हिंदी साहित्य में बाबा नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री') एक ऐसे हस्ताक्षर हैं, जिनका व्यक्तित्व कबीर की फक्कड़ता और 'निराला' के विद्रोही तेवर का अद्भुत संगम है। उनकी कविताओं में जहाँ एक ओर 'खिचड़ी विप्लव देखा हमने' जैसा जन-आक्रोश दिखता है, वहीं दूसरी ओर एक गहरी दार्शनिक दृष्टि भी मिलती है।
नागार्जुन को समग्रता में समझने के लिए उनका विस्तृत जीवन परिचय (Biography) जानना आवश्यक है, जिससे यह पता चलता है कि कैसे एक घुमक्कड़ 'यात्री' जनकवि बना। आज हम उनकी 23 जनवरी 1985 को रचित कविता 'सबके लेखे सदा सुलभ' का पाठ और विश्लेषण करेंगे। यह कविता ईश्वर की सर्वव्यापकता और उसके विरोधाभास (Paradox) को रेखांकित करती है।
।। मूल कविता ।।
सबके लेखे सदा सुलभ
गाल-गाल पर
दस-दस चुम्बन
देह-देह को दो आलिंगन
आदि सृष्टि का चंचल शिशु मैं
त्रिभुवन का मैं परम पितामह
व्यक्ति-व्यक्ति का निर्माता मैं
ऋचा-ऋचा का उद्गाता मैं
कहाँ नहीं हूँ, कौन नहीं हूँ
अजी यही हूँ, अजी वहीं हूँ
जहाँ चाहिए वहाँ मिलूँगा
स्थापित कर लो, नहीं हिलूँगा
उच्छृंखलता पर अनुशासन
दया-धरम पर मैं हूँ राशन
सबके लेखे सदा-सुलभ मैं
अति दुर्लभ मैं, अति दुर्लभ मैं
महाकाल भी निगल न पाए
वामन हूँ मैं, मैं विराट हूँ
मैं विराट हूँ, मैं वामन हूँ
भावार्थ और विश्लेषण (Detailed Analysis)
1. विराट और वामन का विरोधाभास
नागार्जुन इस कविता में 'विराट सत्ता' (Supreme Consciousness) के रूप में स्वयं को स्थापित करते हैं। वे कहते हैं—"मैं विराट हूँ, मैं वामन हूँ"। यह भारतीय दर्शन का मूल है कि ईश्वर अणु (Atom) में भी है और ब्रह्मांड में भी। यह चिंतन उनकी मैथिली कविता 'बूढ़ा वर' की सामाजिक चेतना से बिल्कुल भिन्न, एक आध्यात्मिक धरातल पर है।
2. सर्वव्यापकता और बाल-सुलभ चंचलता
कविता की शुरुआती पंक्तियाँ—"आदि सृष्टि का चंचल शिशु मैं"—ईश्वर को एक खेलते हुए बालक के रूप में देखती हैं। यह छवि हमें उनकी प्रसिद्ध कविता 'सिन्दूर तिलकित भाल' की याद दिलाती है, जहाँ कवि अपनी निजी अनुभूतियों और गृहस्थ जीवन की स्मृतियों में खो जाते हैं। लेकिन यहाँ 'शिशु' कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि सृष्टि का रचयिता है जो लीला कर रहा है।
3. राजनीतिक व्यंग्य और 'राशन'
नागार्जुन बिना व्यंग्य के पूरे नहीं होते। पंक्ति "दया-धरम पर मैं हूँ राशन" अत्यंत मारक है। जिस तरह राशन की दुकान पर सामान नपा-तुला मिलता है, उसी तरह आज के कलयुग में दया और धर्म भी सीमित हो गया है।
यह वही विद्रोही स्वर है जो उनकी अन्य कविताओं में गूंजता है। उदाहरण के लिए, जब वे भ्रष्ट व्यवस्था को ललकारते हैं: "कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर", या जब वे महारानी एलिजाबेथ के भारत आगमन पर तीखा प्रहार करते हैं (एलिजाबेथ कविता)। नागार्जुन का ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्थाओं के भीतर भी झाँकता है।
4. 'सुलभ' और 'दुर्लभ' का अंतर्द्वंद्व
शीर्षक "सबके लेखे सदा सुलभ" एक छलावा-सा प्रतीत होता है। ईश्वर कहता है कि मैं सबके लिए सुलभ (Easy to access) हूँ, लेकिन अगली ही पंक्ति में कवि कहते हैं "अति दुर्लभ मैं"। यह कबीर के उस दर्शन जैसा है कि ईश्वर पास होकर भी दूर है—"ज्यों तिल मांहि तेल है"।
नागार्जुन का यह विद्रोही और दार्शनिक अंदाज पाकिस्तानी शायर हबीब जालिब की याद दिलाता है। जैसे जालिब ने अपनी नज़्म 'दस्तूर (मैं नहीं मानता)' में सत्ता के अहंकार को नकारा था, वैसे ही नागार्जुन यहाँ 'महाकाल' और 'अनुशासन' की बात करते हुए एक सर्वोच्च सत्ता की स्थापना करते हैं जो किसी सांसारिक राजा के अधीन नहीं है।
निष्कर्ष
यह कविता 1985 में लिखी गई थी, जो उनके जीवन का उत्तरार्ध था। इस समय तक उनकी कविताएँ अधिक दार्शनिक हो गई थीं। यदि आप उनके जीवन के इस पड़ाव को और गहराई से समझना चाहते हैं, तो 1986 में लहरियासराय में दिया गया उनका साक्षात्कार ज़रूर पढ़ें, जहाँ उन्होंने अपनी काव्य-यात्रा पर विस्तार से चर्चा की है।
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