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आंसू : जयशंकर प्रसाद (Aansu Poem) - सम्पूर्ण मूल पाठ, भावार्थ, शब्दार्थ और शिल्प विश्लेषण

Kisi Ke Kahe Par Chalna Mujhe Manzoor Nahin - Harishankar Parsai Ji Ki Hindi Kavita

Kisi Ke Kahe Par Chalna Mujhe Manzoor Nahin - Harishankar Parsai Ji Ki Hindi Kavita

हरिशंकर परसाई की हिंदी कविता

हरिशंकर परसाई की हिंदी कविता

किसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझको

नहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझको
ले निराला मार्ग उस पर सींच जल कांटे उगाता
और उनको रौंदता हर कदम मैं आगे बढ़ाता

शूल से है प्यार मुझको, फूल पर कैसे चलूं मैं?

बांध बाती में हृदय की आग चुप जलता रहे जो
और तम से हारकर चुपचाप सिर धुनता रहे जो
जगत को उस दीप का सीमित निबल जीवन सुहाता
यह धधकता रूप मेरा विश्व में भय ही जगाता

प्रलय की ज्वाला लिए हूं, दीप बन कैसे जलूं मैं?

जग दिखाता है मुझे रे राह मंदिर और मठ की
एक प्रतिमा में जहां विश्वास की हर सांस अटकी
चाहता हूँ भावना की भेंट मैं कर दूं अभी तो
सोच लूँ पाषान में भी प्राण जागेंगे कभी तो

पर स्वयं भगवान हूँ, इस सत्य को कैसे छलूं मैं?
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हरिशंकर परसाई 

Kisi Ke Kahe Par Chalna Mujhe Manzoor Nahin - Harishankar Parsai Ji Ki Hindi Kavita

Kisi Ke Kahe Par Chalna - Harishankar Parsai Ji Ki Hindi Kavita

Kisi ke kahe par chalna mujhe manzoor nahin,
Na hi mujhe chahiye kisi padchinh ki zameen.
Main alag rasta chunta hoon, kaanton se bhara,
Unhein seenchta hoon aur fir raundta hoon har kadam par.

Mujhe shoolon se ishq hai, phoolon par kaise chaloon?

Main apne dil ki aag ko baati mein baandhkar
Chupchap jalta rahoon — ye mumkin nahin.
Jo andhere se haar kar sir jhuka de,
Woh deepak duniya ko pyaara lag sakta hai —
Par main woh nahin.
Main to bhabhakti jwala hoon — mujhe dekh duniya kaampti hai.

Jab pralay ki lau hoon main, to deep bankar kaise jaloon?

Duniya mujhe mandiron aur mathon ki raah dikhati hai,
Jahan aastha ek murti mein atak jaati hai.
Main chahta hoon apne jazbaaton ki aahuti wahi de doon,
Shaayad patthar mein bhi kabhi jaan aa jaaye.

Par jab main khud Bhagwan hoon —
To khud se yeh dhokha kaise karoon?

हरिशंकर परसाई की हिंदी कविता का भावार्थ

यह कविता आत्मबोध, विद्रोह और स्वतंत्र चेतना की गूंज है। कवि यहां किसी के निर्देश पर चलने से मना करता है — उसे न तो किसी मार्गदर्शक की ज़रूरत है, न ही किसी पुराने पदचिह्न की। वह अपने रास्ते खुद बनाना चाहता है, और कांटों से भरे रास्ते को चुनकर उन्हें सींचता भी है — जैसे जानबूझकर संघर्षों को गले लगाता हो। यह एक ऐसी चेतना की अभिव्यक्ति है जो सुविधा नहीं, बल्कि तप और कष्ट को अपना सौंदर्य मानती है। “मुझे शूलों से प्यार है, फूलों पर कैसे चलूं मैं?” — यह पंक्ति इस पूरे दर्शन की धुरी है।

कवि उस दीपक के रूप को भी ठुकराता है जो चुपचाप जलता है, अंधेरे से हार जाता है, और जिसे दुनिया अच्छा मानती है। वह कहता है कि जब मैं खुद एक धधकती ज्वाला हूं, तो दीपक की सीमित भूमिका कैसे निभाऊं? यानी वह खुद को केवल "प्रकाश" देने वाला नहीं, बल्कि "परिवर्तन" लाने वाला मानता है — जो डर पैदा करता है, व्यवस्था को हिला सकता है। वह एक प्रलय की लौ है, जिसे कोई बाती में नहीं बांध सकता।

समाज जब उसे धार्मिक मार्ग दिखाता है — मंदिरों, मठों, मूर्तियों की ओर मोड़ता है — तो वह वहां भी रुकता नहीं। उसे मूर्तिपूजा की सांसों में अटकी हुई आस्था स्वीकार नहीं। वह भावना की सच्ची आहुति देना चाहता है, न कि परंपराओं की नकल करना। अंतिम पंक्तियों में वह अपने आध्यात्मिक शिखर पर पहुँचता है — "पर स्वयं भगवान हूँ, इस सत्य को कैसे छलूं मैं?" — यह आत्मबोध का सबसे उच्चतम स्तर है। वह कहता है कि जब भीतर ही ईश्वर का प्रकाश है, तब बाहर की मूर्तियों को पूजने का ढोंग क्यों करूँ?

हरिशंकर परसाई की हिंदी कविता

इस प्रकार, यह कविता केवल विद्रोह नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति, चेतना की आज़ादी, और आस्था के नए स्वरूप की उद्घोषणा है। यह उस व्यक्ति की आवाज़ है जो फूलों की राहों से नहीं, कांटों की आग से अपनी पहचान बनाता है — और पूरी दुनिया से कहता है: "मैं तुम्हारे बनाए फ्रेम में नहीं आता, क्योंकि मैं स्वयं दीप नहीं, प्रलय हूँ।"


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