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जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना: Gopaldas Neeraj Poem Meaning & Analysis

Amausa Ke Mela Lyrics & Meaning: Kailash Gautam (अमौसा के मेला)

अमौसा के मेला (Amausa Ke Mela)

Lyrics & Meaning | Kailash Gautam Sahab

हिंदी मंचों पर जिस कविता ने सबसे अधिक ठहाके और तालियां बटोरी हैं, उनमें कैलाश गौतम (Kailash Gautam) की "अमौसा के मेला" शीर्ष पर है। यह कविता केवल हास्य नहीं है; यह भारतीय गाँव का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज़ है जिसमें भीड़ भी है, धक्का-मुक्की भी, और रिश्तों की मिठास भी।

यदि आप लोक-रंग और व्यंग्य के शौकीन हैं, तो यह रचना आपको रफ़ीक शादानी साहब की कविताओं की याद दिलाएगी, जो इसी देसी अंदाज़ में समाज का आईना दिखाते थे। नीचे पढ़िए इस कालजयी रचना का सम्पूर्ण पाठ।

Illustration of Amausa Ke Mela poem showing a crowded village river ghat and a packed indian train scene

चित्रण: अमौसा के मेले की आपाधापी - घाट से लेकर स्टेशन तक की भीड़।

|| अमौसा के मेला ||

भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा,
धरम में, करम में, सनल गाँव देखा.
अगल में, बगल में सगल गाँव देखा,
अमौसा नहाये चलल गाँव देखा.

एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा,
कान्ही पर बोरा, कपारे पर बोरा.
कमरी में केहू, कथरी में केहू,
रजाई में केहू, दुलाई में केहू.

आजी रँगावत रही गोड़ देखऽ,
हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखऽ.
घुंघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया,
गठरिया में अब का रखाई बतईहा.


(इस गठरी और इस व्यवस्था के साथ गाँव का आदमी जब गाँव के बाहर रेलवे स्टेशन पर आता है तब क्या स्थिति होती है?)

मचल हउवे हल्ला, चढ़ावऽ उतारऽ,
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारऽ.
एहर गुर्री-गुर्रा, ओहर लुर्री‍-लुर्रा,
आ बीचे में हउव शराफत से बोलऽ

चपायल ह केहु, दबायल ह केहू,
घंटन से उपर टँगायल ह केहू.
केहू हक्का-बक्का, केहू लाल-पियर,
केहू फनफनात हउवे जीरा के नियर.

बप्पा रे बप्पा, आ दईया रे दईया,
तनी हम्मे आगे बढ़े देतऽ भईया.
मगर केहू दर से टसकले ना टसके,
टसकले ना टसके, मसकले ना मसके,

छिड़ल ह हिताई-मिताई के चरचा,
पढ़ाई-लिखाई-कमाई के चरचा.
दरोगा के बदली करावत हौ केहू,
लग्गी से पानी पियावत हौ केहू.
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला.


(इसी भीड़ में गाँव का एक नया जोड़ा, साल भर के अन्दरे के मामला है, वो भी आया हुआ है...)

गुलब्बन के दुलहिन चलै धीरे धीरे
भरल नाव जइसे नदी तीरे तीरे.
सजल देहि जइसे हो गवने के डोली,
हँसी हौ बताशा शहद हउवे बोली.

देखैली ठोकर बचावेली धक्का,
मने मन छोहारा, मने मन मुनक्का.
फुटेहरा नियरा मुस्किया मुस्किया के
निहारे ली मेला चिहा के चिहा के.

सबै देवी देवता मनावत चलेली,
नरियर प नरियर चढ़ावत चलेली.
किनारे से देखैं, इशारे से बोलैं
कहीं गाँठ जोड़ें कहीं गाँठ खोलैं.

बड़े मन से मन्दिर में दर्शन करेली
आ दुधै से शिवजी के अरघा भरेली.
चढ़ावें चढ़ावा आ कोठर शिवाला
छूवल चाहें पिण्डी लटक नाहीं जाला.
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला.


(इसी भीड़ में गाँव की दो लड़कियां, जो बचपन की सहेली हैं, बरसों बाद मिलती हैं...)

एही में चम्पा-चमेली भेंटइली.
बचपन के दुनो सहेली भेंटइली.
ई आपन सुनावें, ऊ आपन सुनावें,
दुनो आपन गहना-गजेला गिनावें.

असो का बनवलू, असो का गढ़वलू
तू जीजा क फोटो ना अबतक पठवलू.
ना ई उन्हें रोकैं ना ऊ इन्हैं टोकैं,
दुनो अपना दुलहा के तारीफ झोंकैं.

हमैं अपना सासु के पुतरी तूं जानऽ
हमैं ससुरजी के पगड़ी तूं जानऽ.
शहरियो में पक्की देहतियो में पक्की
चलत हउवे टेम्पू, चलत हउवे चक्की.

मने मन जरै आ गड़ै लगली दुन्नो
भया तू तू मैं मैं, लड़ै लगली दुन्नो.
साधु छुड़ावैं सिपाही छुड़ावैं
हलवाई जइसे कड़ाही छुड़ावै.
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला.


(कभी-कभी मेले में दुर्घटनायें हो जाती हैं... सामान खो जाता है, बच्चे खो जाते हैं...)

करौता के माई के झोरा हेराइल
बुद्धू के बड़का कटोरा हेराइल.
टिकुलिया के माई टिकुलिया के जोहै
बिजुरिया के माई बिजुरिया के जोहै.

मचल हउवै हल्ला त सगरो ढुढ़ाई
चबैला के बाबू चबैला के माई.
गुलबिया सभत्तर निहारत चलेले
मुरहुआ मुरहुआ पुकारत चलेले.

छोटकी बिटउआ के मारत चलेले
बिटिइउवे प गुस्सा उतारत चलेले.


(बड़े मीठे रिश्ते भी मिलते हैं...)

गोबरधन के सरहज किनारे भेंटइली.
गोबरधन का संगे पँउड़ के नहइली.
घरे चलतऽ पाहुन दही गुड़ खिआइब.
भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइब.

उहैं फेंक गठरी, परइले गोबरधन,
ना फिर फिर देखइले धरइले गोबरधन.
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला.


(मेले से वापसी: परिवार का मुखिया पूरे परिवार को कैसे लेकर आता है, यह दर्द वही जानता है...)

केहू शाल, स्वेटर, दुशाला मोलावे
केहू बस अटैची के ताला मोलावे
केहू चायदानी पियाला मोलावे
सुखौरा के केहू मसाला मोलावे.

नुमाइश में जा के बदल गइली भउजी
भईया से आगे निकल गइली भउजी
आयल हिंडोला मचल गइली भउजी
देखते डरामा उछल गइली भउजी.

भईया बेचारु जोड़त हउवें खरचा,
भुलइले ना भूले पकौड़ी के मरीचा.
बिहाने कचहरी कचहरी के चिंता
बहिनिया के गौना मशहरी के चिंता.

फटल हउवे कुरता टूटल हउवे जूता
खलीका में खाली किराया के बूता
तबो पीछे पीछे चलल जात हउवें
कटोरी में सुरती मलत जात हउवें.
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला.

कविता का भावार्थ और सामाजिक व्यंग्य

कैलाश गौतम जी की यह कविता 'भीड़' का मनोविज्ञान है। मेले में हर कोई अपनी दुनिया में मस्त है—कोई दहेज़ की बातें कर रहा है, तो कोई नेताओं की तरह अपना प्रभाव जमाने में लगा है। यहाँ "दरोगा की बदली" और "हिताई-मिताई" की चर्चा उसी सामाजिक ताने-बाने को दिखाती है जिसे नागार्जुन अपनी कविताओं में अक्सर उठाते रहे हैं।

कविता का सबसे मार्मिक हिस्सा अंत में आता है, जहाँ "भईया बेचारु जोड़त हउवें खरचा" वाली पंक्तियाँ आती हैं। यह उस भारतीय आम आदमी की कहानी है जो 'एक शिकार' की तरह महंगाई और जिम्मेदारियों के बीच फंसा है, फिर भी मेले से जलेबी और पकौड़ी ले जाना नहीं भूलता।

यह भी पढ़ें: जीवन के इन उतार-चढ़ावों को दार्शनिक नज़रिए से समझने के लिए कव्वाली "चढ़ता सूरज धीरे-धीरे ढलता है" का भावार्थ ज़रूर पढ़ें।

Watch: Amausa Ke Mela (Live Recitation)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

अमौसा के मेला कविता के रचयिता कौन हैं?

इस प्रसिद्ध कविता के रचयिता 'जन-कवि' कैलाश गौतम (Kailash Gautam) हैं।

यह कविता किस बोली में लिखी गई है?

यह कविता मुख्य रूप से हिंदी और अवधी/भोजपुरी के मिश्रित 'देसी' अंदाज़ में लिखी गई है, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोक-भाषा को दर्शाती है।

साहित्यशाला पर आप पढ़ रहे थे कैलाश गौतम की अमर रचना।

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