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Din Kuch Aise Guzaarta Hai Koi - दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई | Gulzar Sahab Ghazal

Din Kuch Aise Guzaarta Hai Koi - दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई

Gulzar Sahab Ghazal

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई 

जैसे एहसाँ उतारता है कोई 

Din Kuch Aise Guzaarta Hai Koi - दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई | Gulzar Sahab Ghazal

दिल में कुछ यूँ सँभालता हूँ ग़म 

जैसे ज़ेवर सँभालता है कोई 


आइना देख कर तसल्ली हुई 

हम को इस घर में जानता है कोई 


पेड़ पर पक गया है फल शायद 

फिर से पत्थर उछालता है कोई 


देर से गूँजते हैं सन्नाटे 

जैसे हम को पुकारता है कोई 

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गुलज़ार

Din Kuch Aise Guzaarta Hai Koi - दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई | Gulzar Sahab Ghazal

Din Kuch Aise Guzaarta Hai Koi - दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई

Gulzar Sahab Ghazal

din kuchh aise guzārtā hai koī 

jaise ehsāñ utārtā hai koī 

Din Kuch Aise Guzaarta Hai Koi - दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई

dil meñ kuchh yuuñ sambhāltā huuñ ġham 

jaise zevar sambhāltā hai koī 


aa.ina dekh kar tasallī huī 

ham ko is ghar meñ jāntā hai koī 


peḌ par pak gayā hai phal shāyad 

phir se patthar uchhāltā hai koī 


der se gūñjte haiñ sannāTe 

jaise ham ko pukārtā hai koī 

Gulzar Sahab Ghazal

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