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नीयत-ए-शौक़ भर न जाय कहीं - Nasir Kazmi Ghazal Lyrics, Meaning & Deep Secrets

Ek Baar Kaho Tum Meri Ho – Ibn-e-Insha | Lyrics, Meaning & Video

Home Urdu Poetry Ek Baar Kaho Tum Meri Ho

"तन्हाई का सफ़र और एक बंजारे की सदा..."

इश्क़ की फितरत है तड़पना, मगर जब यह तड़प Ibn-e-Insha के कलम से उतरती है, तो रूह में एक अजीब सी कसक छोड़ जाती है। अगर आप इंशा जी के मिज़ाज से वाकिफ़ हैं, जिन्होंने इन्शा जी उठो अब कूच करो जैसी कालजयी रचनाएं दीं, तो आप जानते होंगे कि उनका दर्द कितना गहरा है। यह नज़्म महज़ अल्फाज़ नहीं, बल्कि हिज्र (जुदाई) के मारे एक ऐसे बंजारे की गुज़ारिश है, जिसने दुनिया की हर रौनक़ देख ली, मगर सुकून उसे सिर्फ महबूब की एक 'हाँ' में नज़र आता है।

A lonely wanderer visualizing Ibn-e-Insha’s nazm Ek Baar Kaho Tum Meri Ho
"Basti Ban Mein..." – Visualizing the solitude of the wanderer.
मूल नज़्म (Hindi)

इब्न-ए-इंशा 

हम घूम चुके बस्ती बन में
इक आस की फाँस लिए मन में
कोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो
जब जीवन रात अँधेरी हो...
इक बार कहो तुम मेरी हो

जब सावन बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों
जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो
या शाम ने बस्ती घेरी हो...
इक बार कहो तुम मेरी हो

हाँ दिल का दामन फैला है
क्यूँ गोरी का दिल मैला है
हम कब तक पीत के धोके में
तुम कब तक दूर झरोके में
कब दीद से दिल को सेरी हो...
इक बार कहो तुम मेरी हो

क्या झगड़ा सूद ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का
सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए
तुम एक मुझे बहुतेरी हो...
इक बार कहो तुम मेरी हो

Hinglish Lyrics

Ibn-e-Insha hum ghoom chuke basti ban mein
Ik aas ki phaans liye mann mein
Koi saajan ho, koi pyaara ho
Koi deepak ho, koi taara ho
Jab jeevan raat andheri ho...
Ik baar kaho tum meri ho

Jab saawan baadal chhaye hon
Jab phaagun phool khilaye hon
Jab chanda roop lutaata ho
Jab suraj dhoop nahata ho
Ya shaam ne basti gheri ho...
Ik baar kaho tum meri ho

Haan dil ka daaman phaila hai
Kyun gori ka dil maila hai
Hum kab tak peet ke dhoke mein
Tum kab tak door jharokhe mein
Kab deed se dil ko seri ho...
Ik baar kaho tum meri ho

Kya jhagda sood khasaare ka
Ye kaaj nahi banjaare ka
Sab sona roopa le jaaye
Sab duniya, duniya le jaaye
Tum ek mujhe bahuteri ho...
Ik baar kaho tum meri ho

Surreal art depicting cosmic love versus a pile of gold, illustrating the verse Sab Sona Roopa Le Jaaye.
"Sab Sona Roopa Le Jaaye..." – When love outweighs the world's riches.

नज़्म का विस्तृत भावार्थ (Detailed Explanation)

पहला बंद: एक बंजारे की कसक
शायर खुद को 'इब्न-ए-इंशा' कहकर संबोधित करते हैं और एक यात्री (बंजारे) की तरह अपनी स्थिति बताते हैं। यह 'बंजारापन' और फकीरी का मिज़ाज हमें अक्सर उर्दू शायरी में मिलता है, जैसा कि हम कच्चा घड़ा (राहगीर) की फिलॉसफी में भी देखते हैं। "बस्ती बन" का अर्थ है शहर और जंगल। वे कहते हैं कि मैं दुनिया भर में भटक चुका हूँ, मगर मेरे मन में एक उम्मीद की "फाँस" अटकी हुई है।

दूसरा बंद: प्रकृति और विरह का संयोग
यहाँ शायर मौसम और प्रकृति की खूबसूरती का ज़िक्र करते हैं—सावन के बादल, फागुन के फूल, चाँदनी रात और धूप। इश्क में इंतजार की यह कैफियत हमें सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं जैसी क्लासिक नज़्मों की याद दिलाती है, जहाँ महबूब की एक झलक के लिए दिल बेकरार रहता है।

तीसरा बंद: इंतज़ार और शिकायत
यहाँ शायर थोड़ी शिकायत करते हैं। "दिल का दामन फैला है" यानी मैं तो प्यार के लिए तैयार खड़ा हूँ, लेकिन "गोरी का दिल मैला है"। इश्क में धोखे और बेरुखी का यह दर्द नुसरत फतेह अली खान की कव्वाली तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी या फिर सोचता हूँ वो कितने मासूम थे में भी बखूबी बयां किया गया है।

चौथा बंद: दुनियावी मोह का त्याग (सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा)
नज़्म का यह हिस्सा इब्न-ए-इंशा के फकीराना मिज़ाज को दर्शाता है। वे कहते हैं, "क्या झगड़ा सूद ख़सारे का"—यानी नफे-नुकसान का हिसाब लगाना मेरा काम नहीं है। "सब सोना रूपा ले जाए"—दुनिया भले ही सारा धन-दौलत रख ले, मुझे उसकी परवाह नहीं। सच्चा इश्क दुनियावी दौलत से ऊपर होता है, ठीक वैसे ही जैसे मेरे रश्क-ए-क़मर में रूहानी इश्क को सबसे ऊपर रखा गया है।

Sahityashala Editor

Written & Interpreted by:
Sahityashala Editorial Team

Focused on deep literary analysis of Urdu & Hindi poetry. We aim to preserve the essence of classic literature for the modern reader.

Disclaimer: The poem text ("Ek Baar Kaho Tum Meri Ho") is reproduced here for educational, commentary, and literary analysis purposes. The copyrights of the original literary work remain with the estate of Ibn-e-Insha. Sahityashala claims no ownership of the original verses.

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