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सच है विपत्ति जब आती है (Sach Hai Vipatti Jab Aati Hai) Lyrics & Meaning | रश्मिरथी

सच है विपत्ति जब आती है Lyrics & Meaning | रश्मिरथी

क्या आप जीवन में किसी बड़ी चुनौती या विपत्ति का सामना कर रहे हैं?
टूटिए मत! भारत के राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की इन अमर पंक्तियों को पढ़िए। यह पृष्ठ "सच है विपत्ति जब आती है" कविता (जो उनके महाकाव्य रश्मिरथी के तृतीय सर्ग का हिस्सा है) के सम्पूर्ण Lyrics (हिंदी और Hinglish), विस्तृत भावार्थ, साहित्यिक विश्लेषण और मनोवैज्ञानिक जीवन-सबक प्रस्तुत करता है। यह केवल एक कविता नहीं, बल्कि जीवन युद्ध जीतने का अचूक मंत्र है।

सच है विपत्ति जब आती है Lyrics (हिंदी में)

सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
शूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।
सच है विपत्ति जब आती है कविता हिंदी में - Sach Hai Vipatti Jab Aati Hai
दिनकर जी की रचना जो संकट में साहस का संचार करती है।
मुख से न कभी उफ कहते हैं,
संकट का चरण न गहते हैं,
जो आ पड़ता सब सहते हैं,
उद्योग-निरत नित रहते हैं,
शूलों का मूल नसाने को,
बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।
है कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके वीर नर के मग में?
खम ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़।

मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण का प्रेरक संदेश - रश्मिरथी कविता
विघ्नों को गले लगाकर ही महानता प्राप्त की जा सकती है।
गुण बड़े एक से एक प्रखर,
हैं छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो,
वर्तिका-बीच उजियाली हो।
बत्ती जो नहीं जलाता है
रोशनी नहीं वह पाता है।
पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,
झरती रस की धारा अखण्ड,
मेंहदी जब सहती है प्रहार,
बनती ललनाओं का सिंगार।
जब फूल पिरोये जाते हैं,
हम उनको गले लगाते हैं।
सच है, विपत्ति जब आती है?
भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?
अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?
नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?

जिसने न कभी आराम किया,
विघ्नों में रहकर नाम किया।
योद्धा का संघर्ष और विजय - रामधारी सिंह दिनकर की कविता
आग में तपकर ही योद्धा स्वर्ण के समान निखरता है।
जब विघ्न सामने आते हैं,
सोते से हमें जगाते हैं,
मन को मरोड़ते हैं पल-पल,
तन को झँझोरते हैं पल-पल।
सत्पथ की ओर लगाकर ही,
जाते हैं हमें जगाकर ही।
वाटिका और वन एक नहीं,
आराम और रण एक नहीं।
वर्षा, अंधड़, आतप अखंड,
पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड।

वन में प्रसून तो खिलते हैं,
बागों में शाल न मिलते हैं।
कङ्करियाँ जिनकी सेज सुघर,
छाया देता केवल अम्बर,
विपदाएँ दूध पिलाती हैं,
लोरी आँधियाँ सुनाती हैं।
जो लाक्षा-गृह में जलते हैं,
वे ही शूरमा निकलते हैं।
बढ़कर विपत्तियों पर छा जा,
मेरे किशोर! मेरे ताजा!
जीवन का रस छन जाने दे,
तन को पत्थर बन जाने दे।
तू स्वयं तेज भयकारी है,
क्या कर सकती चिनगारी है?
- राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर"

Sach Hai Vipatti Jab Aati Hai Lyrics in Hinglish

Sach hai, vipatti jab aati hai,
Kayar ko hi dehlati hai,
Soorma nahi vichlit hote,
Kshan ek nahi dheeraj khote,
Vighnon ko gale lagate hain,
Kaanton mein raah banate hain.
Mukh se na kabhi uff kehte hain,
Sankat ka charan na gahte hain,
Jo aa padta sab sahte hain,
Udyog-nirat nit rahte hain,
Shoolon ka mool nasane ko,
Badh khud vipatti par chhane ko.
Hai kaun vighn aisa jag mein,
Tik sake veer nar ke mag mein?
Kham thonk thelta hai jab nar,
Parvat ke jaate paanv ukhad.
Manav jab jor lagata hai,
Patthar paani ban jata hai.
Gun bade ek se ek prakhar,
Hain chhipe manavon ke bheetar,
Mehndi mein jaise laali ho,
Vartika-beech ujiyali ho.
Batti jo nahi jalata hai,
Roshni nahi vah paata hai.
Peesa jata jab ikshu-dand,
Jharti ras ki dhara akhand,
Mehndi jab sahti hai prahaar,
Banti lalnaon ka shringaar.
Jab phool piroye jaate hain,
Hum unko gale lagate hain.
Sach hai, vipatti jab aati hai?
Bhukhand-vijeta kaun hua?
Atulit yash kreta kaun hua?
Nav-dharm praneta kaun hua?
Jisne na kabhi aaram kiya,
Vighnon mein rahkar naam kiya.
Jab vighn saamne aate hain,
Sote se humein jagate hain,
Mann ko marodte hain pal-pal,
Tan ko jhanjhorte hain pal-pal.
Satpath ki or lagakar hi,
Jaate hain humein jagakar hi.
Vatika aur van ek nahi,
Aaram aur ran ek nahi.
Varsha, andhad, aatap akhand,
Paurush ke hain saadhan prachand.
Van mein prasoon toh khilte hain,
Baagon mein shaal na milte hain.
Kankariyan jinki sej sughar,
Chhaya deta keval ambar,
Vipadaayein doodh pilaati hain,
Lori aandhiyan sunaati hain.
Jo laksha-grih mein jalte hain,
Ve hi soorma nikalte hain.
Badhkar vipattiyon par chha ja,
Mere kishore! Mere taaza!
Jeevan ka ras chhan jaane de,
Tan ko patthar ban jaane de.
Tu swayam tej bhaykari hai,
Kya kar sakti chingari hai?

सच है विपत्ति जब आती है का अर्थ (विस्तृत भावार्थ)

1. कायरता बनाम वीरता का मनोविज्ञान

कविता की प्रारंभिक पंक्तियों में दिनकर जी ने स्पष्ट किया है कि विपत्ति (संकट) मनुष्य के चरित्र की कसौटी है। जब मुसीबत आती है, तो डरपोक व्यक्ति घबरा जाता है। लेकिन जो सच्चे शूरवीर होते हैं, वे एक क्षण के लिए भी अपना धीरज नहीं खोते। वे काँटों (बाधाओं) में भी अपने लिए सफलता का नया मार्ग बना लेते हैं। वे संकट के पैरों में नहीं गिरते, बल्कि अपने निरंतर परिश्रम (उद्योग) से विपत्ति के मूल कारण (शूलों का मूल) को नष्ट कर देते हैं।

2. मनुष्य की इच्छाशक्ति की अपार शक्ति

कवि प्रश्न करते हैं कि इस दुनिया में ऐसा कौन सा विघ्न है जो साहसी मनुष्य का रास्ता रोक सके? जब मनुष्य ताल ठोककर (पूरे आत्मविश्वास के साथ) आगे बढ़ता है, तो पहाड़ों के भी पैर उखड़ जाते हैं। मनुष्य की दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे कठोर पत्थर भी पिघलकर पानी बन जाता है। जिस प्रकार दीये की बत्ती जलाए बिना रोशनी नहीं मिलती, उसी प्रकार मनुष्य के भीतर छिपे महान गुण बिना संघर्ष के बाहर नहीं आते।

3. गन्ने और मेहंदी का प्रतीकात्मक उदाहरण

यह भाग साहित्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। कवि समझाते हैं कि जब गन्ने को कोल्हू में पीसा जाता है, तभी उसमें से मीठे रस की निरंतर धारा निकलती है। जब मेहंदी के पत्तों पर पत्थरों का प्रहार होता है, तभी वह स्त्रियों का सुंदर शृंगार बनती है। सुई से बिंधने पर ही फूल गले की माला बनते हैं। तात्पर्य यह है कि बिना कठोर प्रहार सहे और बिना कष्ट उठाए कोई भी इंसान महानता प्राप्त नहीं कर सकता।

4. इतिहास गवाह है - आराम करने वाले महान नहीं होते

धरती का विजेता (भूखण्ड-विजेता) कौन बना? अपार यश किसने प्राप्त किया? नए धर्म और समाज की स्थापना किसने की? इतिहास बताता है कि यह सब केवल उसी ने किया है जिसने कभी आराम नहीं किया, बल्कि विपत्तियों के बीच रहकर अपना नाम अमर किया। संकट हमें जगाने आते हैं, हमारी सोई हुई शक्तियों को झकझोर कर हमें सत्य के मार्ग (सत्पथ) पर ले जाते हैं।

5. वन और लाक्षा-गृह का महाकाव्यिक संदर्भ

सुंदर बगीचे (वाटिका) और घने जंगल (वन) में बहुत अंतर है। आराम की ज़िंदगी और युद्ध के मैदान (रण) में भी जमीन-आसमान का फर्क है। भयंकर बारिश, आँधी और चिलचिलाती धूप ही मनुष्य को असली पुरुष (ताकतवर) बनाते हैं। जो लोग कंकड़-पत्थरों पर सोते हैं, आसमान जिनकी छत है, आंधियाँ जिन्हें लोरी सुनाती हैं, और जो महाभारत के 'लाक्षा-गृह' (कौरवों द्वारा रची गई अग्नि की साजिश) में जलकर भी जीवित निकलते हैं, वही सच्चे योद्धा (शूरमा) बनते हैं।

6. युवाओं के लिए अंतिम आह्वान

अंत में कवि (श्रीकृष्ण के माध्यम से) युवाओं से कहते हैं कि हे किशोर! आगे बढ़कर विपत्तियों पर हावी हो जाओ। अपने शरीर को कष्ट सहकर पत्थर के समान फौलादी बन जाने दो। तुम्हारे भीतर स्वयं एक भयंकर आग और तेज छिपा है, विपत्ति रूपी यह छोटी सी चिनगारी तुम्हारा क्या बिगाड़ सकती है?

कविता के बारे में: रश्मिरथी और महाभारत का संदर्भ

यह महज़ एक स्वतंत्र प्रेरक कविता नहीं है, बल्कि यह महान हिंदी काव्य 'रश्मिरथी' (सूर्य के रथ का सारथी) के तृतीय सर्ग (Third Chapter) का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंश है। आप अमर उजाला पर भी इसके साहित्यिक महत्व के बारे में पढ़ सकते हैं।

श्रीकृष्ण ने ऐसा क्यों कहा? महाभारत में 12 वर्ष के कठोर वनवास और 1 वर्ष के अज्ञातवास के बाद, जब पांडव वापस लौटते हैं, तो भगवान श्रीकृष्ण एक 'शांति दूत' बनकर हस्तिनापुर जाते हैं। यह कविता उसी समय के संदर्भ को दर्शाती है। कवि यह स्थापित करना चाहते हैं कि वनवास पांडवों के लिए कोई सज़ा नहीं थी, बल्कि एक प्रशिक्षण था। वन की कठोरताओं (आँधी, धूप, कंकड़) ने ही उन्हें आने वाले कुरुक्षेत्र के महायुद्ध के लिए असली 'शूरमा' बनाया।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर और साहित्यिक विश्लेषण

रामधारी सिंह दिनकर कौन थे?

भारत के राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' (1908–1974) आधुनिक हिंदी साहित्य के सबसे शक्तिशाली हस्ताक्षर माने जाते हैं। बिहार के मुंगेर (अब बेगूसराय) में जन्मे दिनकर जी को उनकी ओजस्वी और राष्ट्रवादी कविताओं के लिए जाना जाता है। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार (उर्वशी के लिए) और पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। उनकी कविताएँ मुख्य रूप से 'वीर रस' से ओत-प्रोत होती हैं, जो युवाओं में देशभक्ति और अदम्य साहस का संचार करती हैं। (और पढ़ें: भारत पर हिंदी कविताएँ)

साहित्यिक विश्लेषण (रस, अलंकार, बिंब)

रस (Rasa): इस कविता में मुख्य रूप से 'वीर रस' और 'ओज गुण' का अद्भुत प्रवाह है, जो पाठक की नसों में रक्त का संचार तेज़ कर देता है।

अलंकार (Alankar): दिनकर जी ने दृष्टांत अलंकार का बहुत ही सुंदर प्रयोग किया है (जैसे गन्ने और मेहंदी का उदाहरण देकर अपनी बात सिद्ध करना)। "पत्थर पानी बन जाता है" में अनुप्रास अलंकार की छटा है।

प्रतीकात्मकता (Symbolism): 'लाक्षा-गृह' षड्यंत्रों का प्रतीक है। 'कंकड़ियाँ' और 'आँधियाँ' जीवन के संघर्षों, गरीबी और समाज के विरोध का सटीक प्रतीक हैं। (साहित्यिक तुलना के लिए हमारी विद्यापति की कविताओं का विश्लेषण भी पढ़ें।)

इस कविता से हमें क्या सीख मिलती है? (Life Lessons)

  • साहस (Courage): विपत्ति के समय डरना कायरता की निशानी है। वीर मनुष्य डर के बावजूद कार्रवाई करते हैं।
  • धैर्य (Patience): चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विकट क्यों न हों, एक सेकंड के लिए भी अपना आपा (धीरज) न खोएं।
  • कठिन परिश्रम (Hard Work): समस्याओं के सामने रोने (उफ कहने) से बेहतर है कि उन्हें जड़ से मिटाने के लिए निरंतर प्रयास (उद्योग) किया जाए।
  • दृढ़ निश्चय (Determination): यदि इंसान अपनी पूरी ताकत लगा दे, तो असंभव कार्य (पत्थर का पानी बनना) भी संभव हो जाता है।
  • नेतृत्व क्षमता (Leadership): महानता और सफलता कभी भी आराम के बिस्तर पर नहीं मिलती। इतिहास उसी को याद रखता है जो संघर्ष की आग में तपता है।

मूल संदेश (Moral): जीवन में कभी भी आसान रास्तों की प्रार्थना मत करो, बल्कि कठिन रास्तों पर चलने की शक्ति मांगो। विपत्ति हमारी दुश्मन नहीं, बल्कि हमें निखारने वाली हमारी सबसे बड़ी शिक्षक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. "सच है विपत्ति जब आती है" कविता के रचयिता कौन हैं?
इस ओजस्वी कविता के रचयिता भारत के महान राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' जी हैं।
2. यह कविता किस पुस्तक या महाकाव्य से ली गई है?
यह कविता दिनकर जी के प्रसिद्ध महाकाव्य 'रश्मिरथी' के 'तृतीय सर्ग' (तीसरे अध्याय) का एक प्रारंभिक अंश है।
3. कविता में 'शूरमा' शब्द का क्या अर्थ है?
'शूरमा' का अर्थ है - वीर, पराक्रमी और साहसी योद्धा जो किसी भी संकट के सामने हार नहीं मानता।
4. कवि ने मनुष्य की तुलना गन्ने (इक्षु-दण्ड) और मेहंदी से क्यों की है?
जिस तरह गन्ने को पीसे जाने पर रस निकलता है और मेहंदी को पीसने पर गहरा लाल रंग आता है, उसी तरह इंसान भी कष्टों और संघर्षों को सहने के बाद ही अपनी पूरी क्षमता (महानता) तक पहुँच पाता है।
5. 'लाक्षा-गृह' का क्या अर्थ है और इसका यहाँ क्या संदर्भ है?
महाभारत में कौरवों ने पांडवों को जीवित जलाने के लिए लाख का घर (लाक्षा-गृह) बनवाया था। कवि का तात्पर्य है कि जो व्यक्ति जीवन के ऐसे भयंकर षड्यंत्रों और आग से बचकर निकलता है, वही असली योद्धा बनता है।
6. इस कविता में मुख्य रूप से किस 'रस' का प्रयोग हुआ है?
इस कविता में मुख्य रूप से 'वीर रस' का प्रयोग हुआ है, जो पाठक के मन में उत्साह और अदम्य साहस जगाता है।
7. "खम ठोंक ठेलता है जब नर" का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है - जब कोई मनुष्य पूरे आत्मविश्वास के साथ ताल ठोककर (चुनौती देकर) अपनी पूरी ताकत के साथ आगे बढ़ता है।
8. विपत्ति आने पर 'कायर' व्यक्ति क्या करता है?
कविता के अनुसार, विपत्ति आते ही कायर व्यक्ति डर से काँपने लगता है, अपना धैर्य खो देता है और हार मान लेता है।
9. "मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है" पंक्ति का भावार्थ क्या है?
इसका भावार्थ यह है कि मनुष्य की इच्छाशक्ति और परिश्रम के आगे कुछ भी असंभव नहीं है। उसके प्रयास से पत्थर (कठिन से कठिन बाधा) भी पानी (आसान) बन जाता है।
10. क्या मैं इस कविता का उपयोग स्कूल की भाषण प्रतियोगिता में कर सकता हूँ?
बिल्कुल! भारत में भाषण, वाद-विवाद (Debate) और किसी भी प्रकार के मोटिवेशनल सेमिनार के लिए यह सबसे अधिक पसंद की जाने वाली और प्रभावशाली कविता है।
11. कविता में 'भूखण्ड-विजेता' किसे कहा गया है?
'भूखण्ड-विजेता' का अर्थ है धरती को जीतने वाला (महान शासक)। कवि कहते हैं कि इतिहास में वही विजेता बना है जिसने आराम को छोड़कर संकटों का सामना किया है।
12. "तू स्वयं तेज भयकारी है" कहकर कवि युवाओं को क्या समझाना चाहते हैं?
भगवान श्रीकृष्ण (या कवि) युवाओं से कहते हैं कि तुम्हारे अंदर स्वयं असीम ऊर्जा और आग छिपी है। विपत्ति तो मात्र एक छोटी सी चिनगारी है, जो तुम्हारे इस विशाल तेज़ का कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
13. इस कविता का मुख्य उद्देश्य (Purpose) क्या है?
इस कविता का मुख्य उद्देश्य निराश और हताश हो चुके व्यक्ति के मन में ऊर्जा भरना और उसे यह याद दिलाना है कि संघर्ष ही सफलता की एकमात्र सीढ़ी है।
14. मैं "सच है विपत्ति जब आती है" का PDF कैसे डाउनलोड कर सकता हूँ?
आप इस पूरी कविता और इसके अर्थ को PDF रूप में सहेजने के लिए अपने ब्राउज़र में 'Print' का विकल्प (Ctrl+P या Cmd+P) दबाकर "Save as PDF" चुन सकते हैं।
15. क्या रश्मिरथी की कोई अन्य प्रसिद्ध कविताएँ भी हैं?
हाँ, 'कृष्ण की चेतावनी' (वर्षों तक वन में घूम-घूम) रश्मिरथी का एक और अत्यंत प्रसिद्ध और शक्तिशाली प्रसंग है, जिसे आप साहित्यशाला पर पढ़ सकते हैं।

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