संपादकीय: साहित्यशाला के प्रांगण में आज हम स्वागत करते हैं नवोदित लेखिका श्रिया राजपूत का। उनकी यह रचना—"धरती की ममता, मानवीय लालच और अस्तित्व बचाने का मध्यम मार्ग"—एक विचारशील हिंदी निबंध है। इसमें उन्होंने प्रकृति पर कविताओं की कोमलता को भूगोल के सिद्धांतों के साथ पिरोया है।
'मध्यम मार्ग': प्रकृति संरक्षण और मानवीय विकास का संतुलन।
धरती : ममता, मनुष्य और मध्यमार्ग
जीवन का स्रोत, आश्रय और सुरक्षा, सौंदर्य और शांति, अनंत संसाधन प्रदान करने वाली— वही धरती हमारी माँ है। उसकी गोद की छाया में हर जीव सुरक्षित रहता है। वह केवल देती है, हमसे कुछ नहीं लेती— यही तो माँ की सच्ची ममता है।
पर हम उसकी ममता को समझ नहीं पाए। ये पेड़-पौधे, पहाड़ और फूल उसकी लाड़-दुलार हैं, वन, बाग़ और झाड़ियाँ उसका मोह और प्यार हैं। तुम भी इन वादियों से प्यार करो, क्योंकि जिस माँ की ममता अपार है, वही धरती हमारा संसार है।
ममता की गोद में सिमटा यह संसार
हमसे बस इतना कहता है..."
हमारी माँ हमसे कुछ नहीं माँगती, पर जितना प्यार वह हमें देती है, उतना ही दुःख हम उसे पहुँचा रहे हैं। एक माँ सब कुछ सह सकती है, पर अपने बच्चों पर हो रहे अत्याचार को नहीं।
तभी माँ का क्रोध चेतावनी बनकर सामने आता है। जब पेड़ और वन काटे जाते हैं, तो वर्षा रुक जाती है, धरती सूखने लगती है। जब नदियों और हवाओं को प्रदूषित किया जाता है, तो वही प्रकृति आँधी-तूफ़ान, बाढ़ और सुनामी बनकर सब कुछ तहस-नहस कर देती है।
धरती की ममता और मनुष्य का लोभ।
जिन जीवों की हत्या कर तुम अपने स्वार्थ के लिए उन्हें खाते हो, वही प्रकृति कोरोना जैसी महामारी बनकर तुम्हारे सामने आ खड़ी होती है।
एक समय था जब हम पत्तों से घर बनाकर रहते थे, जब आग की खोज भी नहीं हुई थी, तब प्रकृति कितनी सुरक्षित थी। तकनीक के अभाव में प्रकृति हम पर हावी थी— इसे पर्यावरण निर्धार्यवाद कहा गया。
मैं यह नहीं कहती कि आज तकनीक होने से हम पृथ्वी पर हावी हो गए हैं— यह संभववाद (Possibilism) होगा। और न ही यह कहती हूँ कि धरती के संसाधनों का उपयोग बंद कर दिया जाए।
पर उपयोग सीमा में होना चाहिए।
प्रकृति सीमाएँ तय करती है— जलवायु, जल और संसाधनों की। मनुष्य उन सीमाओं के भीतर अपने विकल्प चुनता है। एक प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता ने इसी संतुलन को मध्यम मार्ग सिद्धांत कहा।
यह सिद्धांत बताता है कि मानव विकास न पूरी तरह प्रकृति के हाथ में है, न पूरी तरह मनुष्य के। विकास होता है दोनों के संतुलन से। इसलिए हमें मध्यम मार्ग चुनना चाहिए।
ऐ इंसान, माँ की ममता को पहचानो— क्योंकि धरती ही हमारी सच्ची माँ है।
रचना विश्लेषण: ममता से मध्यमार्ग तक
श्रिया जी का यह निबंध एक यात्रा की तरह है। यह यात्रा 'ममता' से शुरू होती है, जहाँ धरती पुष्प की अभिलाषा की तरह निस्वार्थ प्रेम लुटाती है। लेकिन जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, मानवीय लालच इस ममता को चुनौती देता है।
निबंध का मध्य भाग हमें झकझोरता है—यह याद दिलाता है कि कच्चा घड़ा पकने के लिए ताप सहता है, लेकिन टूटने के लिए नहीं। जब हम प्रकृति की सहनशक्ति की परीक्षा लेते हैं, तो वह क्रूर रूप भी धारण कर सकती है।
अंत में, 'मध्यम मार्ग' का सिद्धांत हमें शून्य पे सवार होने के अहंकार से बचाकर यथार्थ के धरातल पर लाता है। यह लेख हमें वृक्ष की पीड़ा और बूढ़े पेड़ के दुःख को समझने की दृष्टि देता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. इस लेख में 'मध्यम मार्ग' का क्या अर्थ है?
यहाँ मध्यम मार्ग का अर्थ प्रकृति के अंधाधुंध दोहन और आदिम जीवन के बीच का संतुलन है। यह सतत विकास (Sustainable Development) का दार्शनिक आधार है।
2. भारत सरकार पर्यावरण संतुलन के लिए क्या कर रही है?
भारत सरकार का MoEFCC मंत्रालय और नीति आयोग कई योजनाओं (जैसे सोलर मिशन, सिंगल यूज़ प्लास्टिक प्रतिबंध) के माध्यम से सतत विकास को बढ़ावा दे रहे हैं।