चल पड़े जिधर दो डग-मग में
(Chal Pade Jidhar Do Dag Mag Mein - Lyrics & Bhavarth)
राष्ट्रकवि सोहन लाल द्विवेदी (Sohan Lal Dwivedi) की यह ओजस्वी कविता महात्मा गाँधी को समर्पित है। यह केवल एक कविता नहीं, बल्कि उस जन-आंदोलन का जयघोष है जिसने भारत को स्वतंत्रता दिलाई।
जिस तरह नवाज़ देवबंदी ने कहा है "सफ़र में मुश्किलें आएँ तो जुर्रत और बढ़ती है", ठीक उसी जुर्रत और साहस के साथ बापू ने इस आन्दोलन का नेतृत्व किया।
चल पड़े जिधर दो डग-मग में
चल पड़े कोटि पग उसी ओर,
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि
गड़ गये कोटि दृग उसी ओर,
जिसके शिर पर निज धरा हाथ
उसके शिर-रक्षक कोटि हाथ,
जिस पर निज मस्तक झुका दिया
झुक गये उसी पर कोटि माथ,
हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु!
हे कोटिरूप, हे कोटिनाम!
तुम एकमूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि
हे कोटिमूर्ति, तुमको प्रणाम!
गाँधी जी ने युग को पुरानी बेड़ियों से मुक्त किया। जैसे हरिवंश राय बच्चन कहते हैं "जो बीत गई सो बात गई", वैसे ही बापू ने भारत को अतीत के अंधकार से निकालकर नए युग की ओर मोड़ा।
युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख
युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,
तुम अचल मेखला बन भू की
खींचते काल पर अमिट रेख,
तुम बोल उठे, युग बोल उठा,
तुम मौन बने, युग मौन बना,
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर
युगकर्म जगा, युगधर्म तना,
युग-परिवर्तक, युग-संस्थापक,
युग-संचालक, हे युगाधार!
युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें
युग-युग तक युग का नमस्कार!
गाँधी जी ने विध्वंस के बीच सृजन किया। यह वही भावना है जो बच्चन जी की कविता "नीड़ का निर्माण फिर-फिर" में दिखाई देती है—नाश के दुःख से कभी निर्माण का सुख नहीं दबता।
तुम युग-युग की रूढ़ियाँ तोड़
रचते रहते नित नई सृष्टि,
उठती नवजीवन की नींवें
ले नवचेतन की दिव्य-दृष्टि,
धर्माडंबर के खँडहर पर
कर पद-प्रहार, कर धराध्वस्त
मानवता का पावन मंदिर
निर्माण कर रहे सृजनव्यस्त!
बढ़ते ही जाते दिग्विजयी!
गढ़ते तुम अपना रामराज,
आत्माहुति के मणिमाणिक से
मढ़ते जननी का स्वर्णताज!
यहाँ 'आत्माहुति' (Self-sacrifice) का भाव माखनलाल चतुर्वेदी की अमर रचना "पुष्प की अभिलाषा" की याद दिलाता है, जहाँ एक पुष्प भी मातृभूमि के लिए बलिदान होना चाहता है।
तुम कालचक्र के रक्त सने
दशनों को कर से पकड़ सुदृढ़,
मानव को दानव के मुँह से
ला रहे खींच बाहर बढ़ बढ़,
पिसती कराहती जगती के
प्राणों में भरते अभय दान,
अधमरे देखते हैं तुमको,
किसने आकर यह किया त्राण?
उस समय भारत की जनता का दुःख अपार था, मानो "दुःख ही जीवन की कथा रही" हो। ऐसे समय में गाँधी जी ने 'अभय दान' देकर नई उम्मीद जगाई।
दृढ़ चरण, सुदृढ़ करसंपुट से
तुम कालचक्र की चाल रोक,
नित महाकाल की छाती पर
लिखते करुणा के पुण्य श्लोक!
कँपता असत्य, कँपती मिथ्या,
बर्बरता कँपती है थरथर!
कँपते सिंहासन, राजमुकुट
कँपते, खिसके आते भू पर,
हैं अस्त्र-शस्त्र कुंठित लुंठित,
सेनायें करती गृह-प्रयाण!
रणभेरी तेरी बजती है,
उड़ता है तेरा ध्वज निशान!
हे युग-दृष्टा, हे युग-स्रष्टा,
पढ़ते कैसा यह मोक्ष-मंत्र?
इस राजतंत्र के खँडहर में
उगता अभिनव भारत स्वतंत्र!
कविता का भावार्थ (Meaning)
सोहन लाल द्विवेदी जी की यह कविता महात्मा गाँधी के अद्भुत नेतृत्व और प्रभाव का वर्णन करती है।
- सामूहिक शक्ति: कवि कहते हैं कि जिधर गाँधी जी के दो कदम (डग) बढ़ जाते थे, उधर ही करोड़ों देशवासी चल पड़ते थे। उनकी एक नज़र जिधर पड़ती, करोड़ों नज़रें उधर ही देखने लगती थीं।
- युग प्रवर्तक: गाँधी जी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक 'युग' थे। उनके हँसने से युग हँसता था और उनके मौन रहने पर युग शांत हो जाता था।
- अहिंसा की विजय: बिना शस्त्र उठाए, केवल सत्य और अहिंसा के बल पर उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत (राजतंत्र) की नींव हिला दी और 'अभिनव भारत स्वतंत्र' का निर्माण किया।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'चल पड़े जिधर दो डग-मग में' किसके लिए लिखी गई है?
यह कविता राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) को समर्पित है।
'चल पड़े जिधर दो डग-मग में' के रचयिता कौन हैं?
इस ओजस्वी कविता के रचयिता राष्ट्रकवि सोहन लाल द्विवेदी (Sohan Lal Dwivedi) हैं।
इस कविता का मूल भाव क्या है?
इसका मूल भाव नेतृत्व की शक्ति, एकता और अहिंसा द्वारा अत्याचारी शासन को उखाड़ फेंकना है।