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मुश्किल थी संभलना ही पड़ा घर के वास्ते – पूरी कविता, अर्थ और हर लाइन का विश्लेषण

मुश्किल थी संभलना ही पड़ा घर के वास्ते – पूरी कविता, अर्थ और हर लाइन का विश्लेषण

अगर आपने कभी अपने सपनों को घर के लिए छोड़ा है, तो यह कविता आपको भीतर तक तोड़ देगी।

यह सिर्फ एक कविता नहीं है, यह हर उस ज़िम्मेदार इंसान की अधूरी कहानी है जिसने अपनी मजबूरियों का नाम 'शौक' रख दिया है। कभी-कभी ज़िंदगी में सबसे बड़ा त्याग वही होता है, जिसे कोई देखता भी नहीं। जब मैंने पहली बार ये पंक्तियाँ सुनीं, तो ये सिर्फ कविता नहीं लगी—ये जैसे मेरी ही कहानी किसी और की आवाज़ में सुनाई दे रही थी।

आधुनिक हिंदी कविता के उभरते सितारे स्वयं श्रीवास्तव (Swayam Shrivastava) की यह रचना [जिनकी अधिक रचनाओं के लिए आप उनके इन्स्टाग्राम: swayamsrivastava28 से जुड़ सकते हैं] इंटरनेट पर लाखों दिलों पर राज कर रही है। साहित्यशाला (Sahityashala) के इस विशेष लेख में, हम न केवल इसके बोल पढ़ेंगे, बल्कि इसके मनोवैज्ञानिक और साहित्यिक यथार्थ में भी उतरेंगे।


 


पूरी कविता (Full Lyrics: Mushkil Thi Sambhalna)

कांटे बना रहे हैं, कोई गुल बना रहे,
कुछ लोग कहीं काग को बुलबुल बना रहे।
तुम रास्तों को खाई में तब्दील कर रहे,
हम लोग उन्हीं खाइयों पे पुल बना रहे।

जिस रस्ते पे चल रहे उस पर हैं चल पड़े,
कुछ देर के लिए मेरे माथे पे बल पड़े।
हम सोचने लगे कि यार लौट चलें क्या,
फिर सोचा यार छोड़ो, चल पड़े तो चल पड़े।

मुश्किल थी, संभलना ही पड़ा घर के वास्ते,
फिर घर से निकलना ही पड़ा घर के वास्ते।
मजबूरियों का नाम हमने शौक रख दिया,
हर शौक बदलना ही पड़ा घर के वास्ते।

जो याद तेरे पांव की जंजीर बनी है,
वो याद मेरे हाथ की लकीर बनी है।
पानी जो उसी चांद पे ढूंढे नहीं मिला,
पानी पे उसी चांद की तस्वीर बनी है।

किस्मत में कोई रंग क्या धानी भी लिखा है...
...बस प्यास ही लिखी है के पानी भी लिखा है।

रोने पे आएगी तो ये हर बात रोएगी,
डोली लुटी है आज ये बारात रोएगी।
हां इश्क मेरा आज से तेरा तो हुआ पर,
हर बार तुम्हें देख के खैरात रोएगी।

आंखों से मेरे नींद की आहट चली गई,
वो घर से गया घर की सजावट चली गई।
इतनी हुई खता के लब को लब से छू लिया,
इन शहद से होंठों की तरावट चली गई।

हालात बदलने से ये दस्तूर हो गए,
सजाए थे जितने ख्वाब चकनाचूर हो गए।
तेरा भी किसी बांह के घेरे में घर हुआ,
हम भी किसी की मांग का सिंदूर हो गए।
Swayam Shrivastava Hindi Poem symbolic art breakdown showing path of middle class struggle from thorns to single lit home, lost love with weeping figures and broken moon reflection

कवि स्वयं श्रीवास्तव की कविता का भावनात्मक यथार्थ: कांटों से घर तक का संघर्ष, और एक खोया हुआ इश्क़।

प्रतीकों का विश्लेषण (Symbolism & Deep Meaning)

यह कविता केवल मध्यवर्गीय संघर्ष को दिखाती नहीं है, बल्कि उसे वैध ठहराती है, और इसी प्रक्रिया में उसे एक हृदयविदारक त्रासदी में बदल देती है। स्वयं ने जो बिंब और प्रतीक गढ़े हैं, वे बेजोड़ हैं:

  • 🔗 जंजीर बनाम लकीर:
    "जो याद तेरे पांव की जंजीर बनी है, वो याद मेरे हाथ की लकीर बनी है।"
    यहाँ 'जंजीर' उस भावनात्मक बंधन (Emotional Bondage) का प्रतीक है जो महबूब के लिए बोझ बन गया, लेकिन आशिक़ के लिए वह 'लकीर' यानी पूर्वनिर्धारित नियति (Predetermined Fate) बन गई। यह नियति का वह क्रूर खेल है जिसे हम हर्ष नाथ झा की कविता 'लकीरें' में भी समाज और किस्मत के यथार्थ के रूप में देखते हैं।
  • 🌙 चाँद का पानी:
    "पानी जो उसी चांद पे ढूंढे नहीं मिला, पानी पे उसी चांद की तस्वीर बनी है।"
    यह पूर्णता के भ्रम (Illusion of Fulfillment) को दर्शाता है। जो चीज़ वास्तविकता (चाँद) में नहीं है, इंसान उसे अपने आंसुओं और ख्यालों (पानी) में तलाश लेता है। यह सूफ़ियाना तड़प हमें सूफ़ी कलाम 'दमा दम मस्त कलंदर' के रूहानी दर्द की याद दिलाती है।
  • 🌉 पुल बनाम खाई:
    यह प्रतिरोध बनाम विनाश (Resistance vs Destruction) का सीधा आख्यान है। समाज नफरत की खाइयाँ खोद रहा है, लेकिन कवि प्रेम का पुल बना रहा है। यह तेवर सीधे तौर पर Faiz Ahmed Faiz की क्रांतिकारी शायरी से मेल खाता है जहाँ उम्मीद कभी नहीं मरती।

मजबूरियों का नाम 'शौक': एक सामाजिक यथार्थ

"मजबूरियों का नाम हमने शौक रख दिया..." समाज के दिखावे और पाखंड पर यह करारा प्रहार है। यह बिल्कुल वैसा ही मुखौटा है जिसका पर्दाफ़ाश ज्ञानेन्द्रपति की 'चोर का गमछा' में आधुनिकता के नाम पर किया गया है। और जब अंततः हालात बदलने से प्रेमी किसी और का 'सिंदूर' हो जाता है, तो जो अकेलापन बचता है, वह ज्ञानेन्द्रपति की 'बनानी बनर्जी' या नज़्म 'जुगनू को फ़क़ीर की दुआ लगी' की तरह सीधे रूह को छलनी करता है।

Live Performance: Swayam Shrivastava

'जश्न-ए-ज़बान' मुशायरे में इस मर्मस्पर्शी कविता का जीवंत पाठ:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. "मुश्किल थी संभलना ही पड़ा घर के वास्ते" कविता के कवि कौन हैं?

इस मर्मस्पर्शी कविता की रचना युवा कवि स्वयं श्रीवास्तव (Swayam Shrivastava) ने की है, जो युवाओं के संघर्ष और प्रेम की जटिलताओं को मंच पर प्रस्तुत करने के लिए विख्यात हैं।

2. "मजबूरियों का नाम हमने शौक रख दिया" का वास्तविक अर्थ क्या है?

इस पंक्ति का दार्शनिक अर्थ यह है कि जब एक इंसान पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बोझ तले अपने असली सपनों को मार देता है, तो दुनिया से अपना दर्द छिपाने और अपनी हार को सम्मानजनक दिखाने के लिए, वह अपनी उन 'मजबूरियों' को ही अपनी पसंद या 'शौक' घोषित कर देता है।

3. यह कविता किस काव्य शैली में लिखी गई है?

यह रचना आधुनिक मुक्तक और ग़ज़ल के शेरों का एक सम्मिश्रण है, जिसे कवि सम्मेलनों और मुशायरों (जैसे Jashn e Zabaan) में तरन्नुम या भावपूर्ण पाठ के साथ पढ़ा जाता है।

साहित्यशाला (Sahityashala) की एक विशेष प्रस्तुति —

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