हिंदी साहित्य के छायावादी युग की प्रमुख आधारस्तंभ और 'आधुनिक मीरा' के नाम से विख्यात महादेवी वर्मा (Mahadevi Verma) की कविताएँ वेदना और करुणा का महासागर हैं। उनकी रचनाओं में एक ऐसा 'सूनापन' (Loneliness) है जो केवल खालीपन नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन की एक मूक पुकार है।
आज हम उनकी एक अत्यंत भावपूर्ण कविता "सूनापन" (Soonapan) का रसास्वादन करेंगे। यह कविता प्रकृति के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और विरह की गहराई को दर्शाती है।
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| "धीरे से सूने आँगन में..." — The silent embrace of solitude under the night sky. |
सूनापन (Soonapan)
कवयित्री: महादेवी वर्मा
मिल जाता काले अंजन में
सन्ध्या की आँखों का राग,
जब तारे फैला फैलाकर
सूने में गिनता आकाश;
उसकी खोई सी चाहों में
घुट कर मूक हुई आहों में!
झूम झूम कर मतवाली सी
पिये वेदनाओं का प्याला,
प्राणों में रूँधी निश्वासें
आतीं ले मेघों की माला;
उसके रह रह कर रोने में
मिल कर विद्युत के खोने में!
धीरे से सूने आँगन में
फैला जब जातीं हैं रातें,
भर भरकर ठंढी साँसों में
मोती से आँसू की पातें;
उनकी सिहराई कम्पन में
किरणों के प्यासे चुम्बन में!
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| "मोती से आँसू की पातें..." — When nature weeps in unison with the human soul. |
जाने किस बीते जीवन का
संदेशा दे मंद समीरण,
छू देता अपने पंखों से
मुर्झाये फूलों के लोचन;
उनके फीके मुस्काने में
फिर अलसाकर गिर जाने में!
आँखों की नीरव भिक्षा में
आँसू के मिटते दाग़ों में,
ओठों की हँसती पीड़ा में
आहों के बिखरे त्यागों में;
कन-कन में बिखरा है निर्मम!
मेरे मानस का सूनापन!
'सूनापन' कविता का विस्तृत भावार्थ (Detailed Analysis)
महादेवी वर्मा की यह कविता छायावाद (Chhayavad) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ प्रकृति और मानव मन की वेदना एकसार हो जाते हैं। आइये इस कविता के गहरे अर्थ को समझते हैं:
1. प्रकृति और एकाकीपन का मिलन
कविता की शुरुआत में 'काले अंजन' और 'संध्या' का वर्णन है। कवयित्री कहती हैं कि शाम ढलते ही आकाश का सूनापन तारों के रूप में बिखर जाता है। यह केवल रात का अंधेरा नहीं है, बल्कि कवयित्री के मन में छाया हुआ विषाद (Melancholy) है। आकाश का सूनापन उनके अपने 'मानस के सूनेपन' का प्रतिबिंब है।
2. वेदना का प्याला
"पिये वेदनाओं का प्याला..." पंक्ति दर्शाती है कि महादेवी जी के लिए दुःख कोई बोझ नहीं, बल्कि एक नशा है। वे अपनी पीड़ा को जीती हैं। यहाँ 'मेघों की माला' और 'विद्युत' (बिजली) उनके अंतर्मन के तूफ़ान और क्षणिक उम्मीदों के प्रतीक हैं।
3. मूक वेदना और आँसू
तीसरे और चौथे अनुच्छेद में, हवा (मंद समीरण) को एक संदेशवाहक के रूप में दिखाया गया है जो बीते जीवन की यादें लाता है। 'मुरझाए फूलों के लोचन' उन सपनों का प्रतीक हैं जो अब टूट चुके हैं। 'आँखों की नीरव भिक्षा' का अर्थ है कि उनकी आँखें खामोशी से उस परम शक्ति (प्रियतम) की एक झलक मांग रही हैं।
4. निष्कर्ष: कण-कण में विरह
अंत में कवयित्री स्वीकार करती हैं कि यह सूनापन केवल उनके भीतर नहीं है, बल्कि सृष्टि के कण-कण में बिखरा हुआ है। यह कविता व्यक्तिगत पीड़ा से शुरू होकर ब्रह्मांडीय वेदना (Universal Pain) में बदल जाती है।
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महादेवी वर्मा की कविताएँ हमें सिखाती हैं कि अकेलेपन को कमजोरी नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन का माध्यम बनाना चाहिए। यह 'सूनापन' ही वह कैनवास है जिस पर जीवन के गहरे रंग उभरते हैं।
यदि आप साहित्य के साथ-साथ समाज की विडंबनाओं पर व्यंग्य पढ़ना चाहते हैं, तो राहगीर का गीत "आदमी चूतिया है" ज़रूर देखें जो आधुनिक जीवन की कड़वी सच्चाई बयां करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
महादेवी वर्मा को किस नाम से जाना जाता है?
महादेवी वर्मा को 'आधुनिक मीरा' (Modern Meera) के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि उनकी कविताओं में विरह और भक्ति का अनूठा संगम है।
'सूनापन' कविता का मुख्य भाव क्या है?
इस कविता का मुख्य भाव विरह वेदना (Separation/Pain), एकाकीपन और प्रकृति के साथ मानवीय संवेदनाओं का जुड़ाव है।