काश! मैं वृक्ष होता - Kaash! Mai Vriksh Hota | रुदन करता पेड़ - Rudan Karta Ped
काश! मैं वृक्ष होता
रंग-बिरंगे पुष्प खिलाता
मनभावन खुशबू फैलाता।
बिन मांगे ही फल देता
कुछ न अपने लिए बचाता।
परोपकार में होता दक्ष
काश! मैं बन जाऊँ वृक्ष।
प्रेम-सुधा बरसात सब पर
चाहे खग हो, चाहे चौपाया।
नव जीवन भर देती सब में
मेरी ठंडी, शीतल छाया।
करता न्याय होकर निष्पक्ष
काश! मैं बन जाऊँ वृक्ष।
रुदन करता पेड़
मैंने पेड़ को रोते देखा
उसका सब कुछ खोते देखा।
भुजा समान उसकी डाली को
सिसकी हर पत्ता भरता है
मुँह से आह! भी न करता है।
जड़ों से आँसू बहते हैं
दुख की कहानी कहते हैं।
अब तो छोड़ो हमें सताना
अब न मिलेगा मौसम सुहाना।
अपने बच्चों के लिए मैंने
मानव को दुख का बीज
बोते देखा।
हाँ! मैंने पेड़ को रोते देखा
डॉ. मुल्ला आदम अली
तिरुपति - आंध्र प्रदेश
प्रकृति सिर्फ देखने की चीज़ नहीं, महसूस करने की चीज़ है।
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