हिंदी साहित्य में महादेवी वर्मा वह नाम है जिन्होंने पीड़ा को एक उत्सव बना दिया। जब जीवन की राहों में चुनौतियां आती हैं और सफ़र में मुश्किलें आएं, तो अक्सर व्यक्ति टूट जाता है। लेकिन महादेवी जी की कविता 'विसर्जन' (Visarjan) हमें सिखाती है कि टूटना अंत नहीं, बल्कि उस विराट सत्ता में मिल जाना है।
जहाँ दुःख ही जीवन की कथा रही हो, वहाँ 'विसर्जन' एक आध्यात्मिक समाधान बनकर उभरता है। आइये, इस कविता के गहरे भावार्थ में उतरें।
विसर्जन (Visarjan)
- महादेवी वर्मा -
निशा की, धो देता राकेश
चाँदनी में जब अलकें खोल,
कली से कहता था मधुमास
बता दो मधुमदिरा का मोल;
बिछाती थी सपनों के जाल
तुम्हारी वह करुणा की कोर,
गई वह अधरों की मुस्कान
मुझे मधुमय पीडा में बोर;
झटक जाता था पागल वात
धूलि में तुहिन कणों के हार;
सिखाने जीवन का संगीत
तभी तुम आये थे इस पार!
गये तब से कितने युग बीत
हुए कितने दीपक निर्वाण!
नहीं पर मैंने पाया सीख
तुम्हारा सा मनमोहन गान।
भूलती थी मैं सीखे राग
बिछलते थे कर बारम्बार,
तुम्हें तब आता था करुणेश!
उन्हीं मेरी भूलों पर प्यार!
नहीं अब गाया जाता देव!
थकी अँगुली हैं ढी़ले तार
विश्ववीणा में अपनी आज
मिला लो यह अस्फुट झंकार!
भावार्थ एवं जीवन-दर्शन (Deep Analysis)
महादेवी वर्मा की 'विसर्जन' मात्र एक कविता नहीं, बल्कि आत्म-समर्पण की पराकाष्ठा है। इसमें जीवन के चढ़ाव-उतार और अंततः ईश्वर में विलय होने की यात्रा है।
1. सौंदर्य और नश्वरता का द्वंद्व
प्रथम पद में प्रकृति का मोहक चित्रण है। वसंत (मधुमास) कली से उसका मोल पूछ रहा है। यह संसार की नश्वर सुंदरता का प्रतीक है। लेकिन कवयित्री जानती हैं कि जीवन में हमेशा वसंत नहीं रहता। जब रिश्तों की डोर कमजोर पड़ने लगती है और हम चाहते हैं कि हाथों में हाथ रह जाए, तब नियति अपना खेल खेलती है। महादेवी जी की मुस्कान 'मधुमय पीड़ा' में बदल गई है—ऐसी पीड़ा जो कष्टदायी होते हुए भी प्रिय है।
2. जीवन का संघर्ष (Storms of Life)
तीसरे पद में 'पागल वात' (आंधी) का जिक्र है जो ओस की बूंदों (तुहिन कणों) को झाड़ देती है। यह जीवन के संघर्षों का प्रतीक है। हम सभी को जीवन में प्रेरणा की आवश्यकता होती है, जैसे कि हिंदी मोटिवेशनल कविताएं हमें आगे बढ़ने का साहस देती हैं, वैसे ही महादेवी जी कहती हैं कि इन तूफानों के बीच ही ईश्वर 'जीवन का संगीत' सिखाने आए थे।
यहाँ यह समझना महत्वपूर्ण है कि विपत्ति में हार मान लेना कायरता है। हमें याद रखना चाहिए कि तू भी है राणा का वंशज—संघर्ष हमारे रक्त में है। महादेवी जी का संघर्ष बाहरी नहीं, आंतरिक है।
3. समर्पण और विसर्जन (The Final Surrender)
अंतिम पंक्तियाँ कविता का प्राण हैं। "विश्ववीणा में अपनी आज, मिला लो यह अस्फुट झंकार।" कवयित्री स्वीकार करती हैं कि अब उनसे गाया नहीं जाता (साधना पूरी नहीं हुई), इसलिए वे अपनी अधूरी धुन को ही ईश्वर के विराट संगीत में विसर्जित करना चाहती हैं।
यह भाव हमें गोपालदास नीरज की उस कालजयी रचना की याद दिलाता है जहाँ वे कहते हैं कि मरने के बाद ही मेरा नाम लिया जाएगा। महादेवी भी अपने 'अहं' (Ego) को मिटाकर ही पूर्णता पाना चाहती हैं।
साहित्यिक संदर्भ (Literary Context)
जहाँ महादेवी वर्मा छायावाद और रहस्यवाद के माध्यम से अपनी बात कहती हैं, वहीं आधुनिक हिंदी साहित्य में विनोद कुमार शुक्ल जैसे रचनाकार यथार्थवाद और जादुई यथार्थवाद (Magical Realism) के जरिए जीवन की जटिलताओं को बयां करते हैं। दोनों का उद्देश्य एक ही है—मानवीय संवेदनाओं को शब्द देना।
— साहित्यशाला संपादकीय