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'ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं': क्या यह दिनकर की कविता है? सच जानें

काश! मैं वृक्ष होता - Kaash..! Mai Vriksh Hota | रुदन करता पेड़ - Rudan Karta Ped

काश! मैं वृक्ष होता - Kaash! Mai Vriksh Hota | रुदन करता पेड़ - Rudan Karta Ped

काश! मैं वृक्ष होता


रंग-बिरंगे पुष्प खिलाता
मनभावन खुशबू फैलाता।

बिन मांगे ही फल देता
कुछ न अपने लिए बचाता।

परोपकार में होता दक्ष
काश! मैं बन जाऊँ वृक्ष।

प्रेम-सुधा बरसात सब पर
चाहे खग हो, चाहे चौपाया।

नव जीवन भर देती सब में
मेरी ठंडी, शीतल छाया।

करता न्याय होकर निष्पक्ष
काश! मैं बन जाऊँ वृक्ष।


काश.! मैं वृक्ष होता - Kaash..! Mai Vriksh Hota  रुदन करता पेड़ - Rudan Karta Ped

रुदन करता पेड़

मैंने पेड़ को रोते देखा
उसका सब कुछ खोते देखा।

भुजा समान उसकी डाली को
उससे अलग होते देखा।

सिसकी हर पत्ता भरता है
मुँह से आह! भी न करता है।

जड़ों से आँसू बहते हैं
दुख की कहानी कहते हैं।

अब तो छोड़ो हमें सताना
अब न मिलेगा मौसम सुहाना।

अपने बच्चों के लिए मैंने
मानव को दुख का बीज
बोते देखा।

हाँ! मैंने पेड़ को रोते देखा

काश.! मैं वृक्ष होता - Kaash..! Mai Vriksh Hota  रुदन करता पेड़ - Rudan Karta Ped



डॉ. मुल्ला आदम अली
तिरुपति - आंध्र प्रदेश
डॉ. मुल्ला आदम अली

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