उल्लू हो कविता: तुम चाहत हौ भाईचारा?
Ullu Ho Kavita Lyrics & Meaning - Rafeek Shadani
अवधी और हिंदी व्यंग्य (Hindi Satire) के जगत में रफ़ीक शादानी (Rafeek Shadani) एक ऐसा नाम है, जिनकी कलम हंसाते-हंसाते समाज की कड़वी सच्चाइयों को नंगा कर देती है। उनकी सबसे चर्चित रचनाओं में से एक, "उल्लू हो कविता" (Ullu Ho Kavita), आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी लिखते समय थी।
अक्सर लोग इंटरनेट पर 'Ullu Ho' सर्च करते समय भ्रमित हो जाते हैं, लेकिन साहित्य प्रेमियों के लिए इसका अर्थ केवल एक ही है—शादानी साहब का वह बेबाक अंदाज़ जो "तुम चाहत हौ भाईचारा" कहकर हमारे पाखंड पर चोट करता है। जिस तरह नागार्जुन की कविताएं सत्ता को ललकारती हैं, उसी तरह शादानी जी की यह रचना सामाजिक ढकोसलों की पोल खोलती है।
इस लेख में हम न केवल इस कविता का पूरा पाठ पढ़ेंगे, बल्कि इसके गहरे निहितार्थ को भी समझेंगे। यदि आप रफ़ीक शादानी की अन्य कविताओं के प्रशंसक हैं, तो यह व्यंग्य आपको विशेष रूप से पसंद आएगा।
— कविता पाठ —
तुम चाहत हौ भाईचारा?
उल्लू हौ।
देखै लाग्यौ दिनै मा तारा?
उल्लू हौ।
समय कै समझौ यार इशारा
उल्लू हौ,
तुमहू मारौ हाथ करारा
उल्लू हौ।
दहेज़ में मारुती पायौ ख़ुशी भयी
दुल्हिन पायौ महा खटारा
उल्लू हौ।
कैसे अन्तर पास कियो बस जान गायिन
कहे इक्यासी लिखे अठारह
उल्लू हौ।
कट्टरपंथी जाल से हम तो भाग लिहेन
तुम हौ हो जाओ नौ दू ग्यारह
उल्लू हौ।
जवान बीवी छोड़ के दुबई भागत हौ?
जैसे तैसे करौ गुजारा
उल्लू हौ।
भीड़ में घुस के झगड़ा देखा चाहत हौ
दूरे से बस करो नज़ारा
उल्लू हौ।
कहत रहेन ना फँसौ प्यार के चक्कर मा
झुराय के होइ गयेव छोहारा
उल्लू हौ।
डिगिरी लैके बेटा दर दर भटकौ ना,
हवा भरौ बेँचौ गुब्बारा
उल्लू हौ।
इनका उनका रफीक का गोहरावत हौ?
जब उ चहिहैं मिले किनारा
उल्लू हौ।
कविता का मर्म और सामाजिक व्यंग्य
इस कविता की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी सरलता है। जैसे 'जियो बहादुर खद्दर धारी' में रफ़ीक साहब ने नेताओं पर तीखा प्रहार किया था, वैसे ही यहाँ वे आम आदमी की नासमझी और भोलेपन पर चोट करते हैं। चाहे वो दहेज़ का लालच हो या शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलना, हर पंक्ति में एक शिकारी और शिकार जैसा संबंध दिखता है, जहाँ आम आदमी अक्सर शिकार बन जाता है।
यह व्यंग्य हमें उस लोक संस्कृति की याद दिलाता है जो हम गाँवों और मेलों में देखते थे। अगर आप अवधी माटी की उस सौंधी खुशबू को महसूस करना चाहते हैं, तो कैलाश गौतम की प्रसिद्ध रचना 'अमौसा के मेला' ज़रूर पढ़ें, जो इसी देसी अंदाज़ को बयां करती है।
Watch: Ullu Ho Kavita Recitation
रफ़ीक शादानी जी का लाइव पाठ
कविता का अन्य प्रस्तुतीकरण
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
क्या 'Ullu Ho' किसी वेब सीरीज से संबंधित है?
जी नहीं, यह एक साहित्यिक कविता है जो प्रसिद्ध कवि रफ़ीक शादानी द्वारा लिखी गई है। इसका किसी भी ओटीटी ऐप या वेब सीरीज से कोई संबंध नहीं है।
रफ़ीक शादानी कौन थे?
रफ़ीक शादानी भारत के एक विख्यात अवधी और हिंदी कवि थे। विकिपीडिया के अनुसार, उन्होंने व्यंग्य की 13 पुस्तकें लिखीं और उन्हें 'यश भारती' सम्मान से भी नवाज़ा गया।
'उल्लू हौ' का क्या अर्थ है?
यहाँ 'उल्लू' का अर्थ केवल पक्षी नहीं, बल्कि 'मूर्ख' या 'भ्रमित' व्यक्ति से है। कवि कहना चाहते हैं कि जो व्यक्ति समाज की चालाकियों को नहीं समझता और केवल दिखावे (भाईचारे) में फंसा रहता है, वह असल में उल्लू बन रहा है।