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Suna Hai Log Use Aankh Bhar Ke Dekhte Hain - सुना है लोग उसे आँख भर | Ahmad Faraz Ki Ghazal

Mahadevi Verma Hindi Poem- ढुलकते आँसू सा सुकुमार - कौन? | महादेवी वर्मा हिंदी कविता

Mahadevi Verma Hindi Poem
कौन ? - ढुलकते आँसू-सा सुकुमार

महादेवी वर्मा हिंदी कविता

Mahadevi Verma Ji Ki Hindi Kavita - ढुलकते आँसू सा सुकुमार - कौन
Mahadevi Verma Ji Ki Hindi Kavita - ढुलकते आँसू सा सुकुमार - कौन 

ढुलकते आँसू-सा सुकुमार

बिखरते सपनों-सा अज्ञात,

चुराकर अरुणा का सिन्दूर

मुस्कराया जब मेरा प्रात,

छिपाकर लाली में चुपचाप

सुनहला प्याला लाया कौन?

Mahadevi Verma Ji Ki Hindi Kavita - ढुलकते आँसू सा सुकुमार - कौन
Mahadevi Verma Ji Ki Hindi Kavita - ढुलकते आँसू सा सुकुमार - कौन 

हँस उठे छूकर टूटे तार

प्राण में मँड़राया उन्माद,

व्यथा मीठी ले प्यारी प्यास

सो गया बेसुध अन्तर्नाद,

घूँट में थी साकी की साध

सुना फिर-फिर जाता है कौन?

-

महादेवी वर्मा

Mahadevi Verma Ji Ki Hindi Kavita - अतिथि से | Atithi Se - महादेवी वर्मा जी की हिंदी कविता
Mahadevi Verma Ji Ki Hindi Kavita - ढुलकते आँसू सा सुकुमार - कौन 

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महाभारत पर रोंगटे खड़े कर देने वाली हिंदी कविता - Mahabharata Poem On Arjuna

|| महाभारत पर रोंगटे खड़े कर देने वाली कविता || || Mahabharata Poem On Arjuna ||   तलवार, धनुष और पैदल सैनिक कुरुक्षेत्र में खड़े हुए, रक्त पिपासु महारथी इक दूजे सम्मुख अड़े हुए | कई लाख सेना के सम्मुख पांडव पाँच बिचारे थे, एक तरफ थे योद्धा सब, एक तरफ समय के मारे थे | महा-समर की प्रतिक्षा में सारे ताक रहे थे जी, और पार्थ के रथ को केशव स्वयं हाँक रहे थे जी ||    रणभूमि के सभी नजारे देखन में कुछ खास लगे, माधव ने अर्जुन को देखा, अर्जुन उन्हें  उदास लगे | कुरुक्षेत्र का महासमर एक पल में तभी सजा डाला, पांचजन्य  उठा कृष्ण ने मुख से लगा बजा डाला | हुआ शंखनाद जैसे ही सब का गर्जन शुरु हुआ, रक्त बिखरना हुआ शुरु और सबका मर्दन शुरु हुआ | कहा कृष्ण ने उठ पार्थ और एक आँख को मीच जड़ा, गाण्डिव पर रख बाणों को प्रत्यंचा को खींच जड़ा | आज दिखा दे रणभूमि में योद्धा की तासीर यहाँ, इस धरती पर कोई नहीं, अर्जुन के जैसा वीर यहाँ ||    सुनी बात माधव की तो अर्जुन का चेहरा उतर गया, एक धनुर्धारी की विद्या मानो चूहा कुतर गया | बोले पार्थ सुनो कान्हा - जितने

कृष्ण की चेतावनी - KRISHNA KI CHETAWANI | रश्मिरथी - रामधारी सिंह " दिनकर " | Mahabharata Poems |

|| कृष्ण की चेतावनी - KRISHNA KI CHETAWANI || || रश्मिरथी - रामधारी सिंह " दिनकर " || | MAHABHARATA POEMS | | MAHABHARATA POEMS IN HINDI | Krishna Ki Chetawani - कृष्ण की चेतावनी   वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप - घाम , पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर । सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है || Krishna Ki Chetawani - कृष्ण की चेतावनी मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये || Krishna Ki Chetawani - कृष्ण की चेतावनी दो न्याय, अगर तो, आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम , रखों अपनी धरती तमाम | हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे !! दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका, उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य , साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है ||   जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है || Krishna Ki Chetawani - कृष्ण की चेतावनी हरि

अग्निपथ (Agneepath) - हरिवंश राय बच्चन | Agnipath Poem By Harivansh Rai Bachchan

अग्निपथ - हरिवंश राय बच्चन  Agnipath Poem By Harivansh Rai Bachchan वृक्ष हों भले खड़े, हों घने हों बड़े, एक पत्र छाँह भी, माँग मत, माँग मत, माँग मत, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ । अग्निपथ(Agneepath) - हरिवंश राय बच्चन | Agnipath Poem By Harivansh Rai Bachchan तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी, तू न मुड़ेगा कभी, कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ । अग्निपथ(Agneepath) - हरिवंश राय बच्चन | Agnipath Poem By Harivansh Rai Bachchan यह महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है, अश्रु श्वेत रक्त से, लथपथ लथपथ लथपथ, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ । Agneepath Poem By Harivansh Rai Bachchan Agneepath Poem In Hinglish Vriksh hon bhale khade, hon ghane hon bade, Ek patra chhah bhi maang mat, maang mat, maang mat, Agnipath, Agnipath, Agnipath. Tu na thakega kabhi tu na thamega kabhi tu na mudega kabhi, Kar shapath, Kar shapath, Kar shapath, Agnipath, Agnipath, Agnipath. अग्निपथ(Agneepath) - हरिवंश राय बच्चन | Agnipath Poem By Harivansh Rai Bachchan Ye Mahaan Drishya hai, Chal raha Manushya hai, Ashru, swed,

सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है - Sach Hai Vipatti Jab Aati Hai

  सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है रामधारी सिंह "दिनकर" हिंदी कविता दिनकर की हिंदी कविता   सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, शूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं। मुख से न कभी उफ कहते हैं, संकट का चरण न गहते हैं, जो आ पड़ता सब सहते हैं, उद्योग-निरत नित रहते हैं, शूलों का मूल नसाने को, बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को। है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके वीर नर के मग में ? खम ठोंक ठेलता है जब नर , पर्वत के जाते पाँव उखड़। मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है । गुण बड़े एक से एक प्रखर, हैं छिपे मानवों के भीतर, मेंहदी में जैसे लाली हो, वर्तिका-बीच उजियाली हो। बत्ती जो नहीं जलाता है, रोशनी नहीं वह पाता है। पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड , झरती रस की धारा अखण्ड , मेंहदी जब सहती है प्रहार, बनती ललनाओं का सिंगार। जब फूल पिरोये जाते हैं, हम उनको गले लगाते हैं। वसुधा का नेता कौन हुआ? भूखण्ड-विजेता कौन हुआ ? अतुलित यश क्रेता कौन हुआ? नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ ? जिसने न कभी आराम किया, विघ्नों में रहकर ना

सादगी तो हमारी जरा देखिये | Saadgi To Hamari Zara Dekhiye Lyrics | Nusrat Fateh Ali Khan Sahab

Saadgi To Hamari Zara Dekhiye Lyrics सादगी तो हमारी जरा देखिये   सादगी तो हमारी जरा देखिये,  एतबार आपके वादे पे कर लिया | मस्ती में इक हसीं को ख़ुदा कह गए हैं हम,  जो कुछ भी कह गए वज़ा कह गए हैं हम  || बारस्तगी तो देखो हमारे खुलूश कि,  किस सादगी से तुमको ख़ुदा कह गए हैं हम ||   किस शौक किस तमन्ना किस दर्ज़ा सादगी से,  हम करते हैं आपकी शिकायत आपही से || तेरे अताब के रूदाद हो गए हैं हम,  बड़े खलूस से बर्बाद हो गए हैं हम ||

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देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं - कर्मवीर | Dekh Kar Baadha Vividh

  कर्मवीर - अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध  देख कर बाधा विविध , बहु विघ्न घबराते नहीं Motivational Poems In Hindi    देखकर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं। रह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहीं काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नही भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं ।। हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले ।। आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही मानते जो भी है सुनते हैं सदा सबकी कही जो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप ही भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं ।। जो कभी अपने समय को यों बिताते है नहीं काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं आज कल करते हुए जो दिन गँवाते है नहीं यत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहीं बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिये वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिये।। व्योम को छूते हुए दुर्गम पहाड़ों के शिखर वे घने जंगल जहां रहता है तम आठों पहर गर्जते जल राशि की उठती हुई ऊँची लहर आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपट ये कंपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं भूलक

रानी पद्मिनी और गोरा, बादल पर नरेंद्र मिश्र की रुला देने वाली कविता | Gora Badal Poem

पद्मिनी गोरा बादल नरेंद्र मिश्र ( Narendra Mishra ) रानी पद्मिनी और गोरा, बादल पर नरेंद्र मिश्र की रुला देने वाली कविता

Hindu Tan Man, Hindu Jeevan | हिंदु तन मन, हिन्दु जीवन, रग-रग हिन्दु मेरा परिचय

 Hindu Tan Man, Hindu Jeevan हिंदु तन मन, हिन्दु जीवन, रग-रग हिन्दु मेरा परिचय Atal  Bihari  Vajpayee  Hindi Poems अटल बिहारी वाजपेयी  की  हिंदी कवितायेँ  Hindu Tan Man, Hindu Jeevan हिंदु तन-मन, हिन्दु जीवन , रग-रग हिन्दु मेरा परिचय ॥ मैं शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार क्षार। डमरू की वह प्रलयध्वनि हूं जिसमे नचता भीषण संहार। रणचंडी की अतृप्त प्यास , मैं दुर्गा का उन्मत्त हास । मैं यम की प्रलयंकर पुकार , जलते मरघट का धुँआधार। फिर अंतरतम की ज्वाला से, जगती मे आग लगा दूं मैं। यदि धधक उठे जल, थल, अंबर, जड़, चेतन तो कैसा विस्मय ? हिन्दु तन मन, हिन्दु जीवन, रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥ मैं आदि पुरुष, निर्भयता का वरदान लिये आया भू पर। पय पीकर सब मरते आए, मैं अमर हुआ लो विष पीकर। अधरों की प्यास बुझाई है, पी कर मैने वह आग प्रखर । हो जाती दुनिया भस्मसात , जिसको पल भर में ही छूकर। भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन। मैं नर, नारायण, नीलकण्ठ बन गया न इसमे कुछ संशय । हिन्दु तन मन, हिन्दु जीवन, रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥ Hindu Tan Man, Hindu Jeevan | हिंदु तन मन, हिन्दु जीवन, रग-

अरे! रणभूमि में छल करते हो, तुम कैसे भगवान हुए ! | Karna Par Hindi Kavita | Ranbhoomi Me Chhal Karte

अरे! रणभूमि में छल करते हो, तुम कैसे भगवान हुए ! || Karna Par Hindi Kavita || || Poem On Karna || अरे! रणभूमि में छल करते हो, तुम कैसे भगवान हुए ! | Karna Par Hindi Kavita | Ranbhoomi Me Chhal Karte सारा जीवन श्रापित-श्रापित , हर रिश्ता बेनाम कहो, मुझको ही छलने के खातिर मुरली वाले श्याम कहो, तो किसे लिखूं मैं प्रेम की पाती, किसे लिखूं मैं प्रेम की पाती, कैसे-कैसे इंसान हुए, अरे! रणभूमि में छल करते हो, तुम कैसे भगवान हुए ! अरे! रणभूमि में छल करते हो, तुम कैसे भगवान हुए ! | Karna Par Hindi Kavita | Ranbhoomi Me Chhal Karte || माँ को कर्ण लिखता है || अरे! रणभूमि में छल करते हो, तुम कैसे भगवान हुए ! | Karna Par Hindi Kavita | Ranbhoomi Me Chhal Karte कि मन कहता है, मन करता है, कुछ तो माँ के नाम लिखूं , एक मेरी जननी को लिख दूँ, एक धरती के नाम लिखूं , प्रश्न बड़ा है मौन खड़ा - धरती संताप नहीं देती, और धरती मेरी माँ होती तो , मुझको श्राप नहीं देती | तो जननी माँ को वचन दिया है, जननी माँ को वचन दिया है, पांडव का काल नहीं हूँ मैं, अरे! जो बेटा गंगा में छोड़े, उस कुंती का लाल नहीं हूँ