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सूर्य की विवशता: कर्ण और नियति पर नई हिंदी कविता | Harsh Nath Jha

महाभारत पर हिंदी कविता: विवशता | कर्ण और सूर्य की व्यथा

रचयिता: हर्ष नाथ झा | श्रेणी: महाभारत कविता कोश



कविता का सार (Introduction)

महाभारत का युद्ध केवल शस्त्रों का युद्ध नहीं था, यह भावनाओं और कर्तव्यों के बीच का संघर्ष था। मेरी यह कविता, 'विवशता', कुरुक्षेत्र की उस शाम का चित्रण है जब वीर कर्ण (Karna) का वध हुआ। यह कविता कर्ण की मृत्यु पर उनके पिता, भगवान सूर्य (Sun God) की मनोदशा और उनकी 'विवशता' को दर्शाती है। एक पिता जिसके पास समस्त ब्रह्मांड को जलाने की शक्ति है, वह अपने पुत्र को निहत्था मरते देखने के लिए विवश है।


।। विवशता ।।

पूरे जगत का दिनकर है जो
उस दिन तो रोया होगा
जिस दिन वीर कर्ण को
पिता ने जब खोया होगा |

हर किरण अश्रु-सा शीतल होगा
सातों अश्व सकुचाएँ होंगे
मौन रहकर भी स्वयं रवि
मन में अवश्य चिल्लाये होंगे |

कहा गया हर बार कुलहीन
ज्वाला तो धधक उठी होगी न ?
हर शाप जो पुत्र को सहना पड़ा
क्रोधाग्नि भड़क उठी होगी न ?

चण्डांशु ने सोचा होगा
हयों को पल भर मोड़ दूँ मैं
इस वीभत्स कर्त्तव्य को
पुत्रवश ही छोड़ दूँ मैं |

अर्जुन के गांडीव को
अपनी शक्ति से तोड़ दूँ मैं
चाहा होगा हर जीव को
मरते हुए ही छोड़ दूँ मैं |

जानते हुए सब मौन रहे
कितने वीर, महान हो तुम
देवों के तुम शिरोमणि
कितने बड़े विद्वान् हो तुम |

पाण्डु पुत्र की लाज बचाने
कुछ पल अधिक जले थे तुम
बात आई जब निज-पुत्र पर
क्यों न जल्दी ढले थे तुम ?

शिष्य को अरि-रथ पर देखा
उसी पल उसको टोक देते
प्राणदान-सा दान माँगा जब
उस पाखंड को रोक देते |

वक्ष फाड़ जब दान दिया था,
एक अश्रु तो आया होगा
उस पिता ने तब ख़ुद को
निहत्था जब पाया होगा |

बदले में कुछ दिव्यास्त्र तुम
सुत को तो दे ही सकते थे
महाकाल से उसके प्राणों की
भीख तो ले ही सकते थे |

हर अपमान देख कर्ण का
रक्त तो अवश्य खौला होगा
मन में दिनकर ने कुरुक्षेत्र को
शस्त्रों से तौला होगा |

रोता-बिलखता एक पिता
कुछ ज़रूर बोला होगा
मन में दिनकर ने कुरुक्षेत्र को
लाशों से तौला होगा |

जिन क्षण धर गिरा कर्ण का
ख़ुद को धिक्कारा होगा न
निज-कष्ट ने कर्तव्यों को
उस क्षण ललकारा होगा न

शस्त्रों को उठाया होगा
रक्त तो तब खौला था न
कुरुक्षेत्र के उस प्रांगण को
लाशों से तौला था न |

महापुरुष, बलिदानी था वो
उसका हर प्रण धरा में लीन था
कैसा तेजस्वी सूर्यांश था
कि सूर्य भी तब तेज-क्षीण था

इतना बड़ा दानी था वो
कि देवेश स्वयं तब दीन था
कैसा तेजस्वी सूर्यांश था
कि सूर्य भी तब तेज-क्षीण था |


- हर्ष नाथ झा


कविता का भावार्थ और विश्लेषण (Poem Summary)

यह कविता महाभारत के सबसे मार्मिक पात्र, सूर्यपुत्र कर्ण (Surya Putra Karna) और उनके पिता सूर्य की मूक वेदना का वर्णन करती है। कवि (हर्ष नाथ झा) ने यहाँ पिता की विवशता को केंद्र में रखा है।

1. पिता की विवशता (The Helplessness of a Father)

जब महाभारत के युद्ध में कर्ण का वध हो रहा था, तब सूर्य देव सब देख रहे थे। उनके पास इतनी शक्ति थी कि वे अर्जुन के गांडीव को तोड़ सकते थे या समय (Time) को रोक सकते थे, किन्तु वे 'कर्तव्य' से बंधे थे। यह ठीक वैसे ही है जैसे भीष्म पितामह अपनी प्रतिज्ञा से बंधे थे।

2. कवच और कुंडल का दान (The Ultimate Sacrifice)

कविता में उस क्षण का भी ज़िक्र है जब इंद्र ने छल से कर्ण के कवच-कुंडल मांग लिए थे। कवि प्रश्न करते हैं कि जब कर्ण अपना वक्ष फाड़कर दान दे रहा था, तब सूर्य देव ने उस 'पाखंड' को क्यों नहीं रोका? कर्ण की यह दानवीरता उसे दुर्योधन जैसे मित्रों से भी ऊपर उठा देती है।

3. सूर्यांश का तेज (The Glory of Karna)

अंतिम पंक्तियों में कर्ण को 'सूर्यांश' कहा गया है। कर्ण का तेज इतना अधिक था कि उसकी मृत्यु के समय स्वयं सूर्य (Sun) भी 'तेज-क्षीण' (Dim) महसूस कर रहे थे। यह कविता केवल युद्ध का वर्णन नहीं है, यह एक पिता और पुत्र के बीच के मौन संवाद की गाथा है।


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