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Mahadevi Verma Ji Ki Hindi Kavita - अतिथि से | Atithi Se - महादेवी वर्मा जी की हिंदी कविता

Mahadevi Verma Ji Ki Hindi Kavita 

महादेवी वर्मा जी की हिंदी कविता 

अतिथि से | Atithi Se


बनबाला के गीतों सा

निर्जन में बिखरा है मधुमास,

इन कुंजों में खोज रहा है

सूना कोना मन्द बतास।

Mahadevi Verma Ji Ki Hindi Kavita - अतिथि से  Atithi Se - महादेवी वर्मा जी की हिंदी कविता

नीरव नभ के नयनों पर

हिलतीं हैं रजनी की अलकें,

जाने किसका पंथ देखतीं

बिछ्कर फूलों की पलकें।


मधुर चाँदनी धो जाती है

खाली कुलियों के प्याले,

बिखरे से हैं तार आज

मेरी वीणा के मतवाले;

Mahadevi Verma Ji Ki Hindi Kavita - अतिथि से  Atithi Se - महादेवी वर्मा जी की हिंदी कविता

पहली सी झंकार नहीं है

और नहीं वह मादक राग,

अतिथि! किन्तु सुनते जाओ

टूटे तारों का करुण विहाग।

-

महादेवी वर्मा

Mahadevi Verma Ji Ki Hindi Kavita - अतिथि से | Atithi Se - महादेवी वर्मा जी की हिंदी कविता



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Baba Jani Poem Lyrics: पिता-पुत्र की इस रुला देने वाली कविता ने लाखों दिलों को छुआ!

साहित्य का मूल उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के उन पृष्ठों को खोलना है जिन पर अक्सर धूल जम जाती है। "बाबा जानी" (Baba Jani) आधुनिक दौर की एक ऐसी ही मार्मिक रचना है, जो पीढ़ियों के बीच पनपते संवादहीनता (Generational Gap) और वृद्धावस्था के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को बड़ी सूक्ष्मता से उकेरती है। जिस तरह सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की 'सरोज स्मृति' ने एक पिता के असीम वात्सल्य और शोक को अमर कर दिया, ठीक उसी तरह यह कविता एक वृद्ध, असहाय पिता और उसके अधीर, युवा बेटे के बीच के उस जटिल संवाद को प्रस्तुत करती है, जो आज के समाज का एक कड़वा यथार्थ बन चुका है। हिंदी साहित्य में जहाँ एक ओर धूमिल की 'किस्सा जनतन्त्र' जैसे रचनाओं में व्यवस्था और रोज़गार का संघर्ष झलकता है, और दिनकर की 'व्याल विजय' में सत्ता का वैचारिक द्वंद्व दिखाई देता है; वहीं, 'बाबा जानी' घर की चारदीवारी के भीतर चलने वाले उस मौन संघर्ष को स्वर देती है जहाँ मनुष्य की शारीरिक लाचारी उसके आत्मसम्मान से टकराती है...