हिंदी साहित्य में प्रकृति का स्थान सदैव सर्वोच्च रहा है। जहाँ एक ओर हम गणतंत्र दिवस पर वीर रस की कविताएँ पढ़ते हैं, वहीं दूसरी ओर छायावाद (Chhayavad) हमें प्रकृति की कोमलता से जोड़ता है।
आज हम महादेवी वर्मा की प्रसिद्ध रचना 'अधिकार' (वे मुस्काते फूल, नहीं...) का विश्लेषण करेंगे। यह कविता केवल फूलों का वर्णन नहीं है, बल्कि जीवन के दर्शन को समझाती है। जिस तरह धरती और मनुष्य का संबंध अटूट है, वैसे ही फूल और उसके मुरझाने का संबंध भी अपरिहार्य है।
अधिकार (Adhikar)
Nature Poems In Hindi | महादेवी वर्मा
वे मुस्काते फूल, नहीं
जिनको आता है मुर्झाना,
वे तारों के दीप, नहीं
जिनको भाता है बुझ जाना;
वे नीलम के मेघ, नहीं
जिनको है घुल जाने की चाह
वह अनन्त रितुराज, नहीं
जिसने देखी जाने की राह;
वे सूने से नयन, नहीं
जिनमें बनते आँसू मोती,
वह प्राणों की सेज, नही
जिसमें बेसुध पीड़ा सोती;
ऐसा तेरा लोक, वेदना
नहीं, नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं, नहीं
जिसने जाना मिटने का स्वाद!
क्या अमरों का लोक मिलेगा
तेरी करुणा का उपहार?
रहने दो हे देव! अरे
यह मेरा मिटने का अधिकार!
कविता का भावार्थ (Critical Analysis)
इस कविता में कवयित्री ने अमरता (Immortality) की तुलना में 'मिटने के अधिकार' (Mortality) को श्रेष्ठ बताया है। यह विचार हमें माखनलाल चतुर्वेदी की कविता पुष्प की अभिलाषा (Pushp Ki Abhilasha) की याद दिलाता है, जहाँ फूल का उद्देश्य नश्वर होकर भी महान बनना है।
महादेवी वर्मा कहती हैं कि जिस लोक में पीड़ा और अंत नहीं है, वहां जीवन का वास्तविक आनंद भी नहीं है। यह जीवन चक्र वैसा ही है जैसा हरिवंश राय बच्चन ने नीड़ का निर्माण (Neer Ka Nirman) में वर्णित किया है—विनाश के बाद ही निर्माण का सुख है।
यदि आप प्रकृति के अन्य रूपों को समझना चाहते हैं, तो हमारी Hindi Nature Poems (प्रकृति पर कविता) की श्रंखला अवश्य पढ़ें। साथ ही, विभिन्न विषयों पर सर्वश्रेष्ठ हिंदी कविताओं (Hindi Poem) का संग्रह भी देखें।