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Shramjeevi & Yatharth: Hindi Poems by Rakesh Jha 'Saksham' | Inspirational Poetry

हिंदी साहित्य में यथार्थवाद (Realism) और ओज (Energy) का अद्भुत संगम राकेश झा "सक्षम" की कविताओं में देखने को मिलता है। चाहे वह एक मजदूर की पीड़ा हो, समाज की चुप्पी हो, या युवाओं का जोश—राकेश जी की लेखनी हर विषय पर बेबाक चलती है।

आज के इस संग्रह में हम उनकी सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ पढ़ेंगे, जो न केवल जीवन पथ की पहचान कराती हैं, बल्कि हमें संघर्षों से लड़ने की प्रेरणा भी देती हैं।

1. श्रमजीवी (Shramjeevi)

(एक मेहनतकश इंसान की व्यथा और स्वाभिमान)

Shramjeevi Poem - Hard Work

श्रमजीवी हूँ, कोई भीड़ नहीं
तन से सिंचूँ, नित धरणी को !
बोझ उठा, पग धरूँ अनंत को
पथ कांटों की शैय्या है !!

अम्बर के आक्षेप हूँ सहता,
सहूँ वैराग्य, गणनायक का !
हीन दृष्टि हैं निहार रहीं,
हूँ बूत बना मैं निःशब्द खड़ा !!

शेष नहीं है, रक्त शरीर में
ना रसा बची मुखमंडल में !
है लहूलुहान, अवछंग मेरा
अब हिम्मत भी है टूट रही !!

जीवन है सरल, जनमानस का
जब तक सांसें आबाद मेरी !
संकल्प मेरा है, पिघल रहा
श्रमजीवी हूँ, कोई भीड़ नहीं !!

Shramjeevi Footer
संदर्भ: एक श्रमजीवी ही जानता है कि चल पड़े जिधर दो डग मग में, उधर ही रास्ता बन जाता है। अटल निश्चय ही सफलता की कुंजी है।

2. यथार्थ (Yatharth)

(समाज की चुप्पी पर एक कटाक्ष)

Reality Poem Yatharth

ज़रा देखो इन गलियों को,
ये इस तरह सुनसान क्यों हैं !
ज़रा देखो इन घरों को,
ये इस तरह वीरान क्यों हैं !

ज़रा देखो इन हवाओं को,
ये इस तरह बेज़ान क्यों हैं !
समझ नहीं आता,
लोग इतने गुमनाम क्यों हैं !

क्यों इन घटाओं में बादल नहीं है !
शमशानों की तरह बसेरों में उठती आर्तनाद क्यों है !!

समझ नहीं आता !
लोगों में समझ कर भी ना समझने की ज़िद क्यों है !!

Yatharth Footer
विश्लेषण: यह कविता समाज की उस विडंबना को दर्शाती है जहाँ सब कुछ जानकर भी लोग चुप हैं। ऐसे ही कुछ औरतों ने अपनी इच्छा से विद्रोही बनकर इस चुप्पी को तोड़ने का साहस दिखाया है।

3. कटुत्व से जो मुक्त हों

कटुत्व से जो मुक्त हों
आसक्ति से हों परे ।
विहंग बन स्वभाव से,
गगन चले उड़ान को ।।

स्वार्थ की क्षुधा नहीं,
ना ही तृष्णा ख्याति की ।
परमार्थ से बंधे चले,
सृष्टि के कल्याण को ।।

आटोप से निःशेष हो,
निश्छल बने अवछंग से ।
विहंग बन स्वभाव से,
गगन चले उड़ान को ।।

4. उड़ान (Udaan)

Udaan Poem

मैं बादल बन जाऊं
छा जाऊं पूरे अम्बर पर ।
मेरी वृष्टि से हो तृप्त धरा
मंद- मंद मुस्काए ।।

मेरी आँचल तले उड़ान भरे खग,
पल सुकून के प्राप्त करे !
जीवों के नृत्य को देख ,
खुशी से मन मेरा भी विभोर रहे !!

भावार्थ: कवि प्रकृति के साथ एकाकार होना चाहता है। आप हमारी अन्य Nature Poems (प्रकृति कविताएं) में भी इस सौंदर्य को महसूस कर सकते हैं।

5. चुनाव और युवा जोश

Chunaav Poem

देखो, चुनाव आया है ।
कहने को बदलने,
हमारा भाग्य आया है ।।

निराशा से भरी जनता में,
आशा का संचार लाया है ।
झूठे ही सही,
पर वादों की भरमार लाया है ।।

छले जाएँगे फिर एक बार
निश्छल मानुष, अपनी अंधभक्ति में ।
कुचल दिए जायेंगे कीड़े-मकौडों की मानिंद,
जो सच के साथ खड़े होंगे ।

हो चुके हैं आदी, हम उनके वादों की गुलामी के ।
उत्कृष्टता की भूख मर चुकी है शायद ,
या उस पर भी डर हावी है ।।

Yuva Josh

|| युवा जोश ||

Yuva Josh Header

दीन प्रजा, संतप्त हृदय से
जब आवाज लगाती है !
भाव विह्वल हो, जननायक
तब देव स्वरूप उभरते हैं !!

हर लेने को कष्ट सभी,
जब युवा जोश दिखाती है !
संकट का अटल पर्वत भी ,
विवश हो अपना शीश झुकाता है !!

हो दिशाहीन, प्रपंच में फँसकर
कब तक आपस में लड़ोगे !
बन कठपुतली, धूर्तों की
कब तक समय गँवाओगे !!

हे! शक्तिपुंज, तुम नेत्र खोल
अपना सामर्थ्य दिखाओ !
नायक बन, हित साधो राष्ट्र की
बहुरूपियों को सबक सिखाओ !!

कुछ छुपा नहीं, तुमसे है भेद
बस जिज्ञासा दिखलाओ !
इन दुष्ट-पापियों के चंगुल से,
अपना देश बचाओ !!

Desh Bachao
चेतावनी: राजनीति के इस खेल में युवाओं को सतर्क रहना होगा। यह वैसा ही धर्मसंकट है जैसा महाभारत में था, जिसे दिनकर जी ने कृष्ण की चेतावनी में वर्णित किया है। याद रखें, सच है विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है।

6. जग (Jag)

Jag Poem Destruction

रक्त पिपासु बन बैठा जग,
भौतिक सुख पाने को !
है संकीर्णता नस-नस में घुल चुकी,
भाई, भाई का प्राण हैं लेते !!

कुंद पर चुका है स्वविवेक,
परहित का है ध्यान नहीं !
मानो प्रकृति कह रही हमसे,
सर्वनाश है निकट खड़ा !!

है कर्म प्रबल, कोई धर्म नहीं
पाओगे वही जो बोया है !
लड़कर सुख हो छीज सकते,
मुक्ति से दूर हो जाओगे !!

क्या सोच आये थे, धरा को
नर्क बना जाओगे !
हे! मूढ़मति अब भी संभलो,
है दुःखद अंत आने वाला !!

नस-नस में अंगार जलेगा,
सब दर्प भष्म हो जाएगा !
राखों के ढ़ेर पर रक्तवर्ण,
यमदूत खड़ा गुर्राएगा !

Yamdoot
निष्कर्ष: अगर मनुष्य ने अपने कर्म नहीं सुधारे, तो विनाश निश्चित है। समय की मांग है परिवर्तन (Change), क्योंकि परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है।

✍️ "राकेश झा 'सक्षम'"

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