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Ek Shikaar Itne Shikari (Ohff Fohh) Lyrics & Meaning - Rafeek Shadani

एक शिकार एतने शिकारी (ओफ़-फोह)

Ek Shikaar Itne Shikari (Ohff Fohh) - Rafeek Shadani

जब भी हिंदी और अवधी व्यंग्य की बात होती है, रफ़ीक शादानी (Rafeek Shadani) का नाम अदब से लिया जाता है। उनकी कविता "एक शिकार एतने शिकारी" (जिसे 'Ohff Fohh' भी कहा जाता है) 90 के दशक की राजनीतिक अस्थिरता का एक जीवंत दस्तावेज़ है।

यह कविता महज़ शब्दों का खेल नहीं, बल्कि उस दौर के "पॉवर ब्रोकर्स" (Power Brokers) और बेमेल गठबंधनों पर एक करारा तमाचा है। जिस बेबाकी से शादानी साहब ने 'भेड़िया और बकरी की यारी' का ज़िक्र किया है, वह आज भी राजनीति की हकीकत बयां करता है।

Satirical illustration of Rafeek Shadani's poem showing Chandraswami, Rao, and Sukhram with money bags, and a wolf shaking hands with a goat symbolizing the BJP-BSP alliance.
व्यंग्य चित्रण: "चंद्रास्वामी, राव जी, सुखराम जी" और "भेड़िया-बकरी" के गठबंधन का तीखा प्रहार।
Ek Shikaar Itne Shikari Ohff Fohh - Rafeek Shadani Satire
रफ़ीक शादानी का कालजयी व्यंग्य - ओफ़-फोह (Ohff Fohh)

|| हिंदी पाठ ||

देख के बोले हज़ारी ओफ़-फोह
एक शिकार एतने शिकारी ओफ़-फोह

चंद्रास्वामी, राव जी, सुखराम जी
देश में एतने पुजारी ओफ़-फोह

मन्दिरों-मस्ज़िद में न जूता बचे
यह क़दर चोरी-चमारी ओफ़-फोह

भाजपा बसपा में साझा भय रहा
भेड़िया बकरी में यारी ओफ़-फोह

हर परेशानी के अड्डा मोर घर
देख के बोले बुखारी ओफ़-फोह

हर महकमा घूम के देखा रफ़ीक
यह क़दर ईमानदारी ओफ़-फोह

|| Hinglish Lyrics ||

Dekh ke bole Hazaari, Ohff-Fohh
Ek shikaar, etne shikari, Ohff-Fohh

Chandraswami, Rao ji, Sukhram ji
Desh mein etne pujaari, Ohff-Fohh

Mandiron-Masjid mein na joota bache
Yeh kadar chori-chamari, Ohff-Fohh

Bhaajpa-Baspa mein saajha bhay raha
Bhediya bakri mein yaari, Ohff-Fohh

Har pareshani ke adda mor ghar
Dekh ke bole Bukhari, Ohff-Fohh

Har mehkama ghoom ke dekha Rafeek
Yeh kadar imaandaari, Ohff-Fohh

कविता का मर्म: एक गहरा विश्लेषण

1. शिकारी और शिकार (The Hunter and The Hunted)

कवि ने शुरुआत ही एक शक्तिशाली रूपक (Metaphor) से की है—"एक शिकार एतने शिकारी"। यहाँ 'शिकार' भारत की भोली-भाली जनता है और 'शिकारी' वे सत्तालोलुप नेता हैं जो हर तरफ से उसे नोच खाने को तैयार हैं। यह पंक्ति उस बेबसी को दर्शाती है जहाँ जनता के पास बचने का कोई रास्ता नहीं है।

Visual representation of the poem Ohff Fohh: corrupt leaders laughing, a pile of stolen shoes at a temple, bribery in offices, and a distressed common man.
कविता का सार: 'मन्दिरों-मस्ज़िद में न जूता बचे' और आम आदमी की बेबसी का सजीव चित्रण।

2. 90 के दशक का राजनीतिक आईना

शादानी जी ने अपनी रचनाओं में हमेशा नामों को लेने से गुरेज़ नहीं किया।
• चंद्रास्वामी (Chandraswami): एक समय के सबसे ताकतवर तांत्रिक, जिनके इशारों पर सरकारें चलती थीं।
• राव जी (PV Narasimha Rao): पूर्व प्रधानमंत्री, जिनका कार्यकाल आर्थिक सुधारों के साथ-साथ कई विवादों से भी जुड़ा रहा।
• सुखराम जी (Sukhram): प्रसिद्ध टेलीकॉम घोटाला, जहाँ नोटों की गड्डियाँ बिस्तरों में मिली थीं।

इन नामों को "पुजारी" कहकर कवि ने तीखा व्यंग्य किया है कि देश को लूटने वाले ही अब देश के रक्षक बने बैठे हैं।

3. भेड़िया और बकरी की यारी (The Unholy Alliance)

"भेड़िया बकरी में यारी"—यह पंक्ति राजनीतिक अवसरवाद (Political Opportunism) की पराकाष्ठा है। जंगल के कानून में भेड़िया बकरी को खाता है, लेकिन राजनीति में सत्ता पाने के लिए वे गले मिल लेते हैं। यह उस दौर के नागार्जुन की कविताओं की याद दिलाता है जहाँ विचारधारा केवल एक मुखौटा है।

तुलनात्मक अध्ययन: जहाँ शादानी जी राजनीति पर सीधा और नाम लेकर हमला बोलते हैं, वहीं कैलाश गौतम की 'अमौसा के मेला' में आम आदमी की भीड़ और जद्दोजहद का चित्रण मिलता है। दोनों ही कवि "भीड़" को केंद्र में रखते हैं—एक शिकार के रूप में, और दूसरा उत्सव के रूप में।

Watch: Rafeek Shadani Recitation

रफ़ीक शादानी का अंदाज़-ए-बयां ही उनकी पहचान थी। एक अनपढ़ शायर होकर भी उन्होंने राजनीति की जो नब्ज पकड़ी, वह बेमिसाल है। सुनिए यह दुर्लभ रिकॉर्डिंग:

साहित्यशाला पर आप पढ़ रहे थे रफ़ीक शादानी का कालजयी व्यंग्य।

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