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Jis Tat Par Pyaas Bujhane Se: Lyrics & Meaning | जिस तट पर प्यास (Buddhisen Sharma)

रेणु–समग्र मानवीय दृष्टि : निर्मल वर्मा (मूल पाठ) | Renu Samagra Manviya Drishti Full Text

संपादकीय भूमिका

हिंदी आलोचना के इतिहास में ऐसे क्षण विरल हैं जब एक शिखर रचनाकार, दूसरे शिखर रचनाकार की सृजनात्मक दुनिया में इतनी आत्मीयता से प्रवेश करता है। यह निबंध केवल एक समीक्षा नहीं, बल्कि दो भिन्न ध्रुवों का मिलन है—जहाँ निर्मल वर्मा की अंतर्मुखी, शहरी और आधुनिक संवेदना, फणीश्वरनाथ 'रेणु' के कोलाहल भरे, रंग-बिरंगे और धूल-धूसरित आंचलिक यथार्थ कोक नई 'दृष्टि' से देखती है।

Phanishwar Nath Renu Book Cover - Katha Sansar Ka Mulyankan
फणीश्वरनाथ 'रेणु' के साहित्य पर आधारित आलोचनात्मक कृति (संयोजन: दक्षिणेश्वर प्रसाद राय)।

प्रस्तुत निबंध 'रेणु–समग्र मानवीय दृष्टि' उस समय लिखा गया था जब हिंदी आलोचना 'मैला आँचल' की तुलना में 'परती: परिकथा' को कमतर आँक रही थी। निर्मल जी ने प्रचलित आलोचनात्मक प्रतिमानों को चुनौती देते हुए यह स्थापित किया कि रेणु का साहित्य केवल एक 'अंचल' का दस्तावेज नहीं है, बल्कि वह इतिहास और मानवीय नियति के द्वंद्व को समग्रता में देखने का प्रयास है।

साहित्यशाला पर आज हम निर्मल वर्मा के उसी कालजयी निबंध का मूल पाठ (Full Text) प्रस्तुत कर रहे हैं। यह लेख सिखाता है कि किसी कृति को आलोचक की आँख से नहीं, बल्कि एक सहृदय रसिक की आँख से कैसे पढ़ा जाना चाहिए।

रेणु–समग्र मानवीय दृष्टि

निर्मल वर्मा

जब किसी कृति पर विभिन्न प्रकार की विरोधी धारणाएँ व्यक्त की जा चुकी हों—यहाँ तक कि उसकी आड़ लेकर व्यक्तिगत स्तर पर अप्रासंगिक वाद-विवाद खड़े किए जाने लगे हों—तो उस कृति पर सहमत या असहमत होने के साथ-साथ यह जानना अधिक हो जाता है। पुस्तक के संदर्भ में हमारी मौलिक प्रतिक्रियाएँ कब अपनी आँखों पर बहस की धूल जमा जाती हैं और हम आलोचना के मानदंडों से इतने अधिक संतृप्त हो जाते हैं कि हमें स्वयं अपनी अनुभूतियों पर अविश्वास होने लगता है। अतः यह आत्मालोचनिक दृष्टि कि ‘परती: परिकथा’ पर मेरे अनेक व्यक्तिगत मित्रों ने समय-समय पर अपनी राय बदली है (एक ही समय में परस्पर-विरोधी धारणाएँ व्यक्त की हैं!)। यह कहना कठिन है कि ये विचार परिवर्तन हमेशा ‘परिकथा’ के आंतरिक महत्व के आधार पर ही हुए हों। यह उत्साह किसलिए?

ज़रूरी है कि इसका कारण ‘परिकथा’ की कथावस्तु या शिल्प का उत्साह नहीं है, क्योंकि इस पुस्तक के सम्बन्ध में भी मतभेद रहे हैं, उस पर दुहराया गया असन्तोष का आरोप शायद ही किसी ने लगाया हो; वस्तुतः इस उत्साह का कारण ‘परिकथा’ न होकर हमारी आज की आलोचना-पद्धति, साहित्य के सार्वजनिक मानदंडों में निहित है। ‘परती: परिकथा’ के मूल्यांकन में उसकी प्रशंसा और भर्त्सना करते हुए जो अतिरंजित विशेषण प्रयोग किए गए हैं, उसे देखकर लगता है मानो उसके गुण-दोषों का नहीं बल्कि हमारी आलोचना के उन अघोषित सिद्धान्तों की अपूर्ण चौखटों (डिस्क्रेट कैटेगरीज़) में फिट करने का प्रयत्न ही अधिक किया गया है।

‘परती: परिकथा’ हिन्दी उपन्यासों की परम्परागत पद्धति से भिन्न है (हालाँकि ‘मैला आँचल’ के बाद रेणु के कथा शिल्प में कोई विशेष परिवर्तन नहीं दिखाई देता)। उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण भी पुरानी लीक से हटकर होगा। सम्भव है उपन्यास पढ़ जाने के बाद लगे कि जैसे हम किसी गाँव का अखण्ड विविध काल्पनिक द्वेष देख आए हों। अनेकता, रंग, गन्ध, ध्वनि, हरकतें हमारे बीच।

बहुलता आगे बढ़ गई है, अनेक क्रियाशीलताएँ, सुख-दुख, हरकतें हमारे अपने को संतृप्त किए बिना किन्तु नीरस हुए अपने में समाप्त नहीं हैं। महत्वपूर्ण है हम काल्पनिक की नीरसता, अतिशय प्रवाह की एकरूपता से हटकर रंगों की अनेकता, गन्ध, एक मानवीय रूप से समृद्ध क्रियाशीलता की ओर लौट आएँ। ‘परती: परिकथा’ हमारे परिवेश और हृदय को आलोड़ित करती है। कहा गया है कि ‘परती: परिकथा’ केवल कथा मात्र है, उसमें किसी जीवन-दर्शन की मूलभूत योजना नहीं, उसमें किसी केन्द्रीय सूत्र या समस्या नहीं। सहसा मन में प्रश्न उठता है—क्या उपन्यास को जीवन-दर्शन होना चाहिए, या किसी समस्या-पद्धति तक सीमित है कि ‘मैला आँचल’ उपन्यास के विशिष्ट मानदण्डों द्वारा ही उतारा जाए।

लगता है अब तक ‘मैला आँचल’ की केवल भावुकतापूर्ण प्रशंसा की गई है। उसके द्वारा रेणु ने हिन्दी-उपन्यास के रचना-विधान और कथाशिल्प के क्षेत्र में परिवर्तन किए, यह सत्य है। किन्तु उनके आधार पर हमने अपने व्यक्तिगत मानदण्ड निश्चित कर परिवर्तित करना उचित नहीं समझा। ‘परती: परिकथा’ पर समीक्षा करते समय ‘मैला आँचल’ के सन्दर्भ में रखकर देखना चाहिए, यह उनका विरोध नहीं अनुसरण भी नहीं।

औपन्यासिक कला-शिल्प कथा-संयोजन तथा चरित्र-रचना के प्रति हमारा लेखक की दृष्टि अपना विशिष्ट दृष्टिकोण और आग्रह है, जो ‘मैला आँचल’, ‘परती: परिकथा’ तथा उनके आगामी उपन्यासों में भी अपना स्वरूप विकसित करता होगा। हिन्दी उपन्यास की कथावस्तु, पात्रों की मानसिक उठान-पड़ाव, समस्याएँ तथा वैयक्तिक अनुभवों में बदल सकती है, उनके प्रति लेखक की विशिष्ट कलात्मक आग्रह अथवा दृष्टिकोण नहीं (या तकलीक और स्वयं कथ्य के आवश्यक सम्बन्ध का प्रश्न है)। इसी दृष्टि से ‘परती: परिकथा’ को ‘मैला आँचल’ की पुनरावृत्ति कहना ही निरर्थक जान पड़ता है, जितना ही वह समीक्षात्मक तुलना के ‘रूढ़ साँचे’ को छोड़कर इस आधार पर विवेचित न किया जाए कि क्या वह वही सृजनात्मक कृति होगी कि ‘रेणु’ ही दोनों उपन्यासों के रचयिता हैं, और दूसरे उपन्यास में क्या वे अपने पूर्ववर्ती उपन्यास से अधिक असमर्थ हैं?

किन्तु जहाँ दोनों उपन्यासों के रूप-विधान और रचना-गत के बाद तत्व एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं, वहाँ ‘परिकथा’ का सामाजिक परिवेश न केवल ‘मैला आँचल’ से अधिक समृद्ध है, बल्कि उसमें हमारा समाज और आधुनिक परिस्थितियाँ भी पुस्तक-संरचना दिखाई देती हैं। ‘परती: परिकथा’ का ध्यान उसके बाद सामाजिक के लिए वातावरण में बसाने का प्रयास नहीं किया गया है; बल्कि अनेक अनिश्चितियों तथा विरोधाभासों से भरी ग्रामीण और आधुनिक जीवन की एक सूक्ष्म तलना-रूप उपस्थिति है। इस बात की कृति में ‘मैला आँचल’ में मान्य आलोचना की उग्र अपेक्षा और लेखक की छवि पर ‘परिकथा’ का अधिक गहन और विकसित रूप में प्रस्तुत हुआ है। ‘मैला आँचल’ की अपेक्षा यहाँ अधिक आलोचनात्मक और वस्तुगत अनुभव का समावेश दिखाई देता है, जो दूसरी ओर से उस विकास संभावनाओं के रूप में भी प्रकट किया जा सकता है, जिसके द्वारा हम भारतीय कृषक-समाज और गाँव के जीवन की वैचारिक संरचना को समझ, राजनीतिक वर्गों की अव्यवस्थित और अस्पष्ट आदतों की दृष्टि और छोटी लीकें देख सकते हैं।

किन्तु इस कथा-क्षेत्र को विस्तार देने में रेणु ने जो भूमिका का चयन करता है। लाभप्रद और सार्थक जो नीरस पड़ती तो सघन बोध पर एक फोकस हुआ उभरता है। पाँच खण्डों में पाँच खण्डों पर विचार-जिज्ञासा है, इसके पाँचों में सहज से उजागर घटनाएँ अपने जीवन का बोध देती हैं। चन्द्री की तरह रचना संतुलित ‘परिकथा’ का आयोजन प्रस्तुत करती है। इस तनाव और उत्साह के दो छोरों के बीच पात्रगत स्थितियों की जीवन-यात्रा और संघर्ष को एक संतुलन और केन्द्र में ‘कहानी’ से हम परस्पर संवाद करते हैं। विविध प्रसंग, कथा-घटनाएँ और व्यवहारों की अनदेखी चुनौतियाँ एक संरचना के भीतर बँधी हैं। इस कथा की आलोचना तभी पढ़ी जा सकती है, गोष्ठी के लोगों की अपेक्षा कविता की तरह की संवेदना, कलाकार की अन्तर्दृष्टि ही वहाँ तक पहुँच पाने में समर्थ हो सकती है।

‘रेणु’ की कला यह दर्शाती है कि वह छोटे पात्रों और विस्तृत स्थितियों को अभिव्यक्ति-सक्षम माध्यम देता है। ग्रामीणों के माध्यम से ‘रेणु’ ने लोक, जीवन-कथा-पात्र (फिक्शनल केरेक्टर्स) की दृष्टि को, और यह उसका महत्त्वपूर्ण योगदान है। राजनीतिक वर्गों के प्रति रहस्य और अस्पष्टता का भावात्मक संयोजन उत्पन्न करना, भाषा माध्यम से अपनी आकांक्षाओं और अन्तर्विरोधों को अभिव्यक्त करना सम्पूर्ण कथानक को सजीव रूप प्रदान करता है। किसी लेखक का मूल्य-निर्णय सदैव हो ही होता है; परन्तु यह प्रश्न इतिहास-लेखन में अपना स्थान केवल घटना द्वारा नहीं है। पिछले वर्षों में हिन्दी उपन्यास का आयाम यह रहा है कि लेखक अपने कर्म को मानवीय दृष्टि

पहली समस्या है—कलाकार बाद में फिर चाहे सामाजिक दृष्टिकोण अपनाए, वह मनोरंजनात्मक उद्देश्य द्वारा प्रेरित हो (लोकप्रिय हो या सामाजिक विश्लेषण के लिए)। समस्या साहित्यिक कृति के रूप में (दृष्टि और उद्देश्य) सम्पन्नता की है। एक रचनात्मक कल्पना है, जिसमें सृजनात्मक भाषा द्वारा संवेदनशील प्रतिक्रिया प्रकट की जाती है। विचार, विरोधाभास, दृष्टिकोण अभिव्यक्ति उपन्यासकार के कलात्मक कौशल को व्यक्त-कर देता है। बाहरी मूल्यांकन (सामाजिक, राजनीतिक) निरर्थक किया जा सकता है, क्योंकि वह अन्तर्निहित प्रक्रिया है। यह ध्यान रखना चाहिए कि कलात्मक दृष्टिकोण एक अन्तर्निहित विकास (इनर डायनेमिक्स) प्रकट करता है, जो स्थिर रूप से दिखाई नहीं देता, इसलिए और भी आकर्षक होता है।

इस सन्दर्भ में ‘रेणु’—एक कलाकार के हिस्से से—कोई जीवन-दर्शन ग्रहण करने की माँग करना सदैव अनुचित और एकांगी जान पड़ता है। हमारी आलोचना-प्रणाली की देखरेख में यह कहा जा रहा है कि हर कलाकार का एक ‘जीवन-दर्शन’ होता है। एक उपन्यास (या कोई भी रचना) हमारी अनुभूतियों की संभावनाओं को व्यापक और संवेदनशील बनाती है, यही उसका कर्म है; उसका कलात्मक महत्व इसी में है। उस व्यापक दृष्टि के सहारे समाज का जीवन-दर्शन स्वयं खोजा जा सकता है।

‘परती: परिकथा’ में यही व्यापक संवेदना यहाँ रही है कि सतही तौर पर हम इसे विविधता की बहुलता दिखाई देती है, उसके पीछे परस्पर कई समन्वित संरचनाएँ और अन्तर्विरोध, हर छोटे से छोटे पात्र का उतार-चढ़ाव, जीवन-यात्रा, संघर्ष-समाधान और उनके बीच की दूरी दिखाई देती है। ग्रामीण जीवन, नारी, जाति-संरचना, पारिवारिक असमानता, नयी पीढ़ी के व्यक्तित्व संकट, नैतिक अन्तर्विरोध और आधुनिकता—इन सभी का मानवीय रूप प्रस्तुत किया गया है (एक निर्माण की तरह जो ठीक, सुसंगत और विश्वसनीय लगे)। ‘रेणु’ की प्रस्तुति में यह विशेष है कि वह अपने पात्रों के अन्तर्गत समाहित सत्य को उनके व्यवहार और संवाद में सजीव रूप में व्यक्त करता है। ‘परती: परिकथा’ आज के अनेक हिन्दी उपन्यासों की तरह नहीं है; यह किसी विचार-धारा या समस्या-केन्द्रित कृति नहीं है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति यही है कि यह स्वतःस्फूर्त है; इसके पीछे कोई ‘कार्यक्रम’ नहीं है। कल्पना में यह आप जीवन-प्रवाह को सहज-स्वाभाविक रूप में उद्घाटित कर देता है—यही उसकी सफलता है।

किन्तु इस सन्दर्भ के बावजूद क्या ‘रेणु’ अपने को समकालीन आग्रहों से मुक्त रखने में समर्थ रहे हैं? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसके निर्णय कलात्मक दृष्टि महत्वपूर्ण नहीं है—यह उनके उपन्यास की समीक्षा का प्रश्न है। उपरोक्त कथन यह संकेत करता है कि उपन्यास, समकालीन पात्रों की सृष्टि करता है और उद्देश्य से प्रेरित उपन्यास नहीं। (यह बात दूसरी है कि इसने केवल उपन्यास उपन्यास-रूप में प्रस्तुत किया है।) ‘रेणु’ ने यथार्थ को जीवन, समाजशास्त्रीय पात्रों की सृष्टि करता है और उद्देश्य से प्रेरित उपन्यास नहीं।

एक महान लेखक इसमें आगे जाता है—अनुभूति के प्रति गहन संवेदना तथा अभिव्यक्ति की सृजनात्मक दृष्टि को प्राप्त करने के लिए अपने प्रयत्नों में जुटा है, आत्म-संवाद में ही उसके साथ से अर्थों में संलग्न बन पाता है—कला की यह सम्पूर्ण उपलब्धि है।

जिसे कोई ‘रेणु’ की समकालीन प्राप्ति कहे, कलाकार ने उसके द्वारा अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है, वह अपने में विलक्षण उपलब्धि है। कथानक के किसी एक केन्द्रीय पात्र को समग्र संवेदना द्वारा नहीं बल्कि अपनी समकालीन दृष्टि द्वारा प्रस्तुत है—लेखक के पात्र और दृष्टि—इनके जीवन्त समन्वय का उदाहरण देने के लिए कलाकार को जीवनात्मक रूप से दो शर्तें पूरी करनी चाहिए। पहली—यह कि एक निर्माता तथा दर्शक में अपने इस केन्द्रिय पात्र की संवेदनाओं, अन्तर्द्वन्द्वों तथा मानसिक अवस्थाओं की विवेचना करते समय इनकी सच्चाई को समझ ले। दूसरी—उस पात्र के प्रति संवेदना तथा उसकी चिन्ता के समय यह ध्यान रहे कि लेखक उस पात्र के प्रति है।

कहना न होगा कि जिन दो शर्तों का वर्णन ऊपर किया गया है ‘रेणु’ इन दोनों शर्तों को पूरा करने में समर्थ हैं। तुलसी के समान कल्पना का जितना भी प्रतिस्थापन हम द्वारा साधा जाए, वह जीवन और समाजशास्त्रीय प्राणी होने के वास्तव जितना का जितना ही निकलेगा, निकटवर्ती और सूक्ष्म विवरण देने के बावजूद जितना का जितना ही रहेगा। जितना ही भावुक संवेदना बढ़ती है, उतना ही समाजगत और मानव-केन्द्रित सन्दर्भ बनते जाते हैं। वास्तविकता और कल्पना, दोनों का समन्वय—संवेदनात्मक अनुभवों की अत्यन्त सूक्ष्मता को उभारता है। यहाँ ‘रेणु’ की रचना में यही मानवीय केन्द्र है, जहाँ से वह जीवन से जुड़े-रहने, यथार्थ और संवेदना के समन्वय को साधने का प्रयास किया है।

‘रेणु’ ने जिनसे के ईर्द-गिर्द जो रचनात्मक जाल है, उसके भीतर सामाजिक जीवन इकाइयाँ—सामूहिक जीवन, सामाजिक संगठन तथा वर्ग-स्थिति है, जो उसकी महत्वपूर्ण संवेदनाएँ, जिसके परिणामस्वरूप गाँव तथा वर्ग-सम्बन्धों की छायाएँ-सी दिखाई देती हैं। जिनके के इस रचनाजाल पर मिश्रित रेखांकुर के स्तर के भीतर ही कई उपन्यास के उतार-चढ़ाव अत्यन्त महत्वपूर्ण, निर्विवाद और अविस्मरणीय बन देते हैं।

किन्तु इन कर्मों और दोषों के बावजूद ‘रेणु’ ने ‘परती: परिकथा’ में समाज के बदलते मानवीय अनुभवों की उन्नत चेतना का संकेत देते हुए मानवीय मूल्यों और नैतिक दृष्टि का जो विवेक दिया है, वे सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलन की दृष्टि से मनुष्य की जिन आकांक्षाओं और उद्देश्यों के विरोधी हैं, वह अपने में सार्थक है।

‘परती: परिकथा’ का विचार ‘रेणु’ के कलात्मक कर्म का एक विशिष्ट प्रयोग है, जो उन्होंने ग्राम्य जीवन की बहुविधता, संघर्षशील और परिवर्तनीय मानवीय संरचना की अभिव्यक्ति करने के लिए अपनाया है—यह कारण है कि उपन्यास का विषय, चाहे वह हमारे लिए ही क्यों न असहज लगे, हमारे मानस पर अपने व्यक्तित्व की अमिट छाप छोड़ जाता है। ‘कर्मशील’ के बोध में हम उसके जीवन, लोकगीतों की अर्थ-समृद्ध छवियों को पहचान सकते हैं तथा उसके क्रियाकलापों को अपने अनुभवों और संवेदनाओं के परिप्रेक्ष्य से पहचान सकते हैं। उसके जीवन का ऐसा रूप है जो नहीं लदता—परन्तु जीवन की निरन्तरता से जीवन का विस्तार, समुद्र की तरह संवेदनाएँ-जागर सब से जुड़ी रहती हैं। उसके भीतर ‘दृष्टि’ की समग्रता विद्यमान है, तो व्यक्तित्व का उत्थान भी मिलता है। अतः यह ‘विचार’ केवल एक सैद्धान्तिक प्रयोग है; यदि वह उपन्यास की संवेदनाओं तथा मानवीय मूल्यों के समग्र और उचित रूप से अभिव्यक्त करने में समर्थ होता है, तो उसकी उपयोगिता अनिवार्य है। यह बात दूसरी है कि हम उपन्यास के क्षेत्र में एक ही प्रकार के ‘यथार्थवादी’ कर्म-सिद्धान्त को आदर्श मानते बैठे हों; उसके द्वारा निश्चित किया गया है कि उपन्यास की रचना-विधान में मानवीय परिधियों में निर्वाह की समस्या विद्यमान रहे。

‘परती: परिकथा’ का विचार है—मानवीय किसी चित्र के रंगों को विशेष सन्दर्भों में देखने से कलाकार का इन्द्रिय-बोध विस्तृत होता है; कथ्य के अन्तराल रूपों की स्पष्ट विवेचना ही कला की मूल प्रेरणा है; सब-कुछ व्यक्त-जाना कभी नहीं हो सकता।

है। किन्तु ऐसा लगता है कि जो सब रंग-बिरंगी धाराएँ और अलग स्वरूपों के बीच जो बिखराव दिखाई देता है, वह उपन्यास द्वारा उत्पन्न किया गया है। यह जीवन की और बहुत कुछ है, परती में बुन-बुनकर, संवेदनात्मक ताना-बाना जीवन की विविधताओं से जुड़ा हुआ है। यह आधुनिक यथार्थ के अनुभव, जीवन, अस्तित्व प्रकार से दिखाई पड़ता है।
(1958)


मुझे याद है। यह लम्बा जुलूस था, जो इमरजेंसी से कुछ महीने पहले दिल्ली में निकाला गया था। जयप्रकाश जी सबसे आगे थे। हजारों लोग उनके पीछे उमड़े आ रहे थे। देश के कोने-कोने से लोग जुलूस में शामिल होने आए थे। मैं चलते चलते अपनी पाँत भूल बैठा और अजनबियों के एक जत्थे में चला आया। मैं उनसे चलते हुए पूछा कि वह कहाँ से आए हैं? ‘बिहार से’, उन्होंने कहा और तब तुरन्त बिना कुछ सोचे हुए मैं उनसे पूछ बैठा, ‘रेणु जी भी आए हैं?’ उन्होंने मुस्कुराकर मेरी ओर देखा। ‘नहीं, वह बीमार हैं। आ नहीं सके। आप उन्हें जानते हैं?’

मैं चुपचाप उनके साथ चलने लगा। ‘आप उन्हें जानते हैं?’ यह प्रश्न बहुत देर तक मेरे भीतर गूँजता रहा। मैं उनसे केवल दो-तीन बार मिला था, पर आज भी अँधेड़-कल्पना उसे समझ सकता हूँ। उनके चेहरे में अद्भुत, एक संवेदनात्मक-मानसिक रूप जिसमें अजीब सी सौम्यता और गम्भीरता झलकती रहती थी। कुछ लोगों में एक ‘क्लासिकल’ गरिमा होती है, जिसका जैसे वे नीचे वर्ग से सम्बन्ध होने के बावजूद संलग्न रखते हैं। ‘रेणु’ में वह अद्भुत भाव मुझे बहुत बार याद रहता था। किन्तु जिस चीज ने सबसे अधिक मुझे अपनी तरफ खींचा वह उनका हँसमुख स्वभाव था। वह छोटे-छोटे वाक्यों में संयमित हँसी बिखेरते और फिर मुस्कराकर चुप हो जाते थे। उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा था जिसके बीच से एक कथा बह रही थी, एक जीवन में बहुत भाव-लहरें थीं—ऐसे आदमी कम ही बहुत देखे होंगे। वे अपनी व्यथा को बहुत कहकर और सहज दिखा देते थे। वे इतनी भावुक क्यों नहीं थे, क्योंकि उनकी शालीनता उन्हें अपनी पीड़ा का प्रदर्शन करने से रोकती थी?

‘रेणु’ एक ही ‘शालीन’ व्यक्ति थे। पता नहीं जमीन की कौन-सी सतह से उनका व्यक्तित्व उभर आया था। बातचीत करते समय उनकी भाषा और मुस्कराहट में विचित्र ताल था। यह बातचीत में मैंने कभी नहीं मिला।

अब वह नहीं हैं; मेरे लिए यह अब भी एक अवास्तविक अफ़वाह है, जिस पर विश्वास नहीं कर पाता। उनकी मृत्यु अभी तक मेरे लिए सत्य नहीं है। हमें यही सोच है कि उनकी बार-बार की बीमारी की खबर मुझे इस अचानक खबर के लिए तैयार नहीं कर पाई। हम इस मित्र की बीमारी के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं जैसे उनकी कुछ जान-पहचान आदतों के शृंखल के साथ उनका सहज जीवन असहाय और अस्थायी जान पड़ता है। मुझे अचानक यह महसूस हुआ कि उनकी दुनिया को केवल दो-तीन लोग ही देख पाए थे। उनके घर रहने से मुझे अपनी लिखने की दुनिया इतनी बड़ी और सुदूर जान पड़ने लगी, किन्तु वह नहीं लौटे।

अब सोचता हूँ, तो समझ में आता है, हमारी चीजों को चाहे बहुत लोग पढ़ें, किन्तु हम लिखते बहुत कम लोगों के लिए हैं। किन्तु लोगों की हँसी या सहमति मिलती है, जब उनसे स्वयं जुड़ते हैं। मैं हमेशा सोचता था कि कौन-सी ऐसी बात है, यह लेख, यह उपन्यास पढ़कर क्या सोचेंगे? यह खयाल ही मुझे कुछ खुश और खिन्न, कुछ जिम्मेदारी लिखने से रोकता था। पर अब सोचता हूँ कि लिखना का काम करते रहना का मतलब नहीं, लिखना सुनने और समझने की कोशिश है—किन्तु एक ऐसा संगम है हमारी आत्मा और ‘कागज’, हमारी रचना-भूमि की नैतिकता के साथ जुड़ा होता है। ‘रेणु’ की यही खासियत थी, उनकी उपस्थिति में एक सहज और संवाद होता था। लिखते समय कुछ मान-मर्यादाएँ भूलकर हम असहज सुरक्षा का एहसास करते हैं, हम अपने भीतर खुल जाते हैं, स्पष्ट जाते हैं। ‘रेणु’ की मूक उपस्थिति निरन्तर हमें कुछ कहते ही नहीं बल्कि हमें बोध कराती थी।

यहीं से सरल शब्द का सबसे मौलिक और प्राथमिक अर्थ में इस्तेमाल करना है—‘सरल’ ऐसा व्यक्ति जो दुनिया को किसी चीज़ को व्यापक और जटिल नहीं मानता बल्कि सरल में जीवन की सबसे गहरी और सुन्दर सच्चाइयाँ खोज लेता है। सरलता कोई कमजोरी नहीं बल्कि वह धरती पर जीवनात्मक करुणा, अनायास, सीधे और बोधगम्य ढंग से देखने की क्षमता है। सरलता वह सहज संवेदनशीलता पहचानता है, दलदल को पहचानता है। वह न तो अलंकार में डूबता है, न जीवन को रहस्यमय और दूरस्थ रखता है। वह अपनी गहरी मानवीय अनुभूति और सरलता के सहारे, बल्कि रिश्तों में चीज़ों के पारस्परिक सम्बन्धों, देवी रिश्तों को पहचानता है। यही कारण है कि ‘रेणु’ अपनी रचना में किसी विचार को लादना नहीं बल्कि उसे स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त करने की कोशिश करते हैं। इस कर्म में सरलता ही उनकी अन्तर्दृष्टि की कसौटी और वह अपनी रचनात्मकता को इसी सरलता में ढालते हैं। ‘रेणु’ का समूचा लेखन इसी दिशा में पहचाना जा सकता है, जहाँ वह जीवन को सिर्फ अपने लेखन में ही नहीं, ज़िन्दगी के नैतिक निर्णयों, सत्य और न्याय, करुणा और स्वतंत्रता की संवेदनाओं में भी ढालते हैं।

‘रेणु’ के इस पहचान में साहित्य की नैतिकता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी ‘मैला आँचल’ की संवेदना। उनकी जीवन-दृष्टि के भीतर एक दिशा है, जिसमें कुछ द्वार पर आने-जाने से ही संबंध और अर्थ व्यापकता से सम्पूर्ण मिल जाते हैं। है। एक-दूसरे पर टिके हुए सामाजिक विकास और साहित्य दोनों को समझने का वह समय होता है कि विचार से समुचित दृष्टि और कला दोनों को परिवर्तन उनके सहज-संवेदना से निहित है। समझ की माँग करती है। साहित्य का जो मानवीय रूप है, उसकी समृद्धि नहीं, समय के अनुरूप पर अन्य दृष्टान्तों की ओर अपने को स्थापित नहीं कर पाता वह समय की मूल चेतना से बहुत दूर चला जाता है। और इसलिए अभिव्यक्ति रूप से परिचय और समझ और स्वभाव है।

यह आकस्मिक नहीं था कि ‘रेणु’ को इस समय भारतीय समाज के अनेक जनवादी और प्रगतिवादी आलोचक सही दृष्टि से देखते थे—कोई अन्य लेखक, जो गरीबी की यातना के भीतर भी इतना रस इतना संगीत इतना आनन्द छठा सकता है, परन्तु गरीबों और हाशिये के मनुष्यों में करुणा और जीवन की सरलता देख सकता है। साहित्य के दौरान करता है, आँखों को पर्दा हटाता है, किन्तु उसके भीतर से संकीर्ण दृष्टि मुस्कान को दहला नहीं भुलाता। एक संवेदनशील और सजीव भाषा, जो उपन्यास और जीवन दोनों को अलग करके नहीं बल्कि समग्रता में रखती है। ‘रेणु’ एक ऐसे लेखक नहीं थे, जो केवल पीढ़ी-प्रतिशील लोगों के आडम्बर से बहुत दूर थे। मनुष्य को बताकर उसके समूचे जीवन से अलग करके अपने सिद्धान्तों की प्रयोगशाला में एक समाज की तरह इस्तेमाल करते थे। किसी वर्ग की दुर्दशा भी अपने मानवीय आलोचक, चिन्तन से पहले ‘रेणु’ के महत्व की पहचान कीजिए, अपने भीतर में जाकर आत्मालोचित हो लिए कि जनवादी की दुहाई देते हुए सीधे अपनी नाक के नीचे जीवन जनवादी लेखक की आलोचना करते कि किस प्रकार समझ से यह संभव नहीं था।

यह एक ऐसी सरल मानवीय संवेदना थी जो एक तरफ राजनीति की विभीषिका घोषित करती थी, दूसरी तरफ विचार और जन-आन्दोलन की गरिमा और गरज को एकसाथ करुणा के साथ इतना संवेदनशील बना सकती थी कि वह दूसरे के दुखों के साथ सहज हो जाती थी। यह कोई दृष्टि नहीं थी जो मनुष्य, मानवीयता से वंचित कर देने की कोशिश करे तो ही सही प्रमाण, अपर्याप्त नहीं माना जाएगा।

‘रेणु’ ने बहुत निकट से मनुष्य की पीड़ा, मजबूरी और गरीबी को देखा था, इसलिए वह उसके साथ सच्ची संवेदनशीलता से खड़े रह पाए थे। साहित्य में हम देखते हैं कि जब अनेक लेखक बड़ी किताबें लिख चुके होते हैं। वह अपने साथ अनुभवों की पूरी सम्पदा लाए थे। ये अनुभव उनके उपन्यासों में इतने

यह माना है कि जैसे उनके पात्र में मिट्टी है, वह हिन्दी-उपन्यास में अभूतपूर्व घटना थी। अभूतपूर्व इस अर्थ में नहीं कि पूर्व किसी अन्य लेखक ने अपने गाँव या क्षेत्र पर उपन्यास नहीं लिखे थे। अनेक कथाकारों का नाम लिया जा सकता है जिन्होंने उनसे पहले भी आँचलिक उपन्यास लिखे थे। ‘रेणु’ का स्थान यदि अपने पूर्ववर्ती और समकालीन आँचलिक कथाकारों से अलग और विशिष्ट है तो यह इस अर्थ में कि आँचलिक उनका सिर्फ परिवेश था, उसके भीतर बहती जीवनधारा स्वयं अपने अनेक रूपों और सीमाओं का उद्घाटन करती थी। ‘रेणु’ का महत्व उनकी आँचलिकता में नहीं, आँचलिकता के अतिक्रमण में निहित है। विचार के इस छोटे भूखंड की हलचलों पर उन्होंने पूरे उत्तरी भारत के किसान और किसान-जीवन का उजागर किया था। यह रेखा कि किसान की किस्मत और इतिहास की निरन्तरता का उजागर किया था। यह रेखा कि किसान की किस्मत और इतिहास पार्टी के हस्तक्षेप के बीच यूँ ही जुड़ी हुई थी, जहाँ गाँधीजी का सत्याग्रह-आन्दोलन पार्टी के आह्वान, किसान-सभाओं की भूमिका अपना-अपना स्थान ले रहे थे। ‘रेणु’ का संसार उतनी ही व्यापक और जटिल बनता गया—जैसे-जैसे उनकी दृष्टि, उनका दायरा, उनकी अनुभूति और अन्तर्दृष्टि एक पूरे देश को समेटने लगी। सिनेमा के पर्दे पर हम जैसे डायरेक्शन की फिल्मों में व्यक्तियों और समूह रचती हुई भीड़ में सत्य खोजते और उनका सामाजिक सन्दर्भ, संघर्ष और टकराव देखते हैं, बिल्कुल वैसे ही ‘रेणु’ की दृष्टि में हम ग्रामीण और इतिहास की तहें देखते हैं। एक ग्रामवासी और इतिहास की जाँच गुंफित और टकराव की गूँजाई सुनते हैं। एक ऐसा क्षण आता है जब पात्र और परिस्थितियाँ में कोई अन्तर नहीं रहता—दोनों एक-दूसरे में इतना घुल जाते हैं कि मनुष्य, धरती और इतिहास के बीच सीमाएँ घुलने जाती हैं। किन्तु आपसी मुठभेड़ से जो ‘रेणु’ की समग्रता है, बिहार के अवसाद, झुलसे आकाश में जो निरन्तर काँपती है की आँखों में तैरती हुई जीवन-इन्द्रियात्मक तत्कालिकता में पकड़ की कोशिश की थी।

यह अद्भुत क्षण था। शायद ही किसी हिन्दी-उपन्यासकार ने मनुष्य को इतिहास-परम्परा की सीमाओं से मुक्त करके बाहर निकालकर इतना सार्वभौमिक बना लिया। इतना काव्यात्मक बनाया था जितना ‘रेणु’ ने और यह सार्वभौमिकता, यह कविता अलंकार और छवि नहीं थी, क्योंकि परम्परागत किसान और आधुनिक ऐतिहासिक आन्दोलन के बीच जिस पुल की रचना ‘रेणु’ ने की, अपना विषय बनाया, वह उस अर्थ में भी आँचलिक नहीं था। उसमें सिर्फ ‘रेणु’ ने जिस भूमि से किसान के उदास, सुख, संघर्ष और उत्सव का संसार खड़ा किया था, वह हिन्दी के परम्परागत ग्राम्य-उपन्यास से अलग और विशिष्ट था। अभूतपूर्व इस अर्थ में नहीं कि पूर्व किसी अन्य लेखक ने अपने गाँव या क्षेत्र पर उपन्यास नहीं लिखे थे। अनेक कथाकारों का नाम लिया जा सकता है जिन्होंने उनसे पहले भी आँचलिक उपन्यास लिखे थे। ‘रेणु’ का स्थान यदि अपने पूर्ववर्ती और समकालीन आँचलिक कथाकारों से अलग और विशिष्ट है तो यह इस अर्थ में कि आँचलिक उनका सिर्फ परिवेश था, उसके भीतर बहती जीवनधारा स्वयं अपने अनेक रूपों और सीमाओं का उद्घाटन करती थी। ‘रेणु’ का महत्व उनकी आँचलिकता में नहीं, आँचलिकता के अतिक्रमण में निहित है। विचार के इस छोटे भूखंड की हलचलों पर उन्होंने पूरे उत्तरी भारत के किसान और किसान-जीवन का उजागर किया था। यह रेखा कि किसान की किस्मत और इतिहास की निरन्तरता का उजागर किया था। यह रेखा कि किसान की किस्मत और इतिहास पार्टी के हस्तक्षेप के बीच यूँ ही जुड़ी हुई थी, जहाँ गाँधीजी का सत्याग्रह-आन्दोलन पार्टी के आह्वान, किसान-सभाओं की भूमिका अपना-अपना स्थान ले रहे थे। ‘रेणु’ का संसार उतनी ही व्यापक और जटिल बनता गया—जैसे-जैसे उनकी दृष्टि, उनका दायरा, उनकी अनुभूति और अन्तर्दृष्टि एक पूरे देश को समेटने लगी। सिनेमा के पर्दे पर हम जैसे डायरेक्शन की फिल्मों में व्यक्तियों और समूह रचती हुई भीड़ में सत्य खोजते और उनका सामाजिक सन्दर्भ, संघर्ष और टकराव देखते हैं, बिल्कुल वैसे ही ‘रेणु’ की दृष्टि में हम ग्रामीण और इतिहास की तहें देखते हैं। एक ग्रामवासी और इतिहास की जाँच गुँफित और टकराव की गूँजाई सुनते हैं। एक ऐसा क्षण आता है जब पात्र और परिस्थितियाँ में कोई अन्तर नहीं रहता—दोनों एक-दूसरे में इतना घुल जाते हैं कि मनुष्य, धरती और इतिहास के बीच सीमाएँ घुलने जाती हैं। किन्तु आपसी मुठभेड़ से जो ‘रेणु’ की समग्रता है, बिहार के अवसाद, झुलसे आकाश में जो निरन्तर काँपती है की आँखों में तैरती हुई जीवन-इन्द्रियात्मक तत्कालिकता में पकड़ की कोशिश की थी।

यह अद्भुत क्षण था। शायद ही किसी हिन्दी-उपन्यासकार ने मनुष्य को इतिहास-परम्परा की सीमाओं से मुक्त करके बाहर निकालकर इतना सार्वभौमिक बना लिया। इतना काव्यात्मक बनाया था जितना ‘रेणु’ ने और यह सार्वभौमिकता, यह कविता अलंकार और छवि नहीं थी, क्योंकि परम्परागत किसान और आधुनिक ऐतिहासिक आन्दोलन के बीच जिस पुल की रचना ‘रेणु’ ने की,

(कला का जीवन से संवाद)
(अप्रैल 1977)

निष्कर्ष

यह निबंध केवल एक आलोचनात्मक लेख नहीं, बल्कि दो महान रचनाकारों के अंतर्मन का संवाद है। निर्मल वर्मा की दृष्टि ने फणीश्वरनाथ 'रेणु' के साहित्य में छिपे उस 'समग्र मानवीय सत्य' को उद्घाटित किया है, जो अक्सर आंचलिकता के शोर में दब जाता है। 'परती: परिकथा' और 'मैला आँचल' के मर्म को समझने के लिए यह पाठ एक अनिवार्य कुंजी की तरह है।

Nirmal Verma - Author of Renu Samagra Manviya Drishti Essay
निर्मल वर्मा: जिन्होंने रेणु के साहित्य की गहराई को इस निबंध 'समग्र मानवीय दृष्टि' में उभारा है।

साहित्यशाला पर इस दुर्लभ सामग्री को सहेजने का हमारा प्रयास यही है कि हिंदी साहित्य के विद्यार्थी और प्रेमी इस बौद्धिक विरासत से वंचित न रहें। आशा है, निर्मल जी (रेखता प्रोफाइल) के शब्दों ने आपके भीतर भी रेणु के पात्रों के प्रति एक नई संवेदना जगाई होगी।

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