मानवीय संवेदनाओं के गहरे धरातल पर लिखी गई यह रचना, 'खाली होता जाता हूँ' (Khaali Hota Jaata Hun), उस मौन पीड़ा का चित्रण है जिसे अक्सर शब्दों में पिरोना कठिन होता है। कवि हर्ष नाथ झा (Harsh Nath Jha) यहाँ एक ऐसे एकाकीपन (Loneliness) की बात करते हैं जो भीड़ में भी व्यक्ति का पीछा नहीं छोड़ता।
जिस प्रकार 'बिंदी' (Bindi) में संबंधों की गरिमा और 'संयुक्त अक्षर' (Sanyuktakshar) में जीवन की जटिलता दिखाई देती है, वैसे ही यह कविता 'विजय में छिपी पराजय' और 'हृदय के रिक्त स्थान' को परिभाषित करती है।
खाली होता जाता हूँ | Khaali Hota Jaata Hun
ये आँसू बहते क्यों नहीं
क्यों नहीं मैं रो पाता हूँ ?
अंदर क्यों इतना खाली हूँ ?
क्यों खाली होता जाता हूँ ?
ये डर नहीं, फिर है क्या ?
ये बिना चोट का दर्द है
जो जज़्बा दिल में खत्म हुआ
शायद उसी का सर्द है ।
किस पर मैं करूँ क्रोध भला
किसको गलत ठहराऊँ मैं ?
क्यों नहीं मैं रो पाता हूँ
क्यों ख़ुद को तड़पाऊँ मैं ?
मैं तूफ़ानों में चलने का आदी हूँ (Motivational Poem)
हर बार मैं जीत के भी
हार ही क्यों जाता हूँ ?
अंदर क्यों इतना खाली हूँ ?
क्यों खाली होता जाता हूँ ?
किस पर करूँ भरोसा मैं ?
जब भरोसा ख़ुद में खो रहा हूँ
किससे आँसू छिपाऊँ जब
बिन आँसू के रो रहा हूँ ?
मुझको सब गलत क्यों लगता है ?
मैं अब किससे डरता हूँ ?
कैसी मेरी ये जीत है?
मैं तो हर पल मरता हूँ ।
किस दिन आँसू बहाऊँगा मैं ?
किस दिन फिर रो पाऊँगा ?
अंदर क्यों इतना खाली हूँ ?
क्यों खाली होता जाता हूँ ?
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| A visual interpretation of the inner void expressed in 'खाली होता जाता हूँ'. |
काव्य-समीक्षा (Editorial Note)
प्रस्तुत कविता में हर्ष नाथ झा ने जीवन के उस विरोधाभास को रेखांकित किया है जहाँ 'जीत' का अर्थ 'सफलता' नहीं, बल्कि 'अकेलापन' हो जाता है। यह रचना पाठकों को श्री कृष्ण के उस दर्शन की याद दिलाती है जहाँ युद्ध बाहर नहीं, अपितु भीतर लड़ा जाता है।
यदि आप साहित्य की गहराइयों में रुचि रखते हैं, तो मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर और राष्ट्रप्रेम की कविताओं का अध्ययन भी अवश्य करें। यह ब्लॉग (Sahityashala) साहित्य के इन्हीं विविध रंगों को समर्पित है।