हरी हरी दूब पर कविता - अटल बिहारी वाजपेयी
प्रकृति (Nature) और जीवन के यथार्थ का एक अद्भुत काव्य-संगम...
स्रोत (Source): अटल बिहारी वाजपेयी रचनावली
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, प्रख्यात वक्ता और हिंदी के कालजयी कवि अटल बिहारी वाजपेयी की लेखनी में हमेशा एक दार्शनिक गहराई रही है। जब हम इंटरनेट पर Nature Poems in Hindi (प्रकृति पर हिंदी कविताएँ) खोजते हैं, तो उनकी प्रसिद्ध रचना 'हरी हरी दूब पर' अनायास ही ध्यान खींच लेती है।
यह मात्र एक कविता नहीं है, बल्कि सुबह की घास (दूब) पर पड़ी एक छोटी सी 'ओस की बूंद' के माध्यम से जीवन की क्षणभंगुरता (Fragility of life) का दस्तावेज़ है। यह कविता Atal Bihari Vajpayee poems in Hindi के उस विशेष संग्रह का हिस्सा है जो हमें प्रकृति के साथ-साथ वर्तमान में जीने की कला सिखाती है। आइए, साहित्यशाला के इस अंक में पढ़ें इस कविता का संपूर्ण मूल पाठ और इसका विस्तृत भावार्थ।
कविता पाठ: हरी-हरी दूब पर (संपूर्ण कविता)
हरी-हरी दूब पर
ओस की बूँदें
अभी थीं,
अभी नहीं हैं।
ऐसी खुशियाँ
जो हमेशा हमारा साथ दें
कभी नहीं थीं,
कहीं नहीं हैं।
क्वाँर की कोख से
फूटा बाल सूर्य,
जब पूरब की गोद में पाँव फैलाने लगा,
तो मेरी बगीची का पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ
या उसके ताप से भाप बनी,
ओस की बुँदोँ को ढुँढ़ुँ ?
सूर्य एक सत्य है
जिसे झुठलाया नहीं जा सकता
मगर ओस भी तो एक सच्चाई है
यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है
क्योँ न मैं क्षण क्षण को जिऊँ ?
कण-कण मेँ बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ ?
सूर्य तो फिर भी उगेगा,
धूप तो फिर भी खिलेगी,
लेकिन मेरी बगीची की हरी-हरी दूब पर,
ओस की बूँद हर मौसम मेँ नहीँ मिलेगी |
'हरी हरी दूब पर' कविता का विस्तृत भावार्थ
अटल जी की यह रचना प्रकृति (Nature) को माध्यम बनाकर मनुष्य के मनोविज्ञान और जीवन के यथार्थ पर गहरा प्रहार करती है। इसे हम तीन मुख्य भागों में समझ सकते हैं:
-
1. स्थायी खुशियों का भ्रम (Illusion of Permanent Happiness):
कविता की शुरुआत में कवि कहते हैं कि हरी घास पर जो मोतियों जैसी ओस की बूंदें अभी चमक रही थीं, वे पल भर में गायब हो गईं। यह इस बात का प्रतीक है कि "ऐसी खुशियां जो हमेशा हमारा साथ दें, कभी नहीं थीं।" संसार में मनुष्य हमेशा स्थायी सुख ढूँढता है, लेकिन सत्य यह है कि सुख क्षणभंगुर है। -
2. सूर्य बनाम ओस की बूंद (The Conflict of Truth):
जैसे ही सूरज (बाल सूर्य) निकलता है, उसकी गर्मी से ओस वाष्प बन जाती है। कवि दुविधा में है कि वह उगते सूर्य (सार्वभौमिक सत्य/कठोर यथार्थ) का स्वागत करे या खोई हुई ओस (क्षणिक सुंदर पलों) का शोक मनाए। कवि स्वीकार करते हैं कि सूर्य भले ही एक शाश्वत सत्य हो, लेकिन ओस की बूंद का वह छोटा सा अस्तित्व भी उतना ही सच्चा था। -
3. क्षण-क्षण को जीने की कला (Living in the Present):
कविता का चरमोत्कर्ष (Climax) इसके अंतिम पद्यांश में है। सूर्य तो हर दिन उगेगा, धूप रोज़ खिलेगी, लेकिन "ओस की बूंद हर मौसम में नहीं मिलेगी।" यह पंक्ति हमें वर्तमान में जीने का महान संदेश देती है। जो सुंदर पल आज हमारे पास हैं, उन्हें पूरी तरह जी लेना चाहिए (Carpe Diem)।
जीवन के इस गहरे सच और बिछोह के दर्द को हम हाल ही में साहित्यशाला पर प्रकाशित मार्मिक रचना 'माँ का आख़िरी ख़त' में भी महसूस कर सकते हैं, जहाँ उपस्थित क्षणों की कीमत विदाई के बाद समझ आती है।
अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में
२५ दिसंबर १९२४ को जन्मे श्री अटल बिहारी वाजपेयी एक अजातशत्रु राजनेता थे, जिन्हें राष्ट्रधर्म और साहित्य दोनों से असीम प्रेम था। उनका मानना था कि राजनीति की रपटीली राहों पर चलते हुए साहित्य ही वह शक्ति है, जो इंसान को भीतर से ज़िंदा और संवेदनशील बनाए रखती है।
उनकी हिंदी कविताओं (Atal Ji Ki Kavita) में जहाँ एक ओर 'कदम मिलाकर चलना होगा' जैसा ओज और राष्ट्रप्रेम झलकता है, वहीं 'हरी हरी दूब पर' जैसी रचनाओं में एक एकांतप्रिय दार्शनिक के दर्शन होते हैं।
प्रकृति पर आधारित अन्य उत्कृष्ट हिंदी कविताएँ
अगर आपको अटल जी की यह Prakriti Par Kavita पसंद आई, तो हिंदी साहित्य में प्रकृति चित्रण (Nature Imagery) की कई और बेजोड़ रचनाएँ मौजूद हैं। साहित्यशाला पर हम आपके लिए प्रसिद्ध कवियों की प्रकृति कविताएँ लेकर आते हैं। आप नीचे दी गई कविताएँ भी पढ़ सकते हैं:
- ✓ मेघ आए बड़े बन-ठन के (सर्वेश्वर दयाल सक्सेना) - बादलों का मानवीकरण।
- ✓ Nature Poems Collection (प्रकृति का काव्य संकलन)
प्रकृति से इतर, यदि आप अटल जी की देशभक्ति कविताएँ पढ़ना चाहते हैं, तो Patriotic Poems in Hindi की श्रेणी में उनकी रचनाएँ जैसे 'मौत से ठन गई', 'पहचान' और 'कदम मिलाकर चलना होगा' अवश्य पढ़ें। साथ ही, आज सिंधु में ज्वार उठा है और गगन में लहरता है भगवा हमारा जैसी ओजस्वी कविताएँ भी उपलब्ध हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. 'हरी हरी दूब पर कविता' के रचयिता कौन हैं?
यह कालजयी कविता भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न से सम्मानित प्रख्यात कवि श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा लिखी गई है।
2. इस कविता में 'ओस की बूंद' किसका प्रतीक है?
कविता में 'ओस की बूंद' जीवन में मिलने वाली उन छोटी-छोटी खुशियों और सुंदर पलों का प्रतीक है, जो जीवन में बहुत कम समय के लिए आते हैं और समय के साथ (सूर्य की गर्मी से) ओझल हो जाते हैं।
3. कविता की पंक्ति "ओस की बूंद हर मौसम में नहीं मिलेगी" हमें क्या सिखाती है?
यह पंक्ति हमें सिखाती है कि जीवन के सुंदर पलों को कल पर नहीं टालना चाहिए। जो खुशी और सौंदर्य आज हमारे पास है, उसे उसी क्षण में पूरी तरह से जी लेना चाहिए, क्योंकि समय का पहिया हमेशा घूमता रहता है।