कौन हाँफ रहा है? - बाबा नागार्जुन | कविता का भावार्थ एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
प्रस्तावना: एक महान यूटोपियन सपने का खौफनाक अंत
क्या आपने कभी किसी विचारधारा को मौत के मुहाने पर हाँफते हुए देखा है? 1990 की सर्दियों में, जब शक्तिशाली सोवियत संघ अपने अंतिम दिन गिन रहा था, तब उसकी गूँज केवल मॉस्को में ही नहीं, बल्कि भारत के सुदूर गाँवों में भी महसूस की गई। बाबा नागार्जुन, जो अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं, ने इस ऐतिहासिक पतन को अपनी तीखी कलम से उकेरा। "कौन हाँफ रहा है?" महज़ एक कविता नहीं है, यह समाजवाद की दर्दनाक मौत का एक जीता-जागता दस्तावेज़ है।
यह कविता एक ऐसा हृदयविदारक शोकगीत है जो समानता का वादा करने वाली विचारधारा के खोखलेपन को उजागर करता है। ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने कालिदास सच सच बतलाना में इतिहास और भावनाओं से सवाल किए थे, यहाँ वे भारतीय वामपंथी नेताओं से सीधे जवाब मांगते हैं। नागार्जुन के जीवन और उनकी देहाती जड़ों को गहराई से समझने के लिए हमारा बाबा नागार्जुन का संपूर्ण जीवन परिचय अवश्य पढ़ें।
कविता पाठ: कौन हाँफ रहा है?
किसका दम घुट रहा है?
अरे, अरे, मैं पहचानता हूँ
दूर से ही सही
मैंने बार-बार
उसके पैरों की आहट सुनी है
जी, मैं उसे पहचानता हूँ
वो सोशलिज़्म है
वो कम्युनिज़्म की तरफ
तेजी से बढ़ रहा था
हाय, बीच रास्ते में ही
इसका दम क्यों फूलने लगा?
क्या वे कोलखोज यक्-ब-यक्
ऊसर हो गए?
सामूहिक कृषि-फार्म के
गेहूँ तो हम तक भी पहुँचे थे
दूर-ग्रामांचल में, 'तरौनी' गाँव तक
सोवखोज वाली सुनहली फसलों की खुशबू
मेरे ग्रामांचल की आबोहवा में भी
जाने कितनी बार फैली है...
यह सब कुछ तुम्हें बतलाएँगे
कामरेड चतुरानन झा !!
साथी श्यामल किशोर
आप बतलाओ,
वे कोलखोज क्या अब
बालू ही बालू रह गए
क्या सचमुच रूस के लोग भूखे-प्यासे
दिन पर दिन गुजारते हैं अब?
‘पेरेस्त्रोइका’ क्या हुआ!
‘ग्लासनोस्त’ शंख-नाद क्या हुआ!
कामरेड गोर्वाचोव सच-सच बतलाओ—
सोवियत भूमि में इन दिनों
क्या कुछ कर रहे हैं लोग?
(2 दिसम्बर, 1990 भूल जाओ पुराने सपने - नागार्जुन)
विस्तृत भावार्थ एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
1. एक मजबूत विचारधारा की दमघोंटू मौत
"यह कौन हाँफ रहा है? / किसका दम घुट रहा है?"कविता की शुरुआत एक बेहद खौफनाक और बेचैन करने वाले दृश्य से होती है। कोई बीच रास्ते में हाँफ रहा है। नागार्जुन जल्द ही स्पष्ट करते हैं कि यह कोई इंसान नहीं, बल्कि समाजवाद (Socialism) की विचारधारा है। जो कम्युनिज़्म के अंतिम लक्ष्य की ओर दौड़ रही थी, वह अचानक थक कर गिर पड़ी है। यह रूपक वामपंथी भ्रम के टूटने की पीड़ादायक सच्चाई को सामने लाता है। ठीक इसी तरह की आर्थिक और सामाजिक जकड़न का चित्रण मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए जैसी रचनाओं में भी देखने को मिलता है।
2. सामूहिक कृषि का छलावा: कोलखोज़ और सोवखोज़
नागार्जुन सोवियत संघ के सामूहिक फार्मों 'कोलखोज़' और सरकारी फार्मों 'सोवखोज़' का जिक्र करते हुए गहरा व्यंग्य करते हैं। वे पूछते हैं कि क्या वे उपजाऊ ज़मीनें अचानक 'ऊसर' (बंजर) हो गईं? सबसे मार्मिक बात यह है कि नागार्जुन इस अंतरराष्ट्रीय घटना को अपने सुदूर गाँव 'तरौनी' (बिहार) से जोड़ते हैं। सोवियत संघ के 'स्वर्णिम खेतों' का झूठा प्रचार भारत के गाँवों तक पहुँचा था। किसानों की भूख और कृषि की असलियत जानने के लिए नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता अन्न पचीसी इसका एक और ज्वलंत उदाहरण है।3. भारतीय कामरेड्स से तीखे सवाल
कवि स्थानीय भारतीय कम्युनिस्ट नेताओं—कामरेड चतुरानन झा और साथी श्यामल किशोर को सीधे चुनौती देता है। जो लोग सोवियत रूस को 'मज़दूरों का स्वर्ग' बताते थे, क्या वे अब यह स्वीकार करेंगे कि वहाँ के लोग भूखे-प्यासे मर रहे हैं? जब एक विचारधारा विफल होती है, तो उसके पीछे जो पूंजीवादी नंगा नाच शुरू होता है, उसे ग़ज़ल हर घड़ी चश्म-ए-खरीदार में भी बहुत खूबसूरती से दर्शाया गया है।4. गोर्बाचेव के सुधारों की विफलता
अंत में, कवि सोवियत संघ के अंतिम नेता मिखाइल गोर्बाचेव से सवाल करता है। उनके द्वारा लाये गए ‘पेरेस्त्रोइका’ (पुनर्गठन) और ‘ग्लासनोस्त’ (पारदर्शिता) के नारे महज़ खोखले साबित हुए। नागार्जुन एक दर्दनाक सलाह के साथ कविता खत्म करते हैं: "भूल जाओ पुराने सपने।"मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण: जहाँ नागार्जुन एक ओर अंतरराष्ट्रीय राजनीति को चीर कर रख देते हैं, वहीं दूसरी ओर वे अपनी लोक संस्कृति से भी गहरे जुड़े रहे हैं। उनकी इस विविधता को दुलहिन धीरे धीरे चल्यो (मैथिली गीत) जैसी रचनाओं में महसूस किया जा सकता है।
वीडियो देखें: बाबा नागार्जुन का दुर्लभ साक्षात्कार एवं कविता
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. 'कौन हाँफ रहा है' कविता का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यह कविता 2 दिसंबर 1990 को लिखी गई थी, जब सोवियत संघ अपने पतन के कगार पर था। यह कविता समाजवाद और कम्युनिज़्म जैसी विचारधाराओं की विफलता पर एक करारा व्यंग्य है, जिन्होंने समानता और समृद्धि का झूठा सपना दिखाया था।
2. इस कविता में 'कोलखोज़' और 'सोवखोज़' का क्या अर्थ है?
कोलखोज़ का अर्थ सोवियत संघ के 'सामूहिक कृषि फार्म' और सोवखोज़ का अर्थ 'सरकारी कृषि फार्म' है। नागार्जुन यह सवाल उठाते हैं कि जिस व्यवस्था ने भुखमरी मिटाने का दावा किया था, अंत में वही ज़मीनें बंजर कैसे हो गईं और लोग भूखे क्यों मरने लगे।
3. रूस पर लिखी कविता में नागार्जुन 'तरौनी' गाँव का ज़िक्र क्यों करते हैं?
'तरौनी' बिहार के दरभंगा ज़िले में स्थित बाबा नागार्जुन का पैतृक गाँव है। वे इसका ज़िक्र यह दर्शाने के लिए करते हैं कि कैसे सोवियत संघ की समृद्धि का झूठा राजनीतिक प्रचार (प्रोपेगैंडा) भारत के दूर-दराज़ के गाँवों तक गहराई से फैल चुका था।
निष्कर्ष: एक मृगतृष्णा का अंत
"कौन हाँफ रहा है?" महज़ शब्दों का जाल नहीं, बल्कि एक वैचारिक पोस्टमार्टम है। वामपंथी विचारधारा से गहरे जुड़े होने के बावजूद, नागार्जुन ने कड़वी सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा। जब समाजवाद की ज़मीन बंजर हुई और वह नौकरशाही तथा भुखमरी के दलदल में धंस गया, तो नागार्जुन ने पूरी दुनिया के कम्युनिस्टों को आईना दिखाया। यह रचना हमें चेतावनी देती है कि कोई भी राजनीतिक विचारधारा जब सत्ता के अहंकार में अंधी हो जाती है, तो उसका पतन निश्चित है; और अंततः इसका खामियाज़ा मॉस्को से लेकर तरौनी तक, केवल आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है।


