हिंदी साहित्य में माँ (Mother) एक ऐसा विषय है जिस पर जितनी भी कलम चलाई जाए, स्याही कम पड़ जाती है। मुनव्वर राना से लेकर सुभद्रा कुमारी चौहान तक, सबने माँ के आंचल को शब्दों में बांधने की कोशिश की है। इसी कड़ी में, आज साहित्यशाला के मंच पर हम एक युवा कलमकार और उभरते हुए कवि निखिल भारतेन्दु की एक मर्मस्पर्शी रचना प्रस्तुत कर रहे हैं।
उनकी कविता "एक फूल ऐसा भी" (Ek Phool Aisa Bhi) केवल शब्दों का जमावड़ा नहीं है, बल्कि एक संतान द्वारा अपनी माँ के प्रति कृतज्ञता (Gratitude) का एक दस्तावेज है। यदि आप माँ पर हिंदी कविता (Hindi Poem on Mother) की तलाश में हैं जो दिल को छू ले, तो यह रचना आपकी आँखों को नम और गर्व से भर देगी।
|
| "दुनिया की नज़र न लगे, इसलिए काला टीका मलती है।" - माँ के निस्वार्थ प्रेम और सुरक्षा का प्रतीक। |
कविता का मर्म: माँ, मिट्टी और संस्कार
निखिल जी की यह कविता माँ की तुलना 'वसुंधरा' (Earth) से करती है। जैसे धरती सब कुछ सहकर भी हमें अनाज देती है, वैसे ही माँ तमाम कष्ट सहकर अपनी संतान को संस्कारों से सींचती है। कवि ने बड़ी खूबसूरती से दिखाया है कि कैसे एक माँ अपने बच्चे (फूल) को दुनिया की धूप-छांव से बचाती है और उसे भविष्य के लिए तैयार करती है।
एक फूल ऐसा भी
(रचयिता: निखिल भारतेन्दु)
उस मां के लिए क्या लिखूं जिसने स्वयं मुझे लिखा है |
माँ तुम कैसी हो !
या यूं कहूं तुम देवी जैसी हो,
या सच में मां तुम देवी हो |
माँ तुम कितनी प्यारी हो,
या यूं कहूं मैं ही तुम्हारा प्यारा हूं |
"एक फूल ऐसा भी"
माँ ममत्व की भूमि होती है,
जो अपनी संतान को बोती है
उसे, रक्त रूपी जल से सींचती है |
वह वसुंधरा सा वजन ढोती है,
धूप और गर्मी की तपन से
अपने फूल को बचाकर रखती है |
बारिश हो या, ओस की बूंदे
कभी ना भिगने देती है
माँ ममत्व की भूमि होती है | [1]
ममता की स्नेह स्पंदन से,
फूलों की किलकारी को
आंचल से वह ढकती है |
दुनिया की नज़र न लगे
इसलिए काला टीका मलती है,
माँ ममत्व की भूमि होती है | [2]
राहों में उन फूलों के पलकें बिछाती है
वर्तमान में देखकर उन फूलों के लिए
भविष्य का सपना संजोती है
चाहती है मेरा फूल सदा महके
दुनिया-ए-गुलशन में
त्याग पाप, हाथ पकड़ सच ईमान का
ज्ञान से उस फूल में खुशबू भरती है
माँ ममत्व की भूमि होती है | [3]
ज्ञान रखो देश पर अभिमान रखो
सच्चाई की तुम ढाल बनो
दीनों की तुम आज बनो
स्त्री की तुम लाज रखो,
ओज-तेज और शिष्टता हृदय में ढोकर
खुद को रण में तैयार करो
माँ फूल को यह उपदेश देती है
माँ ममत्व की भूमि होती है | [4]
माँ की ममता से अछूता,
निश्चय ही वह अभागा है
माँ की ममता मोती सा पिरोले
वह अटूट धागा है |
शोक की संतप्त गलियों से
शीत हृदय की बूंद बनो
कहती तुम वीर बनो, सत्कर्म करो
मेरे प्रिय फूल तुम सुनो
मेरे हृदय की पुकार बनो
माँ की दुआएँ खाली नहीं जाती हैं,
माँ ममत्व की भूमि होती है | [5]
साहित्यिक विवेचना (Literary Analysis)
इस कविता की सबसे बड़ी शक्ति इसकी सरलता (Simplicity) है। कवि ने क्लिष्ट हिंदी के बजाय उन शब्दों का प्रयोग किया है जो सीधे दिल में उतर जाते हैं।
- उपमा अलंकार: माँ को 'ममत्व की भूमि' और संतान को 'फूल' कहा गया है। यह बिंब (Imagery) दिखाता है कि जैसे मिट्टी के बिना फूल का अस्तित्व नहीं, वैसे ही माँ के बिना संतान अधूरी है।
- जीवन मूल्य (Moral Values): चौथा और पांचवां छंद (Stanza) केवल ममता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रप्रेम और नारी सम्मान की बात करता है। "स्त्री की तुम लाज रखो" और "देश पर अभिमान रखो" जैसी पंक्तियाँ एक माँ की परवरिश की असली परीक्षा को दर्शाती हैं।
|
| "बारिश हो या, ओस की बूंदे, कभी ना भिगने देती है" - माँ का आंचल बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित पनाहगाह है। |
✍️ कवि परिचय
नाम: निखिल भारतेन्दु (Nikhil Bhartendu)
पिता: श्री सुरेश भारतेन्दु
शिक्षा: एम.ए. अंग्रेजी (तृतीय सेमेस्टर)
स्थान: बेमेतरा, छत्तीसगढ़
विशेष: निखिल एक विद्यार्थी होने के साथ-साथ साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं और अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को सकारात्मक संदेश देने का प्रयास करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'एक फूल ऐसा भी' कविता का मुख्य भाव क्या है?
इस कविता का मुख्य भाव वात्सल्य रस (Motherly Love) और संस्कारों का महत्व है। इसमें माँ को एक ऐसी भूमि बताया गया है जो न केवल बच्चे को जन्म देती है, बल्कि उसे देश और समाज के लिए एक श्रेष्ठ नागरिक बनाती है।
2. यह कविता किसके द्वारा लिखी गई है?
यह कविता बेमेतरा, छत्तीसगढ़ के युवा कवि और छात्र निखिल भारतेन्दु द्वारा लिखी गई है।
आपको निखिल जी की यह रचना कैसी लगी? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। यदि आपके पास भी ऐसी कोई मौलिक रचना है, तो साहित्यशाला पर प्रकाशन हेतु हमें भेजें।
अपनी कविता भेजें