हर घड़ी चश्म-ए-ख़रीदार: शकील आज़मी की मशहूर सामाजिक ग़ज़ल
Har Ghadi Chasm-E-Khareedar - Shakeel Azmi
हर घड़ी चश्म-ए-ख़रीदार में रहने के लिए
कुछ हुनर चाहिए बाज़ार में रहने के लिएमैं ने देखा है जो मर्दों की तरह रहते थे
मस्ख़रे बन गए दरबार में रहने के लिएऐसी मजबूरी नहीं है कि चलूँ पैदल मैं
ख़ुद को गर्माता हूँ रफ़्तार में रहने के लिएअब तो बदनामी से शोहरत का वो रिश्ता है कि लोग
नंगे हो जाते हैं अख़बार में रहने के लिए
har ghadi chashme kharidar mein rahne ke liye
kuchh hunar chahiye bazar mein rahne ke liye
main ne dekha hai jo mardon ki tarah rahte the
maskhare ban gaye darbar mein rahne ke liye
aisi majboori nahin hai ki chaloon paidal main
khud ko garmata hoon raftar mein rahne ke liye
ab to badnami se shohrat ka wo rishta hai ki log
nange ho jate hain akhbar mein rahne ke liye
हर घड़ी चश्म-ए-ख़रीदार का अर्थ (Meaning in Hindi)
शकील आज़मी की यह ग़ज़ल (Har Ghadi Chasm E Khareedar) आधुनिक समाज के बाज़ारवाद, पीआर (PR) संस्कृति और खोखली शोहरत पर एक बेहद तीखा और मारक तंज़ है। इस ग़ज़ल में शायर ने इस बात पर रोशनी डाली है कि कैसे आज के दौर में इंसान अपने उसूलों को छोड़कर खुद को महज़ एक 'उत्पाद' (Product) बना चुका है।
'चश्म-ए-ख़रीदार' का शाब्दिक अर्थ है 'खरीददार की नज़र'। शायर का आशय है कि आज की दुनिया एक ऐसा बाज़ार बन गई है जहाँ हर व्यक्ति यह चाहता है कि दुनिया उसे देखे, उसकी तारीफ करे और उसे 'खरीदे'। इस बाज़ार और सत्ता (दरबार) में टिके रहने के लिए लोग अपनी गरिमा छोड़ देते हैं और हुक्मरानों के सामने 'मस्खरे' (विदूषक/Jokers) बन जाते हैं।
नंगे हो जाते हैं अख़बार में रहने के लिए - शेर का मतलब
"अब तो बदनामी से शोहरत का वो रिश्ता है कि लोग / नंगे हो जाते हैं अख़बार में रहने के लिए।"
यद्यपि यह शेर अपने समय की सामाजिक प्रवृत्तियों पर लिखा गया था, लेकिन आज के सोशल मीडिया, वायरल कल्चर और प्रचार-प्रधान युग में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। शकील आज़मी यहाँ स्पष्ट करते हैं कि आज 'बदनामी' और 'शोहरत' के बीच का फर्क मिट गया है। चर्चा (clout) में बने रहने और अखबारों की सुर्खियां बटोरने के लिए लोग नैतिक रूप से नंगे होने (यानी अपनी शर्म और हया खोने) से भी गुरेज़ नहीं करते।
यह उसी वैचारिक धरातल की बात है जहाँ कला और दिखावे का अंतर खत्म हो जाता है, जैसा कि बशीर बद्र ने कहा था—इसे फन नहीं पर्दा-ए-फ़ाम कहो। सत्ता और दरबारों के सामने झुकने की यही विडंबना इब्ने इंशा के मशहूर तंज़ फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों में भी झलकती है।
आजकल की इस अंधी दौड़ में, जहाँ युवा वर्ग बहुत जल्दी दुनियावी छल-कपट का तजुर्बा हासिल कर रहा है (ज़ुल्फें सफ़ेद हो गईं उन्नीस साल में), समाज का एक बड़ा हिस्सा महज़ झूठे ऐश-ओ-आराम का दिखावा करने में व्यस्त है (कितना ऐश से रहते हैं)। आधुनिक शोहरत की यह लालसा उस रूहानी सुकून और गहराई के बिल्कुल विपरीत है जो हमें पारम्परिक लोक-कथाओं (पार चान्हा दे के अर्थ) में देखने को मिलती है।