालजयी रचना 'आज देश की मिट्टी बोल उठी है' (Aaj Desh Ki Mitti Bol Uthi Hai) केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि सदियों से दबी हुई भारतीय आत्मा की चीख है।

यह कविता उस दौर की याद दिलाती है जब सत्ता और शोषण के खिलाफ देशभक्ति कविताओं ने जनमानस में आग लगा दी थी। जिस प्रकार पाकिस्तान में हबीब जालिब का 'दस्तूर' व्यवस्था को चुनौती देता है, उसी प्रकार 'सुमन' जी की यह कविता भारत की मिट्टी की महिमा और उसके क्रोध को व्यक्त करती है।

आइये, इस 'रूला देने वाली देशभक्ति कविता' (Rula Dene Wali Deshbhakti Kavita) का पाठ करें और इसके मर्म को समझें।

Hands holding glowing soil representing the awakening of India in Shivmangal Singh Suman's poem.
"आज देश की मिट्टी बोल उठी है..." — When the dust of the motherland awakens with the fire of revolution.

आज देश की मिट्टी बोल उठी है

कवि: शिवमंगल सिंह 'सुमन'

लौह-पदाघातों से मर्दित
हय-गज-तोप-टैंक से खौंदी
रक्तधार से सिंचित पंकिल
युगों-युगों से कुचली रौंदी।

व्याकुल वसुंधरा की काया
नव-निर्माण नयन में छाया।
कण-कण सिहर उठे
अणु-अणु ने सहस्राक्ष अंबर को ताका

शेषनाग फूत्कार उठे
साँसों से निःसृत अग्नि-शलाका।
धुआँधार नभी का वक्षस्थल
उठे बवंडर, आँधी आई,

पदमर्दिता रेणु अकुलाकर
छाती पर, मस्तक पर छाई।
हिले चरण, मतिहरण
आततायी का अंतर थर-थर काँपा

भूसुत जगे तीन डग में ।
बावन ने तीन लोक फिर नापा।
धरा गर्विता हुई सिंधु की छाती डोल उठी है।
आज देश की मिट्टी बोल उठी है।

आज विदेशी बहेलिए को
उपवन ने ललकारा
कातर-कंठ क्रौंचिनी चीख़ी
कहाँ गया हत्यारा?

कण-कण में विद्रोह जग पड़ा
शांति क्रांति बन बैठी,
अंकुर-अंकुर शीश उठाए
डाल-डाल तन बैठी।

कोकिल कुहुक उठी
चातक की चाह आग सुलगाए
शांति-स्नेह-सुख-हंता
दंभी पामर भाग न जाए।

संध्या-स्नेह-सँयोग-सुनहला
चिर वियोग सा छूटा
युग-तमसा-तट खड़े
मूक कवि का पहला स्वर फूटा।

ठहर आततायी, हिंसक पशु
रक्त पिपासु प्रवंचक
हरे भरे वन के दावानल
क्रूर कुटिल विध्वंसक।

देख न सका सृष्टि शोभा वर
सुख-समतामय जीवन
ठट्ठा मार हँस रहा बर्बर
सुन जगती का क्रंदन।

घृणित लुटेरे, शोषक
समझा पर धन-हरण बपौती
तिनका-तिनका खड़ा दे रहा
तुझको खुली चुनौती।

जर्जर-कंकालों पर वैभव
का प्रासाद बसाया
भूखे मुख से कौर छीनते
तू न तनिक शरमाया।

तेरे कारण मिटी मनुजता
माँग-माँग कर रोटी
नोची श्वान-शृगालों ने
जीवित मानव की बोटी।

तेरे कारण मरघट-सा
जल उठा हमारा नंदन,
लाखों लाल अनाथ
लुटा अबलाओं का सुहाग-धन।

झूठों का साम्राज्य बस गया
रहे न न्यायी सच्चे,
तेरे कारण बूँद-बूँद को
तरस मर गए बच्चे।

लुटा पितृ-वात्सल्य
मिट गया माता का मातापन
मृत्यु सुखद बन गई
विष बना जीवन का भी जीवन।

तुझे देखना तक हराम है
छाया तलक अखरती
तेरे कारण रही न
रहने लायक सुंदर धरती

रक्तपात करता तू
धिक्-धिक् अमृत पीनेवालो,
फिर भी तू जीता है
धिक्-धिक् जग के जीनेवालो!

देखें कल दुनिया में
तेरी होगी कहाँ निशानी?
जा तुझको न डूब मरने
को भी चुल्लू भर पानी।

शाप न देंगे हम
बदला लेने को आन हमारी
बहुत सुनाई तूने अपनी
आज हमारी बारी।

आज ख़ून के लिए ख़ून
गोली का उत्तर गोली
हस्ती चाहे मिटे,
न बदलेगी बेबस की बोली।

तोप-टैंक-एटमबम
सबकुछ हमने सुना-गुना था
यह न भूल मानव की
हड्डी से ही वज्र बना था।

कौन कह रहा हमको हिंसक
आपत् धर्म हमारा,
भूखों नंगों को न सिखाओ
शांति-शांति का नारा।

कायर की सी मौत जगत में
सबसे गर्हित हिंसा
जीने का अधिकार जगत में
सबसे बड़ी अहिंसा।

प्राण-प्राण में आज रक्त की सरिता खौल उठी है।
आज देश की मिट्टी बोल उठी है।

इस मिट्टी के गीत सुनाना
कवि का धन सर्वोत्तम
अब जनता जनार्दन ही है
मर्यादा-पुरुषोत्तम।

यह वह मिट्टी जिससे उपजे
ब्रह्मा, विष्णु, भवानी
यह वह मिट्टी जिसे
रमाए फिरते शिव वरदानी।

खाते रहे कन्हैया
घर-घर गीत सुनाते नारद,
इस मिट्टी को चूम चुके हैं
ईसा और मुहम्मद।

व्यास, अरस्तू, शंकर
अफ़लातून के बँधी न बाँधी
बार-बार ललचाए
इसके लिए बुद्ध औ' गाँधी।

यह वह मिट्टी जिसके रस से
जीवन पलता आया,
जिसके बल पर आदिम युग से
मानव चलता आया।

यह तेरी सभ्यता संस्कृति
इस पर ही अवलंबित
युगों-युगों के चरणचिह्न
इसकी छाती पर अंकित।

बलिवेदी पर विह्वल-जनता जीवन तौल उठी है
आज देश की मिट्टी बोल उठी है।

A green sprout growing from cracked earth symbolizing hope and revolution against oppression and violence.
"अंकुर-अंकुर शीश उठाए..." — Life and freedom rising from the ashes of oppression.

काव्य विश्लेषण: मिट्टी का विद्रोह

यह कविता केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। यहाँ 'मिट्टी' का अर्थ केवल धूल नहीं, बल्कि राष्ट्र की चेतना, उसका इतिहास और उसकी अस्मिता है।

1. शोषण के विरुद्ध हुंकार

कवि ने विदेशी आक्रांताओं और शोषकों को 'बहेलिया' और 'हत्यारा' कहा है। जब सत्ता अंधी हो जाती है और राजनीतिक विद्रूपता चरम पर होती है, तब आम जनता (मिट्टी) का धैर्य टूटता है।

2. अहिंसा और क्रांति का द्वंद्व

गांधीवाद का सम्मान करते हुए भी कवि स्पष्ट करते हैं कि "भूखों नंगों को न सिखाओ शांति-शांति का नारा"। यह पंक्ति हबीब जालिब की उस भावना से मेल खाती है जहाँ वे कहते हैं "हुक्मरान हो गए कमीने लोग"। अस्तित्व की रक्षा के लिए उठाया गया हथियार हिंसा नहीं, 'आपत् धर्म' है।

3. सांस्कृतिक गौरव

कवि याद दिलाते हैं कि यह वही मिट्टी है जहाँ बुद्ध, गांधी, ईसा और मुहम्मद ने प्रेम का संदेश दिया। भारत की सांस्कृतिक विरासत को समझना हो तो बाबा नागार्जुन की कविताओं में भी यही 'मिट्टी की गंध' मिलती है।

कविता का पाठ सुनें (Watch Video)

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निष्कर्ष

'आज देश की मिट्टी बोल उठी है' केवल अतीत की कहानी नहीं है, यह आज भी प्रासंगिक है। जब भी अन्याय होगा, देश की मिट्टी फिर बोलेगी। साहित्यशाला पर ऐसी ही कालजयी रचनाओं को पढ़ते रहें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

'आज देश की मिट्टी बोल उठी है' कविता के रचयिता कौन हैं?

इस ओजस्वी कविता के रचयिता पद्म भूषण से सम्मानित कवि शिवमंगल सिंह 'सुमन' हैं।

इस कविता का मुख्य संदेश क्या है?

कविता का मुख्य संदेश अन्याय, शोषण और विदेशी दास्ता के खिलाफ विद्रोह करना और आत्मसम्मान के साथ जीने का अधिकार प्राप्त करना है।

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