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Yudh Hai Samaksh (Mahakal) — Rahul Sharma | Full Hindi Lyrics & Meaning

कुरुक्षेत्र के शंखनाद सदियों पहले शांत हो चुके हैं, लेकिन उस महाविनाश की गूंज आज भी समय के गलियारों में सुनाई देती है। महाभारत केवल शस्त्रों का युद्ध नहीं था; यह धर्म और अधर्म का एक ऐसा मंथन था जिसने ब्रह्मांड की नींव हिला दी थी। आधुनिक हिंदी साहित्य में राहुल शर्मा द्वारा रचित कविता "युद्ध है समक्ष" (जिसे 'महाकाल' के नाम से भी जाना जाता है) उसी सिहरन को जीवित करती है।

Giant spiritual forms of Lord Shiva (Mahakaal) and Kaal (Time) conversing over a river of blood on the Kurukshetra battlefield, illustrating the Hindi poem 'Yudh Hai Samaksh'.
Lord Shiva (Mahakaal) and Kaal conversing over the river of blood at Kurukshetra, illustrating the poem.

यह कविता एक काल्पनिक लेकिन रोंगटे खड़े कर देने वाला संवाद है—काल (समय/मृत्यु) और महाकाल (विध्वंसक शिव) के बीच। जब सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब क्या समय भी उस आने वाले रक्तपात से भयभीत था?

युद्ध है समक्ष (सम्पूर्ण कविता)

युद्ध है समक्ष तो विपक्ष और पक्ष के,
प्रत्येक दक्ष का भी दीद-कक्ष डोलने लगा।
देख क्षत्रपों की वीर पुत्र पांडवों की,
धमनियों में बूंद-बूंद रक्त खोलने लगा।
और पांचजन्य की सुनी जो गूंज, तो
भुजाओं में हरेक वीर अस्त्र और शस्त्र तोलने लगा।
उधर गिरे विशाल, हो बेहाल देख के कपाल,
काल भी तो जय-जय महाकाल बोलने लगा।

***

(काल का प्रश्न)
हे शम्भू! कहो विशाल समर में जीवन का उत्थान निकट है?
युद्ध हुआ तो धर्म के अंधियारे का अपमान निकट है।
कटे शीश और कटी भुजाएं, निश्चित ही फिर बिखरेंगी,
सूर्य किरण फिर शोणित (खून) पर ही पड़ेंगी।
रणभूमि में वीरों की गर्जन से अम्बर डोलेगा,
कटे शीश तो हरेक मस्तक "शम्भू-शम्भू" बोलेगा।

गूंज गया जो शीशों का उत्तर तलवारों से होगा,
इन्द्र विजयी वीरों का भी परिचय संहारों से होगा।
बाण चलाये जाएंगे फिर मेघ मल्हार बुलाने को,
और सती जाएगी वीरों को गले लगाने को।
निर्दोष प्रजा पर मृत्यु के आलिंगन का छाया संकट है,
हे नाथ! कहो विशाल समर में जीवन का उत्थान निकट है?

A close-up of a dying Mahabharata warrior gripping a broken sword hilt amidst mud and blood, depicting the pain and agony described in Rahul Sharma's poem.
A fallen warrior amidst the brutal reality of the Kurukshetra war, reflecting the poem's agony.

***

वायु प्राण लिए उड़ती है, विजय का ध्वज लहराने को,
रक्त उमड़ता आतुर है, छाती फाड़ बाहर आने को।
धूल उड़ी जब अश्व-ताप से, स्वयं सूर्य भी अस्त हुए,
रणबांकुरे सब के सब, एक साथ नतमस्तक हुए।
दृश्य देख विध्वंस का, धरती वैसे थर्राती है,
और स्वयं काल की काया भी, वह चित्र देख घबराती है।
टाले ना टल पाए ये महायुद्ध, ये सजा विकट है,
हे नाथ! कहो विशाल समर में जीवन का उत्थान निकट है?

***

(महाकाल का उत्तर)
बांह फैलाये धर्म खड़ा है, आकर गले लगाने को,
शीश पड़े दौड़ भाग रहे हैं, चरणों में गिर जाने को।
गति देगा किन्तु ईश्वर आंसुओं से भर कर देंगे,
नवचेतन के सुर, तन और मन फिर भर देंगे।
दिखाकर उजला स्वच्छ सवेरा, शोभित भोर काया होगी,
दान, धर्म, कर्तव्य मनुष्य की सर्वप्रथम माया होगी।

संकट के सागर में दिखता युद्ध विशेष, अब एक ही तट है,
पर पार्थ रहो निश्चिंत, कि अब अंधियारे का अपमान निकट है।

A fallen warrior lying defeated next to a massive broken chariot wheel at sunset on the Kurukshetra battlefield, symbolizing the tragic end of Karna.
Sunset over the carnage of Kurukshetra, symbolizing the tragic end of warriors like Karna.

***

(निष्कर्ष: युद्ध क्यों?)
पाप यदि ना बढ़ता तो ये युद्ध कदाचित ना होता,
धर्मराज भी स्वयं कभी अपने संयम को ना खोता।
एक नारी के खुले केश, क्या अब याद नहीं?
माधव की मैत्री सन्देश की कोई औकात नहीं?
अरे धर्मविरोधी भरी सभा में कोई तो बोला होता,
तलवारें सजी म्यानों में, अरे खून तो फिर खौला होता!

द्यूत युद्ध में हुए कपट का, बोलो बदला लेगा कौन?
और वीर समय पर ना बोले, तो तुम भी अब हो जाओ मौन।
संकट के सागर में दिखता युद्ध विशेष, अब एक ही तट है,
पर पार्थ रहो निश्चिंत, कि अब अंधियारे का अपमान निकट है।

तूफ़ान से पहले की शांति

कविता की शुरुआत रणभूमि के उस भयावह दृश्य से होती है जहाँ "विपक्ष और पक्ष" दोनों मृत्यु के मुहाने पर खड़े हैं। यह पंक्तियाँ हमें उन हिंदी की महाभारत कविताओं की याद दिलाती हैं जो वीर रस और करुण रस का मिश्रण हैं।

वीरों का द्वंद्व

जैसे-जैसे कविता आगे बढ़ती है, यह योद्धाओं की मानसिकता को छूती है। चाहे वह महाशक्तिशाली दुर्योधन की हठ हो या पांडवों का प्रतिशोध। जैसा कि एक अन्य प्रसिद्ध रचना "मैं कुरुक्षेत्र में उतरा था" में कर्ण की अर्जुन के प्रति प्रतिद्वंद्विता को दिखाया गया है, वैसे ही यहाँ हर वीर "अस्त्र और शस्त्र" तोल रहा है।

संवाद की गहराई तब बढ़ती है जब काल स्वयं महाकाल से पूछता है कि क्या "जीवन का उत्थान" वास्तव में निकट है? यह वही नैतिक द्वंद्व है जो रामधारी सिंह दिनकर की रश्मिरथी के प्रथम सर्ग और द्वितीय सर्ग में कर्ण और परशुराम के प्रसंगों में झलकता है।

मौन साक्षी

इस अराजकता के बीच, कवि एक शाश्वत प्रश्न पूछते हैं: क्या इसे टाला जा सकता था? "पाप यदि ना बढ़ता..." वाली पंक्तियाँ सीधे तौर पर उस क्षण की ओर इशारा करती हैं जब भरी सभा में द्रौपदी का अपमान हुआ था। "कन्हैया याद है कुछ भी हमारी" जैसे गीतों में भी यही वेदना सुनाई देती है। कवि का निष्कर्ष स्पष्ट है—जब अधर्म सीमा पार कर जाए, तो विनाश ही सृजन का एकमात्र मार्ग बन जाता है।

ऐतिहासिक और साहित्यिक संदर्भ

महाभारत के मूल ग्रंथों और उनके अर्थ को गहराई से समझने के लिए आप इन स्रोतों का सन्दर्भ ले सकते हैं: महाभारत विकिपीडिया (अंग्रेज़ी) पर विस्तृत जानकारी उपलब्ध है। विद्वान अक्सर गांगुली के अंग्रेजी अनुवाद का हवाला देते हैं। इसके अतिरिक्त, पूर्ण महाभारत पाठ और प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग प्राथमिक स्रोतों के लिए बेहतरीन हैं। शोधकर्ताओं के लिए महाभारत रिसोर्स साइट एक अमूल्य खजाना है।

निष्कर्ष

"युद्ध है समक्ष" मात्र एक कविता नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। चाहे वह कर्ण का त्याग हो या महाकाल का तांडव, महाभारत आज भी प्रासंगिक है। नीचे दिए गए वीडियो में राहुल शर्मा की ओजस्वी वाणी आपको सीधे कुरुक्षेत्र की रणभूमि में ले जाएगी।

कविता पाठ देखें (Watch Videos)

विशेष: राहुल शर्मा (Wordsutra) द्वारा मूल और वायरल कविता पाठ।

हर्ष नाथ झा द्वारा प्रभावशाली प्रस्तुति।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

'युद्ध है समक्ष' कविता किसने लिखी है?

यह कविता राहुल ए. शर्मा (Rahul A. Sharma) द्वारा लिखी गई है। Wordsutra मंच पर उनके प्रदर्शन ने इसे अत्यधिक लोकप्रिय बना दिया।

इस कविता का अर्थ क्या है?

यह कविता महाभारत युद्ध की अपरिहार्यता और विनाश के परिणामों पर काल और महाकाल के बीच एक संवाद है।

मुझे ऐसी और कविताएँ कहाँ मिल सकती हैं?

आप साहित्यशाला पर महाभारत हिंदी कविताएं और हिंदी कविता संग्रह देख सकते हैं।

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