धीर, वीर, गंभीर कर्ण था MAHABHARATA KAVITA धीर, वीर, गंभीर कर्ण था Mahabharata Kavita | Dheer, Veer, Gambheer Karna Tha | Abhay Nirbheek Dheer, Veer, Gambheer Karna Tha ✍Abhay Nirbheek धीर, वीर, गंभीर कर्ण था युद्ध नीति का ज्ञानी वीर न उसके जैसा था न उसके जैसा दानी तीर चलाता विद्युत्-सा वो, शस्त्रों का अभ्यासी वाणी से शास्त्रार्थ करे तो लगता था सन्यासी नभ तक गुंजित होती उसकी धनवा की टंकार तीर कर्ण के जाकर, गिरते सागर के भी पार तप के बल से बज्रशरीखे थे उसके भुजदंड क्षणभर में वो कर देता था गिरके अनगिन खंड रण-कौशल में उसके जैसा जग में और नहीं था दुनिया के लाखों प्रश्नों का उत्तर सिर्फ वही था | धीर, वीर, गंभीर कर्ण था Mahabharata Kavita | Dheer, Veer, Gambheer Karna Tha | Abhay Nirbheek रण-थल का आभूषण था वह, धरती का सम्मान पन्नों में इतिहास के वो है वीरों की पहचान। कर्ण चला समरांगण में अर्जुन का तेज परखने धनवा से नरमुंड उठाने ग्रीवा पर असि रखने कुरुक्षेत्र में स्वाद युद्ध का चखने और चखाने शूर-वीर राधेय चला अब रण-कौशल दिखलाने महावीर जब रथ पर चढ़कर समर-भूम...
|| महाभारत पर रोंगटे खड़े कर देने वाली कविता || || Mahabharata Poem On Arjuna || तलवार, धनुष और पैदल सैनिक कुरुक्षेत्र में खड़े हुए, रक्त पिपासु महारथी इक दूजे सम्मुख अड़े हुए | कई लाख सेना के सम्मुख पांडव पाँच बिचारे थे, एक तरफ थे योद्धा सब, एक तरफ समय के मारे थे | महा-समर की प्रतिक्षा में सारे ताक रहे थे जी, और पार्थ के रथ को केशव स्वयं हाँक रहे थे जी || रणभूमि के सभी नजारे देखन में कुछ खास लगे, माधव ने अर्जुन को देखा, अर्जुन उन्हें उदास लगे | कुरुक्षेत्र का महासमर एक पल में तभी सजा डाला, पांचजन्य उठा कृष्ण ने मुख से लगा बजा डाला | हुआ शंखनाद जैसे ही सब का गर्जन शुरु हुआ, रक्त बिखरना हुआ शुरु और सबका मर्दन शुरु हुआ | कहा कृष्ण ने उठ पार्थ और एक आँख को मीच जड़ा, गाण्डिव पर रख बाणों को प्रत्यंचा को खींच जड़ा | आज दिखा दे रणभूमि में योद्धा की तासीर यहाँ, इस धरती पर कोई नहीं, अर्जुन के जैसा वीर यहाँ || सुनी बात माधव की तो अर्जुन का चेहरा उतर गया, ...