सूर्यपुत्र कर्ण कविता (पूर्ण पाठ) | कर्ण पर कविता | कवि विनीत चौहान
राष्ट्रकवि विनीत चौहान द्वारा रचित दानवीर कर्ण की वीरता, कवच-कुंडल दान और कुरुक्षेत्र महासमर का सजीव वर्णन।
विषयसूची (Table of Contents)
साहित्यिक सुझाव: कुरुक्षेत्र में उतरने से पहले, भगवान कृष्ण का वह रौद्र रूप जिसने हस्तिनापुर को हिला दिया था—पढ़ें कृष्ण की चेतावनी (रश्मिरथी)।
कवि विनीत चौहान के स्वर में कविता पाठ
सूर्यपुत्र कर्ण कविता: सम्पूर्ण पाठ (Full Lyrics)
निज कवच और कुंडल जिसने सुरपति को हँस कर दिये दान,
मरने तक वचन नहीं तोड़ा निज म्रत्यु का रख लिया मान |
जिसके भुजबल मे बसते थे, युध्दो के सारे निर्णय भी,
वो सूर्य पुत्र, वो रश्मिरथी, वो दान वीर अतुलित महान ||
रण के निर्णय मानव इतने नही कभी भी होते,
धर्म बिछे यदि चौसर पर तो भाग्य मनुज के रोते |
न्याय और अन्याय कभी जब एक तुला पर तुलते,
पीड़ा और घुटन मिलकर जब आँसू भीतर घुलते ||
तो समझो उस महा म्रत्यु को तांडव रत होना है,
कुरुक्षेत्र के प्रांगण मे तब महाभारत होना है |
युद्धो ने मानव का लहु अनगिन बार पिया है,
कुरुक्षेत्र मे भी प्राणोत्सव अनगिन बार जिया है ||
कुरुक्षेत्र भी न्याय और अन्याय युगल संगम था,
हार और झूठ सत्य का ना कोई भी गम था |
सूर्य पुत्र, वह रश्मिरथी भी इसी नियती का हिस्सा,
दिवस अढाई रहा समर मे कीर्ति कथा का किस्सा |
गुरु द्रोण के बाद कर्ण ही सेना का नायक था,
और उधर अर्जुन के रथ पर गीता का गायक था |
दुर्योधन ने किया निवेदन पास शल्य के जाकर,
सुना शल्य ने जैसे ही वो बोले यु चिल्लाकर -
सूत पुत्र है कर्ण और मै गर्वित मद्र राज हूँ,
भुज बल मे है तुच्छ कर्ण मै उन्नत शैल राज हूँ |
मै उसका रथ हाँकू ऐसा अगर समय आयेगा,
तो भी इस दुसाहस का भी दंड कर्ण पायेगा |
विनत सुयोधन बोले - सचमुच मेरी मजबूरी है,
बिना आपके रण मे उसकी जैसे भी दूरी है |
केशव ने भी मित्र धर्म में अर्जुन का रथ हाँका,
इसिलिये तो रण मे उसका हुआ बाल कब बाँका |
अगर आप बन गये सारथी साहस ना रीतेगा,
अर्जुन का वध करके ही बस कर्ण समर जीतेगा ||
अनुनय और विनय के आगे सदा हारती हठ है,
स्वीक्रतिया बन गयी सहज ही नाना की जो रट है |
शल्य कर्ण के बने सारथी, जो खुद महारथी थे,
रण भेरी बज गयी युद्ध की शस्त्रो सहित रथी थे ||
लगे युद्ध मे बाण बरसने - तलवारे चमती थी,
गदा भीम की पड़ती थी तो धरती भी गमकी थी |
अर्जुन और कर्ण के बाणो से बरसी ज्वाला सी,
रण चंडी पहने जाती थी मुंडो की माला सी ||
एक-एक कर रथी और योद्धा कट गये हजारो,
संम्रागण मे गूंज रहा था सर्वस्व मारो-मारो |
आज खून की कीमत पानी से ज्यादा सस्ती थी,
कौन कर्ण के आगे टिकता किसकी ये हस्ती थी ||
किंतु शल्य के कटु वचनो को कर्ण साथ सहता था,
बाण सहु या व्यंग बाण निर्णय करता रहता था !!
तभी युधिष्टर का रथ उसके रथ के आगे आया,
भरे क्रोध से अंगराज ने घातक बाण चलाया |
लगे काँपने धर्मराज जो काल सामने आया,
भागे शस्त्र छोड़ रण थल से ऐसा जी घबराया ||
लेकिन रश्मिरथि ने उनको पीछे से जा पकड़ा,
धर्मराज को लगा म्रत्यु ने आज उन्हे आ जकड़ा |
हँस कर बोले कर्ण युधिष्टर क्यो लड़ने आते हो ?
ये बच्चो का खेल नही जो पीठ दिखा जाते हो |
जाओ माँ कुंती से कहना वचन नही तोड़ूगा,
अर्जुन के अतिरिक्त सभी को जिंदा ही छोड़ूगा ||
कहा कर्ण ने शल्य सदा कायर बाते करते हो,
रश्मिरथि के रथ पर हो कर क्यो इतना डरते हो |
सूर्य पुत्र को रण मे मारे ऐसा भू पर बाण कहा है ?
विजय विवश हो पीछे आती चलता कर्ण जहा है ||
आज समझ लो कुरुक्षेत्र मे इतना लहू बहेगा,
कर्ण और अर्जुन से बस जीवित एक रहेगा |
केशव ने भी अर्जुन को कर सावधान समझाया,
अर्जुन ने गांडीव उठाकर पहला बाण चलाया |
राधा पुत्र समर कौशल ना अर्जुन से कम था,
निभा रहा था मित्र धर्म ना पाप पुण्य का गम था ||
क्या कौंतेय और राधा के सुत के बीच समर था ?
नही इधर था दूध प्रथा का लड़ता रक्त उधर था |
आखिर सर्प बाण तरकश से हाथ कर्ण के आया,
अब अर्जुन का वध निश्चित है हर सैनिक चिल्लाया |
प्रत्यंचा कानो तक खींची,बाण कर्ण ने छोड़ा,
केशव ने रथ के घोड़ो को त्वरित दाहिने मोड़ा ||
घुटनो तक झुक गये अश्व बस बाण कंठ तक आया,
किंतु लगा वह दिव्य मुकुट मे प्रभु की थी सब माया |
इधर कर्ण के संग पार्थ का रिपु तक्षक बेटा था,
अश्वसेन तरकश मे था जो तीर संग लेटा था |
कहा कर्ण से - रखो बाण पर प्राण पार्थ के लूंगा,
मेरा प्रण पूरा हो तुम उपकार नही भूलूंगा |
कहा कर्ण ने - बाण दोबारा मै संधान ना करता,
अपने ही बलबूते पर मै विजय श्री को वरता |
सर्पो के बल पर रण मे यदि कर्ण युद्ध जीतेगा ?
जितना समय बचा जीवन मे लानत मे बीतेगा ||
तभी कर्ण का रथ थोड़ा सा एक तरफ झुकाया,
पहिया लगा भुमि मे धँसने देख कर्ण घबराया ||
याद आ गया श्राप गऊ का विचलित अंगराज था,
परशुराम का दिव्य अस्त्र भी विसमित हुआ आज था |
विवश कर्ण ने धनुष रखा फिर रथ के नीचे उतरा,
शस्त्रहीन वो विरत खड़ा था ले प्राणो का खतरा |
अर्जुन कुछ कहते इससे पहले ही केशव बोले -
कर्ण धर्म की बाते पहले दिल के भीतर तोले |
कहा गया था धर्म तुम्हारा जब अभिमन्यु मारा,
शकुनि के पासो से हमने राज जुऐ मे हारा,
आज म्रत्यु सिर पर नाची तो याद धर्म करते हो,
शस्त्र उठाओ युद्ध करो या अगले पल मरते हो |
कहा कर्ण ने पाप पुण्य का निर्णय वक्त करेगा,
पर जो यम से डरता है जो पल-पल सदा मरेगा |
होकर विवश कर्ण ने अपना धनुष उठाया कर मे,
और भरी सब दिव्य शक्तियाँ एक-एककर कर मे |
तभी मुर्छित हुये पार्थ और कर्ण बली घायल थे,
दोनो के रण कौशल से योद्धा तक कायल थे |
तभी कर्ण के दिव्य बाण से मुर्छित पार्थ हुये थे,
और कर्ण कोशिश की बस रथ के चक्र छुऐ थे ||
केशव बोले यही समय है पार्थ कर्ण को मारो !
पाप पुण्य का चक्कर छोड़ो ज्यादा नही विचारो |
तंद्रा भंग हुई अर्जुन की झट गांडीव उठाया,
लक्ष्य साध कर विरत कर्ण पर तीखा बाण चलाया ||
कटा शीश तब रश्मिरथी का भू पर पड़ा हुआ था,
लेकिन जय पाकर भी अर्जुन लज्जित खड़ा हुआ था |
पांचजन्य फूंका केशव ने पांडव सब हर्षाये,
दुर्योधन ने महाम्रत्यु पर अश्रु बिंदु छलकाये ||
आज विदा हो गया धरा से वचन निभाने वाला,
नही जगत मे था मैत्री का धर्म सिखाने वाला |
प्रणपालक को दानवीर जो रहा भाग्य का हेटा,
प्रथा पुत्र या सूत पुत्र था समर भूमि मे लेटा |
आज युधिष्टर सोयेगे बस सुख से आँखे मूंदे |
और कही कुंती के द्रग से छलकेगी कुछ बूंदे ||
सूर्यपुत्र कर्ण कविता का भावार्थ (Summary)
विनीत चौहान जी की यह कविता कर्ण के अंतर्मन के द्वंद्व, उनके पराक्रम और उनके साथ हुए अन्याय का एक मनोवैज्ञानिक दस्तावेज है। कविता प्रारंभ होती है कर्ण की सबसे बड़ी पहचान—उनके त्याग से, जहाँ वे जानते हुए भी कि इंद्र छल कर रहे हैं, अपना रक्षा-कवच दान कर देते हैं।
रणभूमि में कर्ण केवल अर्जुन से नहीं लड़ रहे थे, बल्कि वे अपनी नियति, परशुराम के श्राप, और अपने ही सारथी शल्य के कटु वचनों से भी संघर्ष कर रहे थे। जब कर्ण का रथ भूमि में धंस जाता है और वे धर्म की दुहाई देते हैं, तब श्रीकृष्ण (केशव) उन्हें द्रोपदी चीरहरण और अभिमन्यु वध की याद दिलाकर उनके 'धर्म' पर प्रश्न उठाते हैं। अंततः, अंजलि बाण से कर्ण का वध होता है, लेकिन कविता यह सिद्ध करती है कि कर्ण युद्ध हारकर भी अपनी मित्रता और दानवीरता के कारण इतिहास जीत गए।
कविता से प्रेरित कर्ण के 5 विचार (Best Karna Quotes)
इस कविता की पंक्तियों में जीवन के गहरे सूत्र छिपे हैं। इन पंक्तियों का विश्लेषण हमें कर्ण के चरित्र की महानता समझाता है:
सार: व्यक्ति की पहचान उसके वचन से होती है। प्राण देकर भी वचन निभाना ही असली धर्म है।
सार: कर्ण ने अश्वसेन (सर्प) की सहायता लेने से इंकार कर दिया। यह उनके अडिग आत्मविश्वास को दर्शाता है।
सार: मृत्यु शाश्वत है। जो मृत्यु से डरता है, वह जीवन का आनंद नहीं ले सकता।
सार: दुर्योधन के लाख अवगुणों के बावजूद कर्ण ने मित्रता का जो आदर्श रखा, वह अद्वितीय है।
सार: कर्ण का पराक्रम इतना प्रचंड था कि वे अकेले युद्ध का परिणाम बदल सकते थे।
सूर्यपुत्र कर्ण पर प्रसिद्ध श्लोक (Karn Shlok in Hindi)
दैवायत्तं कुले जन्म मदायत्तं तु पौरुषम्॥"
अर्थ: मैं सूत हूँ या सूतपुत्र, अथवा कोई और, यह मेरे हाथ में नहीं है। किसी भी कुल में जन्म लेना ईश्वर के अधीन है, परन्तु पौरुष (कर्म और पराक्रम) मेरे अपने अधीन है।
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कवि परिचय: विनीत चौहान भारत के प्रसिद्ध वीर रस के मंचीय कवि हैं, जो अपनी ओजस्वी वाणी और भारतीय संस्कृति के प्रसंगों को जीवंत करने के लिए जाने जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. कर्ण को दानवीर क्यों कहा जाता है?
कर्ण ने सूर्यदेव की चेतावनी के बावजूद, ब्राह्मण भेष में आए इन्द्र को अपने अभेद्य कवच-कुंडल दान में दे दिए थे। मृत्यु का भय भी उन्हें दान देने से नहीं रोक सका।
2. यह 'सूर्यपुत्र कर्ण' कविता किसने लिखी है?
यह वीर रस से परिपूर्ण ओजस्वी कविता सुप्रसिद्ध मंचीय कवि विनीत चौहान जी द्वारा रचित है।
3. महाभारत के युद्ध में कर्ण का सारथी कौन था?
महाभारत युद्ध में मद्रदेश के राजा शल्य (नकुल और सहदेव के सगे मामा) कर्ण के सारथी बने थे, जिन्होंने लगातार कर्ण को हतोत्साहित किया।
4. कर्ण किसके पुत्र थे?
कर्ण भगवान सूर्य और माता कुंती के सबसे बड़े पुत्र थे, लेकिन उनका पालन-पोषण एक सूत दंपति (अधिरथ और राधा) ने किया था। इसीलिए उन्हें 'राधेय' भी कहा जाता है।
5. कर्ण की मृत्यु कैसे हुई?
कुरुक्षेत्र के मैदान में जब परशुराम के श्राप के कारण कर्ण का रथ धरती में धंस गया और वे निहत्थे पहिया निकाल रहे थे, तब भगवान कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने अंजलिनामक बाण से उनका वध किया।
6. कर्ण के कवच-कुंडल की क्या विशेषता थी?
कर्ण जन्म से ही दिव्य कवच और कुंडल पहने हुए थे। जब तक ये उनके शरीर पर थे, दुनिया का कोई भी अस्त्र या देवता उन्हें मार नहीं सकता था।