पाश की कविता "भारत": मिथकों से परे, असली हिंदुस्तान का ज़मीनी दस्तावेज़
जब भी कोई नेता मंच से 'राष्ट्रीय एकता' का नारा लगाता है, तो उसके ज़ेहन में कौन सा भारत होता है? क्या वह भारत जो संसद के एसी कमरों में बैठ कर 'ज़हरीली मक्खियों' द्वारा बुना जाता है? या वह भारत जो सच में खेतों की धूल में अपनी ज़िंदगी काट देता है? यदि "समय कोई कुत्ता नहीं" में पाश ने सत्ता के मीडिया प्रोपेगैंडा को नंगा किया था, तो अपनी इस कविता "भारत" में वे देश के सबसे बड़े प्रोपेगैंडा—'मिथकीय राष्ट्रवाद'—पर प्रहार करते हैं।
साहित्यशाला के मंच पर हम पाश के इस सबसे मारक और भावुक दर्शन को समझने जा रहे हैं। पाश कहते हैं कि भारत का अर्थ राजा दुष्यंत (पौराणिक मिथक) से नहीं जुड़ा है। उनके लिए भारत का अर्थ उस किसान से है जिसके पास 'सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं' है। यह कविता उस 'खोखले राष्ट्रवाद' की टोपी हवा में उछाल देती है जो ग़रीबों की भूख को 'राष्ट्रीय एकता' के नारों तले दबाना चाहता है।
कविता का मूल पाठ: भारत
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स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 164) | अनुवाद: चमनलाल
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मनोवैज्ञानिक और मार्क्सवादी विश्लेषण: 'नेशन' की असली परिभाषा
जब पाश कहते हैं कि "भारत मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द है", तो वे स्पष्ट कर देते हैं कि वे देशद्रोही नहीं हैं। उनका विद्रोह देश से नहीं, बल्कि उस पूँजीवादी व्यवस्था (Capitalist Structure) से है जिसने देश को हाईजैक कर लिया है। पाश के लिए 'भारत' का अर्थ नक़्शे पर खिंची लकीरें नहीं, बल्कि "खेतों के वे बेटे" हैं जो इतने पिछड़े हैं कि आज भी पेड़ों की परछाई से वक़्त मापते हैं।
पेट की समस्या बनाम राष्ट्रीय एकता
कविता की सबसे दर्दनाक पंक्ति है—"उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं।" जब एक इंसान को दो वक़्त की रोटी मयस्सर न हो, तो उसे कश्मीर, सीमा-विवाद या 'राष्ट्रीय एकता' के नारों से क्या मतलब? राजनेता हमेशा ग़रीबों का पेट खाली रखते हैं और उन्हें झूठे राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाते हैं। पाश कहते हैं कि ऐसे नेताओं की "टोपी हवा में उछाल दूँ"—यानी उनके पाखंड को सरेआम नंगा कर दूँ। यह ठीक अदम गोंडवी की ग़ज़ल 'काजू भुने प्लेट में रामराज' जैसा ज़मीनी और खुरदुरा यथार्थ है।
दुष्यंत का मिथक और खेतों की हकीकत
भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार, भारत का नाम राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र 'भरत' के नाम पर पड़ा है। लेकिन पाश इस 'गौरवशाली मिथक' (Glorified Mythology) को नकार देते हैं। उनका तर्क है कि एक भूखे किसान का भारत किसी प्राचीन राजा से कैसे जुड़ सकता है? भारत के असली अर्थ खेतों में दायर हैं—जहाँ एक तरफ़ तो 'अन्न उगाया' जाता है (सृजन), और दूसरी तरफ़ व्यवस्था द्वारा उस किसान के हक़ में 'सेंध लगती' है (शोषण)। पाश का यह रूपक हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ विद्रोही कवियों की कतार में उन्हें सबसे अलग खड़ा करता है।
निष्कर्ष: आपका 'भारत' कौन सा है?
आज जब 'राष्ट्रवाद' का पैमाना सोशल मीडिया पर तय होता है, पाश की यह कविता एक सीधा सवाल दागती है। क्या हमारा भारत महज़ ऐतिहासिक किताबों और मिथकों का भारत है? या हमारा भारत वह है जो आज भी नंगे पैर खेतों में खड़ा है और जिसका हक़ लूटा जा रहा है? असली देशभक्ति सीमाओं पर नारे लगाने में नहीं, बल्कि अपने देश के उस 'भूखे किसान' के हक़ के लिए अंतिम साँस तक लड़ जाने (Sportsman Spirit) में है।
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External Authoritative References
https://en.wikipedia.org/wiki/Pash, https://www.rekhta.org/poets/pash/poems, https://hindisamay.com/content/1155/1/
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. पाश के अनुसार 'भारत' शब्द का असली अर्थ कहाँ बसता है?
पाश के अनुसार, 'भारत' का असली अर्थ किसी ऐतिहासिक मिथक (राजा दुष्यंत) या नेताओं के भाषणों में नहीं है, बल्कि खेतों में कड़ी मेहनत करने वाले उन किसानों में बसता है जिनकी एकमात्र समस्या अपना 'पेट' पालना है।
2. "उसकी टोपी हवा में उछाल दूँ" से कवि का क्या तात्पर्य है?
'टोपी' यहाँ उन पाखंडी राजनेताओं और कुलीन वर्ग का प्रतीक है जो ग़रीबों का शोषण करके मंच से 'राष्ट्रीय एकता' का झूठा नारा देते हैं। 'टोपी उछालना' मतलब सरेआम उनके पाखंड को बेनकाब करके उनकी इज़्ज़त उतारना है।
3. "जहाँ अन्न उगाता है, जहाँ सेंध लगती है" का मार्क्सवादी अर्थ क्या है?
यह सीधा वर्ग-संघर्ष (Class Struggle) है। किसान 'अन्न उगाता है' (सृजन/Production) लेकिन पूँजीपति और भ्रष्ट तंत्र उसके मुनाफ़े में 'सेंध लगाता है' (शोषण/Exploitation)। पाश कहते हैं कि असली भारत इसी संघर्ष का नाम है।
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