भारतीय साहित्य में बाबा नागार्जुन एक ऐसा नाम है जो जनकवि होने के साथ-साथ विद्रोह के स्वर भी हैं। हिंदी में वे 'नागार्जुन' हैं, तो अपनी मातृभाषा मैथिली में वे 'यात्री' हैं। आज हम उनकी एक दुर्लभ और मार्मिक मैथिली रचना "भारत माता" का पाठ और विश्लेषण करेंगे।
यह कविता केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि एक आहत पुत्र का अपनी माँ (राष्ट्र) से संवाद है। यदि आपने उनकी हिंदी कविता ‘सिन्दूर तिलकित भाल’ पढ़ी है, तो आप जानते होंगे कि यात्री जी की संवेदनाएँ कितनी गहरी होती हैं। आइए, बाबा नागार्जुन की जीवनी और जीवन दर्शन के आलोक में इस कविता को समझें।
भारत माता
कियै टूटल जननि! धैर्यक सेतु?
कानि रहलहुँ अछि, अरे! की हेतु?
अहा! जागल आइ कटु-स्मृति कोन?
जाहिसँ भै गेल व्याकुल मोन?
विश्वभरिमे विदित नाम अहाँक!
कान्तियो नयनाभिराम अहाँक!
केहन उज्ज्वल मा! अहाँक अतीत
भेलहुँ अछि पुनि कोन भयसँ भीत?
जलधि-वसने! हिम-किरीटिनि देवि!
तव चरण-पंकज युगलकेँ सेवि,
लोक कहबै अछि अरे! तिहुँ लोक!
अहीं केँ चिन्ता, अहीकेँ शोक!!
कहू जननी कियै नोर बहैछ
छाड़ि रहलहुँ अछि कियै निःश्वास?
कोन आकस्मिक विषादक हेतु
भै रहल अछि मूँह एहन उदास?
काव्य विश्लेषण और भावार्थ
बाबा नागार्जुन की यह कविता केवल भक्तिभाव नहीं, बल्कि एक प्रश्नचिह्न है। कवि भारत माता को रोते हुए देखता है और विचलित हो उठता है। मैथिली साहित्य में यह रचना 'यात्री' जी के कोमल और संवेदनशील हृदय का परिचायक है।
1. कविता में भारत माता की कल्पना
हिंदी छायावाद की तरह यहाँ भारत माता केवल एक मानचित्र नहीं, बल्कि एक जीवित 'जननी' हैं। कवि उन्हें 'जलधि-वसने' (समुद्र रूपी वस्त्र धारण करने वाली) और 'हिम-किरीटिनि' (हिमालय का मुकुट पहनने वाली) कहकर संबोधित करते हैं। लेकिन यह अलंकृत रूप उनके 'उदास' चेहरे के विरोधाभास में खड़ा है। कवि पूछते हैं—"कियै टूटल जननि! धैर्यक सेतु?" अर्थात, माँ तुम्हारा धैर्य क्यों टूट गया? यह ठीक वैसा ही द्वंद्व है जैसा रमाशंकर यादव 'विद्रोही' अपनी कविताओं में धर्म और समाज के बीच दिखाते हैं।
2. ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि
नागार्जुन जनवादी कवि थे। यह कविता संभवतः उस कालखंड की ओर इशारा करती है जब भारत पराधीनता की बेड़ियों में था या स्वतंत्रता के तुरंत बाद के मोहभंग (Disillusionment) के दौर में। जिस तरह उन्होंने अपनी हिंदी कविता ‘खिचड़ी विप्लव देखा हमने’ में सामाजिक उथल-पुथल का चित्रण किया है, यहाँ वे उसी उथल-पुथल के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को भारत माता के आँसुओं के माध्यम से देख रहे हैं। "जागल आइ कटु-स्मृति कोन?" पंक्ति स्पष्ट करती है कि इतिहास का कोई ऐसा घाव है जो आज फिर हरा हो गया है।
3. भाषा और शिल्प (मैथिली का सौंदर्य)
यात्री जी की मैथिली तत्सम प्रधान होते हुए भी अत्यंत मधुर है। 'चरण-पंकज', 'नयनाभिराम' और 'विषाद' जैसे शब्द कविता को एक शास्त्रीय गरिमा देते हैं। उनकी शैली में प्रश्न शैली (Interrogative Style) की प्रधानता है, जो पाठक को सीधे संवाद से जोड़ती है। यह शैली उनकी सामाजिक व्यंग्य रचना ‘बूढ़ा वर’ से भिन्न है, जहाँ वे तीखा प्रहार करते हैं; यहाँ वे विनम्र और चिंतित पुत्र हैं।
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📺 बाबा नागार्जुन: व्यक्तित्व और कृतित्व
इस वीडियो में आप बाबा नागार्जुन की काव्य यात्रा और उनके विद्रोही तेवर को और करीब से समझ सकते हैं:
- बाबा नागार्जुन का प्रारंभिक जीवन और संघर्ष।
- मैथिली (यात्री) और हिंदी (नागार्जुन) लेखन में अंतर।
- जनकवि के रूप में उनकी स्वीकार्यता।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'भारत माता' कविता में कवि क्यों दुखी है?
कवि भारत माता की उदास छवि और उनकी आँखों में आँसू देखकर व्यथित हैं। वे जानना चाहते हैं कि किस 'कटु-स्मृति' (कड़वी याद) ने माँ को इतना व्याकुल कर दिया है।
2. नागार्जुन को 'यात्री' उपनाम क्यों मिला?
उनका स्वभाव घुमक्कड़ था और उन्होंने श्रीलंका तक की यात्रा की थी। इसी यायावरी (घुमक्कड़ी) स्वभाव के कारण मैथिली साहित्य में उन्हें 'यात्री' कहा गया।
3. What is the main theme of the Maithili poem "Bharat Mata"?
The poem revolves around the personification of India (Bharat Mata) as a grieving mother. The poet (Yatri/Nagarjun) questions the cause of her sorrow and reflects on the contrast between her glorious past and her present distress.
यह लेख साहित्यशाला की शोध टीम द्वारा प्रामाणिक साहित्यिक स्रोतों और बाबा नागार्जुन की मूल कृतियों के आधार पर तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य मैथिली साहित्य की दुर्लभ रचनाओं को डिजिटल पटल पर सुरक्षित रखना है।
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