हिंदी साहित्य के आकाश में दुष्यंत कुमार एक ऐसे नक्षत्र हैं जिन्होंने अपनी गज़लों से सत्ता और समाज दोनों को झकझोर दिया। जहाँ एक तरफ उनकी रचना 'हो गई है पीर पर्वत-सी' जन-आंदोलनों का गीत बनी, वहीं दूसरी तरफ उनकी प्रेम कविताएँ मानवीय संवेदनाओं की गहरी पड़ताल करती हैं।
आज हम उनकी एक अत्यंत मार्मिक कविता 'परांगमुखी प्रिया से' का विश्लेषण करेंगे, जो प्रेम में मिली उपेक्षा और अस्तित्व के बिखराव की गाथा है।
परांगमुखी प्रिया से
(Paraangmukhi Priya Se - Dushyant Kumar Poem)
ओ परांगमुखी प्रिया!
कोरे कागज़ों को रँगने बैठा हूँ
असत्य क्यों कहूँगा
तुमने कुछ जादू कर दिया।
खुद को तोड़ते हुए
दिन बीता करते हैं,
बदली हैं आकृतियाँ:
मेरे अस्तित्व की इकाई को
तुमने ही
एक से अनेक कर दिया!
उँगलियों में मोड़ कर लपेटे हुए
कुंतलों-से
मेरे विश्वासों की
रूपरेखा यही थी?
रह रहकर
मन में उमड़ते हुए
वात्याचक्रों के बीच
एकाकी
जीर्ण-शीर्ण पत्तों-से
नाचते-भटकते मेरे निश्चय
क्या ऐसे थे?
ज्योतिषी के आगे
फैले हुए हाथ-सी
प्रश्न पर प्रश्न पूछती हुई—
मेरे ज़िंदगी,
क्या यही थी?
नहीं....
नहीं थी यह गति!
मेरे व्यक्तित्व की ऐसी अंधी परिणति!!
शिलाखंड था मैं कभी,
ओ परांगमुखी प्रिया!
सच, इस समझौते ने बुरा किया,
बहुत बड़ा धक्का दिया है मुझे
कायर बनाया है।
फिर भी मैं क़िस्मत को
दोष नहीं देता हूँ,
घुलता हूँ खुश होकर,
चीख़कर, उठाकर हाथ
आत्म-वंचना के इस दुर्ग पर खड़े होकर
तुमसे ही कहता हूँ—
मुझमें पूर्णत्व प्राप्त करती है
जीने की कला;
खंड खंड होकर जिसने
जीवन-विष पिया नहीं,
सुखमय, संपन्न मर गया जो जग में आकर
रिस-रिसकर जिया नहीं,
उसकी मौलिकता का दंभ निरा मिथ्या है
निष्फल सारा कृतित्व
उसने कुछ किया नहीं।
भावार्थ एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण (Analysis)
1. अस्तित्व का बिखराव (Fragmentation)
कविता की शुरुआत में ही कवि स्वीकार करते हैं कि प्रेम ने उनके 'अस्तित्व की इकाई' को खंडित कर दिया है। यह वही भाव है जो दुष्यंत जी की एक और कविता 'ओ मेरी ज़िन्दगी' में मिलता है, जहाँ वे जीवन के अर्थ को खोजते नज़र आते हैं। यहाँ प्रिया की उपेक्षा ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया है, और वे खुद को एक नहीं, बल्कि 'अनेक' महसूस कर रहे हैं।
2. एकाकीपन और प्रश्न (Loneliness & Questions)
कवि अपने 'निश्चयों' की तुलना 'जीर्ण-शीर्ण पत्तों' से करते हैं जो हवा में भटक रहे हैं। यह अकेलापन इतना गहरा है कि वे ज्योतिषी के आगे हाथ फैलाने को विवश हैं। यह वही सूनापन है जिसका ज़िक्र उन्होंने अपनी गज़ल आज वीरान अपना घर देखा में किया है। जब अपना ही घर (या मन) अजनबी लगने लगे, तो व्यक्ति बाहरी सहारा ढूंढता है।
3. शिलाखंड से संवेदनशीलता तक
कवि कहते हैं—"शिलाखंड था मैं कभी"। पहले वे कठोर थे, अटल थे। शायद तब उनके विचार वैसे ही क्रान्तिकारी थे जैसे कहाँ तो तय था चिराग़ाँ में व्यक्त हुए हैं, जहाँ वे व्यवस्था पर चोट करते हैं। लेकिन प्रेम के 'समझौते' ने उन्हें पिघला दिया है, जिसे वे 'कायरता' कहते हैं। परन्तु गहराई से देखें, तो यह कायरता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का जागना है।
4. पूर्णत्व की प्राप्ति (Attaining Completeness)
अंतिम पंक्तियों में दुष्यंत जी का दार्शनिक स्वर मुखर होता है। वे मानते हैं कि जिसने जीवन में टूटकर बिखरना नहीं सीखा, जिसने संघर्ष नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ है। समाज को चाहिए कि वह सफलता के पुराने पैमाने छोड़े और मापदंड बदलो की राह पर चले। सच्चा जीवन वही है जो 'रिस-रिसकर' जिया गया हो, न कि वह जो केवल सुख-सुविधाओं में बीत गया हो।
दुष्यंत कुमार: प्रेम और विद्रोह के कवि
दुष्यंत कुमार केवल प्रेम के कवि नहीं थे। जहाँ 'परांगमुखी प्रिया से' में वे ह्रदय की पीड़ा व्यक्त करते हैं, वहीं अपनी गज़लों में वे राजनीतिक भ्रष्टाचार पर तीखा प्रहार करते हैं। उनकी पंक्तियाँ कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर आज के दौर में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी तब थीं। उनके विस्तृत जीवन परिचय के लिए आप Hindwi Profile पर जा सकते हैं।
— साहित्यशाला संपादकीय