जीवन एक अनवरत यात्रा है, और हम सब इसके यात्री हैं। हिंदी साहित्य के 'हालावाद' के प्रवर्तक और महान कवि हरिवंश राय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan) की कविता "यात्रा और यात्री" (Yatra Aur Yatri) हमें यही सिखाती है। यह केवल एक कविता नहीं, बल्कि जीवन के संघर्ष पथ पर चलते रहने का एक मंत्र है।
अक्सर छात्र और साहित्य प्रेमी इस कविता का भावार्थ (Summary) और मूल संदेश खोजते हैं। इस लेख में, हम न केवल हरिवंश राय बच्चन की इस कालजयी रचना का पूरा पाठ प्रस्तुत कर रहे हैं, बल्कि इसका विस्तृत वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी साझा कर रहे हैं।
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| An artistic tribute to the timeless journey of life described in 'Yatra Aur Yatri'. |
यात्रा और यात्री - हरिवंश राय बच्चन (Hindi Poem Lyrics)
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
चल रहा है तारकों का
दल गगन में गीत गाता
चल रहा आकाश भी है
शून्य में भ्रमता-भ्रमाता
पाँव के नीचे पड़ी
अचला नहीं, यह चंचला है
एक कण भी, एक क्षण भी
एक थल पर टिक न पाता
शक्तियाँ गति की तुझे
सब ओर से घेरे हुए है
स्थान से अपने तुझे
टलना पड़ेगा ही, मुसाफिर!
(साँस चलती है तुझे, चलना पड़ेगा ही मुसाफिर...)
यह कविता बच्चन जी की उस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ 'गति' ही जीवन है। जैसा कि Hindwi और Wikipedia पर उनके जीवन परिचय में उल्लेखित है, बच्चन जी का साहित्य निराशा से आशा की ओर ले जाने वाला साहित्य है।
कविता का भावार्थ और विश्लेषण (Summary & Meaning)
मूल संदेश (Central Theme): "यात्रा और यात्री" का मुख्य भाव यह है कि ठहराव मृत्यु है और गति जीवन है। कवि कहते हैं कि जब तक शरीर में साँस है, मनुष्य को कर्म करते रहना होगा।
1. प्रकृति की गतिशीलता
कवि तर्क देते हैं कि ब्रह्माण्ड में कुछ भी स्थिर नहीं है। तारे चल रहे हैं, आकाश भ्रम रहा है, और जिस पृथ्वी (अचला) पर हम खड़े हैं, वह भी वास्तव में 'चंचला' (गतिशील) है। जब प्रकृति का एक भी कण नहीं रुकता, तो मनुष्य को रुकने का क्या अधिकार है?
2. बाधाओं का महत्व (Struggle)
जीवन पथ सरल नहीं है। बच्चन जी लिखते हैं, "शूल कुछ ऐसे, पगों में चेतना की स्फूर्ति भरते।" यानी रास्ते के कांटे (मुसीबतें) हमें रुकने नहीं देते, बल्कि दर्द के कारण हम और तेज़ चलने लगते हैं। यह दर्शन उनकी एक और प्रसिद्ध कविता "पथ की पहचान" से मेल खाता है, जहाँ वे चलने से पहले रास्ता पहचानने की बात करते हैं।
3. अतीत और भविष्य से परे
कवि कहते हैं कि पुरानी यादों (सुधियाँ) में खोना या केवल भविष्य के सपने (स्वप्न) देखना व्यर्थ है। वर्तमान की सच्चाई (Truth of the Present) पर चलना ही असली धर्म है।
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| Visualizing the verse: "Shool kuch aise pagon mein chetna ki sphurti bharte" (Thorns that inspire us to move faster). |
मनोवैज्ञानिक और शारीरिक विश्लेषण (Critical Analysis)
इस कविता को केवल साहित्य तक सीमित रखना उचित नहीं होगा। यदि हम आधुनिक विज्ञान के नजरिए से देखें, तो बच्चन जी की पंक्तियाँ मानव मनोविज्ञान और शरीर क्रिया विज्ञान (Physiology) की गहरी समझ दर्शाती हैं।
1. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण (Psychological Perspective)
मनोविज्ञान में 'Behavioral Activation' (व्यवहार सक्रियता) एक सिद्धांत है जो मानता है कि अवसाद (Depression) अक्सर स्थिरता या 'रुक जाने' से उत्पन्न होता है। कवि जब कहते हैं—"स्थान से अपने तुझे टलना पड़ेगा"—तो वे मानसिक जड़ता (Mental Inertia) को तोड़ने की बात कर रहे हैं। कांटे या 'शूल' यहाँ 'Post-Traumatic Growth' का प्रतीक हैं, जहाँ संघर्ष मनुष्य की मानसिक चेतना को और अधिक जागृत कर देता है।
2. शारीरिक दृष्टिकोण (Physiological Perspective)
कविता की पहली पंक्ति "साँस चलती है" एक जैविक सत्य (Biological Fact) है। हमारा श्वसन तंत्र (Respiratory System) और हृदय कभी विश्राम नहीं करते। शरीर का धर्म 'गति' है। यदि रक्त का प्रवाह रुक जाए, तो जीवन समाप्त हो जाता है। अतः मुसाफिर (मनुष्य) का चलना कोई दार्शनिक चुनाव नहीं, बल्कि एक जैविक अनिवार्यता (Biological Necessity) है। जैसा न्यूटन का गति का नियम कहता है, ब्रह्मांड में हर वस्तु गतिमान है, इसलिए स्थिर रहना प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है।
रोचक बात यह है कि हिंदी साहित्य में 'यात्री' शब्द का बहुत गहरा महत्व रहा है। जहाँ बच्चन जी ने दार्शनिक रूप से यात्री की बात की, वहीं जनवादी कवि नागार्जुन का तो उपनाम ही 'यात्री' था। आप हमारे ब्लॉग पर बाबा नागार्जुन (यात्री) का दुर्लभ साक्षात्कार भी पढ़ सकते हैं, जिससे आपको हिंदी के 'यात्री' कवियों की विचारधारा समझने में मदद मिलेगी।
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इस कविता के भाव को गहराई से समझने के लिए, इसका सस्वर पाठ सुनें:
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यदि आप स्कूल या कॉलेज के छात्र हैं और इस कविता की सप्रसंग व्याख्या, कठिन शब्दार्थ और प्रश्न-उत्तर चाहते हैं, तो नीचे दिए गए लिंक से विस्तृत PDF डाउनलोड करें।
हरिवंश राय बच्चन की यह कविता हमें हार न मानने की प्रेरणा देती है। चाहे आप साहित्य के विद्यार्थी हों या जीवन की कठिनाइयों से जूझ रहे हों, "मुसाफिर" बनकर चलते रहना ही एकमात्र विकल्प है। यदि आपको मैथिली या अन्य भारतीय भाषाओं की कविताओं में रुचि है, तो आप हमारी मैथिली काव्य शाखा पर भी जा सकते हैं।
Frequently Asked Questions (FAQ)
Q: 'यात्रा और यात्री' कविता के कवि कौन हैं?
Q: 'साँस चलती है तुझे चलना पड़ेगा ही मुसाफिर' का क्या अर्थ है?

