त्रिलोचन की कविता: 'चंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती' | भावार्थ, कला पक्ष और सामाजिक अर्थ
क्या एक अनपढ़ ग्रामीण लड़की भारत के महानगरीय पूंजीवाद को चुनौती दे सकती है?
हिंदी साहित्य में बाबा नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह और त्रिलोचन को 'प्रगतिशील त्रयी' (Progressive Trinity) माना जाता है। कल्पना कीजिए अवध के एक सुदूर गाँव की, जहाँ एक चंचल ग्रामीण लड़की—चंपा—कवि को कागज़ पर 'काले निशान' बनाते हुए अचरज से देखती है। वह मासूमियत से सोचती है कि इन बेजान आकृतियों से स्वर कैसे फूटते हैं?
त्रिलोचन शास्त्री जी की 1945 में प्रकाशित प्रसिद्ध कृति 'धरती' से ली गई यह कविता महज़ एक निरक्षर बच्ची की नासमझी का दस्तावेज़ नहीं है; यह वास्तव में उस ग्रामीण भारत की त्रासदी और विस्थापन का जीवंत चित्रण है जिसे 'आधुनिकता' ने अनपढ़ छोड़कर, उसके अपनों को कलकत्ता की मिलों में झोंक दिया।
यह कविता वैचारिक नारों से परे एक मानवीय असहमति का सबसे सशक्त और मार्मिक दस्तावेज़ है। हिंदी कविता के रस, छंद और अलंकार की अकादमिक रूढ़ियों को तोड़कर, त्रिलोचन ने इस मुक्त छंद में जो संवादात्मक आत्मीयता रची है, वह दुर्लभ है।
- पाठ्यपुस्तक: आरोह (भाग-1), पृष्ठ 126
- काव्य रूप: मुक्त छंद (संवादात्मक शैली)
- मुख्य विषय: शिक्षा के प्रति ग्रामीण स्त्री-दृष्टि का प्रतिनिधित्व और औद्योगिक पलायन की पीड़ा।
- विशेषता: यह कविता बाल-सुलभ जिज्ञासा के माध्यम से पूंजीवादी व्यवस्था (कलकत्ता) पर करारा प्रहार करती है।
मूल कविता की पंक्तियाँ
चंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है
खड़ी-खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है :
इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर
निकला करते हैं
चंपा सुंदर की लड़की है
सुंदर ग्वाला है : गायें-भैंसे रखता है
चंपा चौपायों को लेकर
चरवाही करने जाती है
चंपा अच्छी है
चंचल है
न ट ख ट भी है
कभी-कभी ऊधम करती है
कभी-कभी वह क़लम चुरा देती है
जैसे तैसे उसे ढूँढ़ कर जब लाता हूँ
पाता हूँ—अब काग़ज़ ग़ायब
परेशान फिर हो जाता हूँ
चंपा कहती है :
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुनकर मैं हँस देता हूँ
फिर चंपा चुप हो जाती है
उस दिन चंपा आई, मैंने कहा कि
चंपा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है—
सब जन पढ़ना-लिखना सीखें
चंपा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ूँगी
तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ूँगी
मैंने कहा कि चंपा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम संग साथ रह चला जाएगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चंपा पढ़ लेना अच्छा है!
चंपा बोली : तुम कितने झूठे हो, देखा,
हाय राम, तुम पढ़ लिखकर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करूँगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूँगी
कलकत्ता मैं कभी न जाने दूँगी
कलकत्ते पर बजर गिरे।
त्रिलोचन शास्त्री: एक दुर्लभ साहित्यिक संवाद
कविता की गहराई में उतरने से पहले, प्रसार भारती अभिलेखागार से त्रिलोचन जी के इस दुर्लभ साक्षात्कार को सुनें जहाँ वे अपनी काव्य दृष्टि समझा रहे हैं:
भावार्थ (The Deep Literary Soul of the Poem)
यह कविता चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती भावार्थ के रूप में शिक्षा के प्रति एक ग्रामीण दृष्टिकोण का मार्मिक और व्यंग्यात्मक आख्यान है। सुंदर ग्वाले की बेटी 'चंपा' निरक्षर है। कवि जब पढ़ता-लिखता है, तो वह हैरान होती है कि इन काले निशानों से आवाज़ें कैसे निकलती हैं।
जब कवि उसे शिक्षा का महत्व समझाता है और कहता है कि गाँधी जी भी यही चाहते हैं, तो वह मासूमियत से तर्क देती है कि 'गाँधी बाबा तो अच्छे हैं, वे पढ़ाई जैसी उबाऊ बात क्यों कहेंगे?' यहाँ शिक्षा और ग्रामीण यथार्थ का गहरा द्वंद्व है। इसके बाद कवि उसे भविष्य का डर दिखाता है कि शादी के बाद जब उसका पति कमाने के लिए कलकत्ता (महानगर) जाएगा, तो वह चिट्ठी कैसे लिखेगी?
चंपा का अंतिम जवाब साहित्य को झकझोर देने वाला है: "कलकत्ते पर बजर गिरे!" यह केवल एक बच्ची का क्रोध नहीं है; यह एक ऐसी विद्रोही ग्रामीण आवाज़ है जो उस व्यवस्था को नष्ट कर देना चाहती है जो उनके अपनों को उनसे छीन लेती है। जिस तरह अदम गोंडवी की रचनाओं में व्यवस्था पर बेबाक चोट दिखती है, वैसी ही तेज़ धार यहाँ एक अबोध बालिका की सहजता में छुपी है।
कला पक्ष (Artistic Excellence & Academic Analysis)
विशेषकर कक्षा 11 हिंदी कविता 'आरोह भाग-1' के संदर्भ में देखें, तो त्रिलोचन अपनी भाषाई सादगी के लिए अद्वितीय हैं। जहाँ दीप्ति मिश्रा की ग़ज़लों में रदीफ़ और काफ़िए की मुकम्मल शास्त्रीय सजावट मिलती है, वहीं त्रिलोचन जी की इस कविता में कोई कृत्रिम अलंकार नहीं है।
- छंद और शैली: यह मुक्त छंद (Free Verse) की कविता है, जिसे संवादात्मक (Conversational) शैली में लिखा गया है।
- भाषा का सौंदर्य: ठेठ ग्रामीण और खड़ी बोली का प्रयोग जिसने इसे अकादमिक शुष्कता से बचाकर जीवंत बना दिया है।
- प्रतीक योजना: 'कलकत्ता' यहाँ मात्र एक भौगोलिक शहर नहीं, बल्कि पूंजीवादी शोषण और मज़दूरों के पलायन का एक क्रूर और लालची प्रतीक बन गया है।
वर्तनी और शाब्दिक विश्लेषण (Linguistic Breakdown)
भाषाई स्तर पर, त्रिलोचन ने अवधी और आंचलिक शब्दों का बेहद सधा हुआ प्रयोग किया है:
| शब्द (Word) | व्याकरणिक/मूल रूप (Root) | साहित्यिक अर्थ / विशेष टिप्पणी |
|---|---|---|
| अच्छर | अक्षर (तत्सम) का तद्भव रूप | अक्षर / वर्ण (Letters) |
| चीन्हती | पहचानना (अवधी मूल) | पहचानती है / समझती है |
| न ट ख ट | ध्वन्यात्मकता | यह बाल स्वभाव का ध्वन्यात्मक अनुकरण (Onomatopoeia) है, जो शब्दों के बिखराव से चंचलता को उभारता है। |
| गौने | गौना (सांस्कृतिक शब्द) | विवाह के बाद लड़की की अंतिम विदाई (मुकलावा) |
| बजर गिरे | वज्र गिरना (मुहावरा) | नष्ट हो जाना / ग्रामीण परिवेश का सबसे कठोर श्राप |
समकालीन राजनीति और विस्थापन का विमर्श
एक ओर जहाँ अवतार सिंह संधू 'पाश' की 'युद्ध और शांति' जैसी कविताओं में सत्ता से सीधे लहूलुहान और वैचारिक टकराव का उग्र चित्रण है (अधिक पढ़ें: पाश कविता संग्रह), वहीं त्रिलोचन की 'चंपा' बिना कोई मार्क्सवादी नारा लगाए, महानगरीय शोषण का सबसे गहरा पर्दाफाश करती है।
यह ठीक वही महानगरीय क्रूरता है जिसे "खुद्दार मेरे शहर का फाकों से मर गया" में भी उकेरा गया है। जैसे 'आज सिंधु में ज्वार' और 'गोरा बादल' में ऐतिहासिक स्वाभिमान का ज्वार उमड़ता है, वैसे ही चंपा का यह कहना कि "कलकत्ते पर बजर गिरे", दरअसल एक आम शोषित भारतीय नारी का आधुनिक पूंजीवाद के खिलाफ पहला अचेतन और स्वाभिमानी विद्रोह है।
महत्वपूर्ण प्रामाणिक बाहरी स्रोत (Academic References)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. 'चंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती' कविता किस काव्य संग्रह से ली गई है?
यह कविता प्रगतिशील कवि त्रिलोचन शास्त्री के प्रसिद्ध काव्य संग्रह 'धरती' से उद्धृत है, जो 1945 में प्रकाशित हुई थी।
Q2. 'कलकत्ते पर बजर गिरे' कहकर चंपा क्या व्यक्त करना चाहती है?
कलकत्ता उस समय विस्थापन और पूंजीवादी शोषण का प्रतीक था जहाँ ग्रामीण मज़दूर अपनी आजीविका कमाने जाते थे। चंपा को डर था कि शादी के बाद कलकत्ता उसके पति को उससे दूर कर देगा। इसलिए, वह 'कलकत्ते पर बजर गिरे' कहकर उस व्यवस्था के नष्ट होने की कामना करती है जो परिवारों को तोड़ती है।