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लकीरें - हर्ष नाथ झा | नियति, गरीबी और जातिवाद पर मार्मिक हिंदी कविता

लकीरें - हर्ष नाथ झा | नियति और भेदभाव पर एक मार्मिक कविता

क्या कभी आपने सोचा है कि इन हाथ की लकीरों में वाकई हमारी किस्मत कैद है? या फिर यह समाज द्वारा गढ़ा गया एक निर्मम और कड़वा झूठ है?

आज साहित्यशाला के इस मंच पर, हम आपके लिए लेकर आए हैं कवि हर्ष नाथ झा की एक बेहद मार्मिक और दिल को झकझोर देने वाली रचना— "लकीरें"। यह कविता केवल शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि समाज में गहरे पैठे भेदभाव, जातिवाद और गरीबी पर एक सीधा, तीखा प्रहार है। एक नन्हा नायक, जो शिक्षा की पुकार लगाता है, लेकिन समाज की सड़ी-गली मान्यताएँ उसके सपनों को जन्म लेने से पहले ही कुचल देना चाहती हैं।

जैसे भगवान राम का संघर्ष जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई को दर्शाता है, और महाभारत की कविताएँ धर्म और अधर्म के बीच के युद्ध को बयां करती हैं, वैसे ही इस कविता का मासूम नायक अपने अस्तित्व और समाज की मानसिकता से लड़ रहा है। उसकी पुकार हमें आधुनिक शिक्षा और ज्ञानार्जन (Knowledge and Education) के असली महत्व को समझने पर विवश करती है।

[हाथ की लकीरों में किस्मत और समाज की सच्चाई: एक मंदिर में नन्हे नायक के साथ भेदभाव को दर्शाती एक मार्मिक तस्वीर]


लकीरें

- हर्ष नाथ झा

कहते है की लिखता है खुदा नियति इन हाथों में क्या-क्या कैसे होयेगा ? सुबह, शाम और रातों में किसको कितना पैसा होगा ? किसकी गाड़ी आएगी ? किसका नाम जहां में होगा ? किसकी बारी आएगी ? किसको कितनी ख़ुशी मिलेगी ? कौन अर्श पे जायेगा ? किसको आज मौत मिलेगी ? कोई फर्श पे आएगा ? सबने मुझको आज कहा इन हाथों में राज़ सजे हैं जाके उनको पता लगाओ कितने राह में कांटे बचे है तो मैं उठ के आज गया इन फटी हथेली को जानूंगा सच है ये बातें या फ़र्ज़ी देखूंगा मैं, फिर मानूंगा | जैसे पहुंचा मैं मंदिर लकीरों का व्यापार लगा था सौ, दो-सौ में सब जानो किस्मत का बाजार लगा था | जैसे पंहुचा और जा बैठा "सौ की दो पत्ती पकड़ाओ" जैसे दे दी मैंने पत्ती "बेटा अपना नाम बताओ" नाम बताया मैंने तो उसका चेहरा जा लटक गया जैसे अपनी जाति बताई कुछ तो हलक में अटक गया | थी नफरत शक्ल से झलक रही पर नज़रो को जा मोड़ दिया कुछ सवाल मुझे और भी पूछे रूपए ने "धर्म" को तोल लिया पर उसको इस चीज़ का बदला कैसे भी, लेना ही था इस गुस्ताखी का उसको उत्तर अब जाके देना ही था हथेली को पल भर में पढ़के उसने अपना मुँह खोला घिन थी अब भी उन नज़रों में उसने मेरा सच बोला "तेरा बाबा क्या करता है?" "मज़दूर हैं, दिन भर खटते हैं साफ़ सफाई पोछा बरतन जो बोलो सब करते हैं " "छी-छी तुम सब ऐसे ही हो सब गलीच और गंध ही है आखिर क्या ही कर सकते हो सबकी बुद्धि मंद ही है कीचड़ में तुम पैदा होते कीचड़ में मर जाओगे जिस बस्ती में तुम हो रहते वही खड़े सड़ जाओगे तेरा हश्र भी बाप-सा होगा कुछ न तू कर पायेगा" "पर मुझको तो पढ़ना ही है " "तुझ जैसा ---पढ़ पायेगा ? कूड़ा करकट साफ़ करोगे हाथ में तेरे यही लिखा नाली में मरते है, तुमसे मंदिर में न शक्ल दिखा " रोते-रोते मैं बस भागा खुद का सच जो जाना था मेरे लिए उस खुदा ने भी क्या सोचा क्या ठाना था इन फटी हथेली ने मुझपर ये कैसा क़र्ज़ चढ़ाया है सबकी अलग लकीरें है सबको अलग बनाया है।

कवि परिचय: हर्ष नाथ झा (About Me)

हर्ष नाथ झा एक संवेदनशील रचनाकार हैं, जो अपनी कविताओं के माध्यम से समाज के उन हिस्सों को छूते हैं जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। उनकी लेखनी में दर्द, संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं का एक अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यदि आप भावनाओं के उफान को करीब से महसूस करना चाहते हैं, तो आप हर्ष नाथ झा की दर्द भरी कविताएँ (Sad Poems) भी पढ़ सकते हैं।

कवि केवल समाज के कड़वे सच ही नहीं लिखते, बल्कि मानवीय रिश्तों की मिठास को भी बहुत ही खूबसूरती से उकेरते हैं। एक पिता और पुत्री के असीम प्रेम को दर्शाती उनकी कविता 'बिंदी' (Bindi) और हिंदी भाषा के व्याकरणिक सौंदर्य पर रचित 'संयुक्ताक्षर' इसका जीता-जागता प्रमाण हैं।

हिंदी साहित्य और कविता के विस्तृत परिदृश्य और धरोहर को प्रमाणित रूप से पढ़ने और समझने के लिए आप कविता कोश (Kavita Kosh) जैसी प्रतिष्ठित एवं प्रामाणिक वेबसाइट का भी संदर्भ ले सकते हैं।

इस मार्मिक रचना के शब्द केवल दिल को नहीं छूते, बल्कि हमें सोचने पर विवश कर देते हैं। आइए, हम सब मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहाँ जन्म नहीं, बल्कि कर्म और क्षमता से किसी का भविष्य तय हो। ऐसी और भी गहन और विचारोत्तेजक रचनाओं के लिए साहित्यशाला से जुड़े रहें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. "लकीरें" कविता का मुख्य विषय क्या है?

यह कविता मुख्य रूप से समाज में व्याप्त जातिवाद, गरीबी और अंधविश्वास पर केंद्रित है। यह दर्शाती है कि कैसे समाज एक बच्चे की क्षमता को उसके जन्म और हाथों की लकीरों से आंकता है।

2. इस मार्मिक कविता के रचयिता कौन हैं?

इस हृदयस्पर्शी कविता की रचना हर्ष नाथ झा ने की है, जो साहित्यशाला के मंच पर अपनी संवेदनशील लेखनी के लिए जाने जाते हैं।

3. "फटी हथेली" शब्द का कविता में क्या तात्पर्य है?

"फटी हथेली" अत्यधिक कठोर परिश्रम, मज़दूरी और गरीबी का प्रतीक है, जो यह दर्शाती है कि मेहनत करने वाले हाथों को सम्मान की जगह समाज में तिरस्कार मिलता है।

इस कविता से जुड़ा एक विशेष वीडियो यहाँ देखें:

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