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कोपी कोपी बोलेली छठी मैया लिरिक्स: घाट सजावट का रोंगटे खड़े करने वाला गीत!

रुला देने वाली 5 हिंदी कविताएँ: सिस्टर्स डे और रक्षाबंधन पर भाई-बहन का अटूट प्रेम

(अपडेटेड: रक्षाबंधन विशेष)

"किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा
अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बाँधेगा"

— मुनव्वर राना

क्या आपने कभी सोचा है कि एक सूत के कच्चे धागे में इतना भावनात्मक वज़न कैसे हो सकता है?

एक ऐसा रिश्ता जो बचपन की निर्दोष नोकझोंक से शुरू होकर, जीवन के सबसे अँधेरे मोड़ों पर एक अभेद्य ढाल बन जाता है। अगस्त का महीना आते ही हवाओं में रिश्तों की मिठास घुलने लगती है। एक तरफ जहाँ अगस्त का पहला रविवार 'सिस्टर्स डे' (Sister's Day) के रूप में बहनों के निस्वार्थ त्याग का जश्न मनाता है, वहीं सावन की पूर्णिमा रक्षाबंधन (Raksha Bandhan) के पावन पर्व को लेकर आती है।

साहित्य अकादेमी द्वारा संरक्षित अभिलेखों से लेकर विश्व साहित्य के आधुनिक विमर्शों तक, भाई-बहन के इस शाश्वत प्रेम को अनेक रूपों में उकेरा गया है। साहित्यशाला के इस विशेष संस्करण में, हम आपके लिए हिंदी साहित्य की 5 ऐसी कालजयी और संपूर्ण कविताएँ लेकर आए हैं, जो इस रिश्ते के सबसे गहरे और यथार्थवादी आयामों को दर्शाती हैं।

1. राखी की चुनौती — सुभद्राकुमारी चौहान

जब भी स्वाधीनता संग्राम और वीर रस की बात होती है, सुभद्रा जी का नाम स्वतः ही ओठों पर आ जाता है। अपनी अमर रचना 'झाँसी की रानी' की तरह ही, 'राखी की चुनौती' भी रक्षाबंधन को एक नए राष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित करती है। यहाँ राखी सिर्फ एक रेशमी धागा नहीं है; यह उन स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक 'लोहे की हथकड़ी' है। इस कविता का भाव 'भारत माता' की बेड़ियों को काटने की उस छटपटाहट से जुड़ा है, जहाँ एक बहन अपने भाई को देश के लिए न्यौछावर होने की प्रेरणा देती है, जिसका उल्लेख National Digital Library (NDL) के ऐतिहासिक पुरालेखों में भी सुरक्षित है।

राखी की चुनौती - सुभद्राकुमारी चौहान की देशभक्तिपूर्ण कविता जो रक्षाबंधन पर भाई को देश के लिए समर्पित होने की प्रेरणा देती है
बहिन आज फूली समाती न मन में।
तड़ित् आज फूली समाती न घन में॥
घटा है न फूली समाती गगन में।
लता आज फूली समाती न वन में॥

कहीं राखियाँ हैं चमक है कहीं पर,
कहीं बूँद है, पुष्प प्यारे खिले हैं।
ये आई है राखी, सुहाई है पूनों,
बधाई उन्हें जिनको भाई मिले हैं॥

मैं हूँ बहिन किंतु भाई नहीं है।
है राखी सजी पर कलाई नहीं है॥
है भादों, घटा किंतु छाई नहीं है।
नहीं है ख़ुशी पर रुलाई नहीं है॥

मेरा बंधु माँ की पुकारों को सुनकर
के तैयार हो जेलख़ाने गया है।
छीनी हुई माँ की स्वाधीनता को
वह ज़ालिम के घर में से लाने गया है॥

मुझे गर्व है किंतु राखी है सूनी।
वह होता, ख़ुशी तो क्या होती न दूनी?
हम मंगल मनावें, वह तपता है धूनी।
है घायल हृदय, दर्द उठता है ख़ूनी॥

है आती मुझे याद चित्तौरगढ़ की,
धधकती है दिल में वह जौहर की ज्वाला।
है माता-बहिन रोके उसको बुझातीं,
कहो भाई तुमको भी है कुछ कसाला?

है, तो बढ़े हाथ, राखी पड़ी है।
रेशम-सी कोमल नहीं यह कड़ी है॥
अजी देखो लोहे की यह हथकड़ी है।
इसी प्रण को लेकर बहिन यह खड़ी है॥

आते हो भाई? पुनः पूछती हूँ—
कि माता के बंधन की है लाज तुमको?
—तो बंदी बनो, देखो बंधन है कैसा,
चुनौती यह राखी की है आज तुमको॥

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"है, तो बढ़े हाथ, राखी पड़ी है। रेशम-सी कोमल नहीं यह कड़ी है॥ अजी देखो लोहे की यह हथकड़ी है। इसी प्रण को लेकर बहिन यह खड़ी है॥" - सुभद्राकुमारी चौहान


2. घर की याद — भवानीप्रसाद मिश्र (संपूर्ण रचना)

हिंदी साहित्य में स्मृतियों (Nostalgia) का इससे मार्मिक और विस्तृत दस्तावेज़ शायद ही कोई हो। 'गीत फरोश' के रचयिता भवानीप्रसाद मिश्र जी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल की सलाखों के पीछे से यह लंबी कविता रची थी। जब सावन का पानी बरसता है, तो कवि को अपने घर के "चार भाई चार बहिनें" की याद आती है। आप Archive.org के दुर्लभ साहित्य संग्रहों में भवानी भाई की उन पाण्डुलिपियों को खोज सकते हैं जहाँ यह दर्द दर्ज़ है। प्रस्तुत है पूरी 218 पंक्तियों की कालजयी रचना

घर की याद भवानीप्रसाद मिश्र की कविता, जेल में परिवार और बहनों की याद का मार्मिक वर्णन
आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात-भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,
अब सवेरा हो गया है,
कब सवेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सोकर सिर्फ़ माना—
क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चुपचाप है सब,
रातवाली छाप है सब,
गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
काँपते हैं प्राण थर-थर,

बहुत पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर ख़ुशी का पूर है जो,


घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर!
आज का दिन दिन नहीं है,
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे,
हाय कैसा तरस है रे,
घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने तब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,


और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुःख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,
माँ कि जिसकी स्नेह-धारा
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।
और पानी गिर रहा है,
घर चतुर्दिक् घिर रहा है,
पिताजी भोले बहादुर,
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिल-खिलाएँ,
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता,
आज गीता पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
ख़ूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उनकी मिला लेकर,
जब कि नीचे आए होंगे
नैन जल से छाए होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नज़र उनकी पड़े होंगे।
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर,
पाँचवाँ मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,
आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा,
और माँ ने कहा होगा,
दुःख कितना बहा होगा
आँख में किस लिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,
वह तुम्हारा मन समझ कर,
और अपनापन समझ कर,
गया है सो ठीक ही है,
यह तुम्हारी लीक ही है,
पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेगे और बच्चे,
पिताजी ने कहा होगा,
हाय कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,
गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे थी बरसात प्यारी,
रात-दिन की झड़ी झारी,
खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,
तुझे बतलाता कि बेला
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,
मैं न रोऊँगा,—कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा,
दृश्य उसके बाद का रे,
पाँचवे की याद का रे,

भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,,
सहज पानी, सहज तरला,
शर्म से रो भी न पाएँ,
ख़ूब भीतर छटपटाएँ,


आज ऐसा कुछ हुआ होगा,
आज सबका मन चुआ होगा।
अभी पानी थम गया है,
मन निहायत नम गया है,
एक-से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,
ढेर है उनका, न फाँकें,
जो कि किरने झुकें-झाँकें,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दे ज्यों,
गगन-आँगन की लुनाई,
दिशा के मन से समाई,
दश-दिशा चुपचार है रे,
स्वस्थ की छाप है रे,
झाड़ आँखें बंद करके,
साँस सुस्थिर मंद करके,
हिले बिन चुपके खड़े हैं,
क्षितिज पर जैसे जड़े हैं,
एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किस लिए इतनी तृषा रे,
तू ज़रा-सा दुःख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है,
हवा आई उड़ चला तू,
लहर आई मुड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,
तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पूर होकर
दुःख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे!
पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ जैसे,
मन कि बड़ का झाड़ जैसे
एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए,
एक हल्की चोट लग ले,
दूध की नद्दी उमग ले,
एक टहनी कम न होले,
कम कहाँ कि ख़म न होले,
ध्यान कितना फ़िक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी!
इस तरह का हाल उनका,
इस तरह का ख़याल उनका,
हवा, उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना,

हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें,


मैं मज़े में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है,
किंतु उससे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूँ,
मत करो कुछ शोक कहना,
और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वज़न सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,
कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुःख डट कर ठेलता हूँ,
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं,
हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ,
कह न देना मौन हूँ मैं,
ख़ुद न समझूँ कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें।

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"चार भाई चार बहिनें, भुजा भाई प्यार बहिनें... हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन, तुम बरस लो वे न बरसें, पाँचवें को वे न तरसें।" - भवानीप्रसाद मिश्र


3. बहन — इब्बार रब्बी

इब्बार रब्बी की यह कविता मध्यवर्गीय परिवार की उस 'बड़ी बहन' का मनोवैज्ञानिक और सामाजिक यथार्थ उकेरती है, जिस पर पूरे घर की नैतिक और व्यावहारिक ज़िम्मेदारी थोप दी गई है। परिवार में पिता और पुत्री या भाई-बहन के बीच के जटिल अंतर्द्वंद्वों को समझने के लिए आप पिता-पुत्री के रिश्तों पर आधारित कविता 'बिंदी' का भी अध्ययन कर सकते हैं। मध्यवर्गीय यथार्थवाद पर Shodhganga के अकादमिक शोध पत्र भी यह प्रमाणित करते हैं कि कैसे बड़ी बहन परिवार की सुरक्षा के लिए अपनी कोमलता खोकर एक 'संदेह की नदी' बन जाती है।

बहन कविता - इब्बार रब्बी, मध्यवर्गीय परिवार में बड़ी बहन की ज़िम्मेदारियों का यथार्थ
क्या हो गया है मुझे?
बड़ी बहन हो गई क्यों इतनी बड़ी!
नाम से उसके ब्याह भागते हैं दूर।
चुराकर छोटे भाई के प्रेमपत्र
सबके सामने बाँच कर हँसती है;
पढ़कर अकेले में गुमसुम हो रहती है。

छोटी बहन सुधा को पढ़ाने,
नौ बजते ही आता है ट्यूटर।
कितना शरीफ़, कितना मेहनती है।
दफ़्तर से अक्सर लेता है छुट्टी
और पढ़ाता है सारे-सारे दिन।
जाते हैं मैं, बाप दफ़्तर,
माँ बाज़ार,
भाई स्कूल, और बड़ी सेंटर।
पर पढ़ाता है अकेला मेहनती ट्यूटर।
ट्यूटर की क़मीज़ में बटन टाँकती है सुधा,
फ़ैशन पर बहसती है ट्यूटर से सुधा,
जब चाय के लिए, तब खाने के लिए,
और अब हाथ से किताब छीनने के लिए,
ज़िद्द करती है, उलझी रहती है ट्यूटर से सुधा।
कॉपियों में छिपाकर नीले पत्र रखती है सुधा।

सिर्फ़ पड़ा देखता हूँ और सिगरेट फूँकता हूँ।
माँ गांधारी बैठी है सामने。
बड़ी की एक आँख हाथ के ताश में,
दूसरी जड़ी है पहले ट्यूटर फिर सुधा में。
मेज़ के नीचे दो पाँव टकराए。
माँ, बाप और मैं कोई नहीं देखता यह,
क्योंकि ठेका लिया है सिर्फ़ बड़ी बहन ने।


बाद में क्यों गालियाँ उगलता है बाप?
क्यों अफ़सोसती है माँ—
“दो महीने से पैसे नहीं दिए उन्हें।”
बड़ी संदेह की नदी है।
क्यों रोती है सिर्फ़ सुधा!
क्यों कुछ नहीं होता मुझे??
उबलता नहीं क्यों, खौलता नहीं क्यों??
क्या हो गया है मुझे??

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"क्या हो गया है मुझे? बड़ी बहन हो गई क्यों इतनी बड़ी! ... क्योंकि ठेका लिया है सिर्फ़ बड़ी बहन ने।" - इब्बार रब्बी


4. बहनें — असद ज़ैदी

असद ज़ैदी अपनी इस मार्मिक कविता में पितृसत्तात्मक ढांचे में बहनों की मौन कुर्बानियों का गहरा रूपक रचते हैं। विश्व साहित्य में जैसे Audre Lorde ने महिलाओं के दबे हुए स्वरों (A Woman Speaks) को मुखर किया, या जैसे साहित्य की उन सशक्त महिलाओं ने लेखन के सारे नियम तोड़े, वैसे ही असद ज़ैदी की यह कविता दिखाती है कि बहनें कैसे परिवार की आग को जलाए रखने के लिए स्वयं को 'राख' में तब्दील कर देती हैं। स्त्री विमर्श और इन कविताओं के समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए JSTOR के जर्नल्स भी इस यथार्थ को प्रमाणित करते हैं।

बहनें कविता - असद ज़ैदी, स्त्री विमर्श और परिवार में बहनों के त्याग का प्रतीकात्मक चित्रण
कोयला हो चुकी हैं हम बहनों ने कहा रेत में धँसते हुए
ढक दो अब हमें चाहे हम रुकती हैं यहाँ तुम जाओ


बहनें दिन को हुलिए बदलकर आती रहीं
बुख़ार था हमें शामों में

हमारी जलती आँखों को और तपिश देती हुई बहनें
शाप की तरह आती थीं हमारी बर्राती हुई

ज़िंदगियों में बहनें ट्रैफ़िक से भरी सड़कों पर
मुसीबत होकर सिरों पर हमारे मँडराती थीं

बहनें कभी सांत्वना पाकर बैठ जाती थीं हमारी पत्नियों के
अँधेरे गर्भ में बहनें पहरा देती रहीं

चूल्हे के पीछे अँधेरे में प्याज़ चुराकर जो हमें चकित करते हैं
उन चोरों को कोसती थीं बहनें

ख़ुश हुई बहनें हमारी ठीक-ठाक चलती नौकरियों में भरी
संभावनाएँ देखकर

कहनें बच्चों को परी-दरवेश की कथाएँ सुनाती थीं
उनकी कल्पना में जंगल जानवर बहनें लाती थीं

बहनों ने जो नहीं देखा उसे और बढ़ाया अपने
आन की पूँजी

बटोरते-बटोरते।
‘यह लकड़ी नहीं जलेगी किसी ने

यों अगर कहा तो हम बुरा मान लेंगी
किसलिए आख़िर हम हुई हैं लड़कियाँ

लकड़ियाँ चलती हैं जैसे हम जानती हैं तुम जानते हो
लकड़ियाँ हैं हम लड़कियाँ


जब तक गीली हैं धुआँ देंगी पर इसमें
हमारा क्या बस? हम

पतीलियाँ हैं तुम्हारे घर की भाई पिता
'माँ देखो हम पतीलियाँ हैं'

हमारी कालिख धोई जाएगी, नहीं धोया गया हमें तो
हम बनकर कालिख

बढ़ती रहेंगी और चीथड़े
भरती रहेंगी शरीर में जब तक है गीलापन और स्वाद

हम सूखेंगी अपनी रफ़्तार से
‘हम सूख जाएँगी

हम खड़खड़ाएँगी इस धरती पर सन्नाटे में
मोखों में चूल्हों पर दोपहरियों में

अपना कटोरा बजाएँगी हम हमारा कटोरा
भर देना—मोरियों पर पानी मिल जाता है कुनबेवालो

पर घूरों पर दाना नहीं मिलता
हमारा कटोरा भर देना

‘हम तुम्हारी दुनिया में मकड़ी भर होंगी
हम होंगी मकड़ियाँ

घर के किसी बिसरे कोने में जाला ताने पड़ रहेंगी
हम होंगी मकड़ियाँ धूल भरे कोनों की

हम होंगी धूल
हम होंगी दीमकें किवाड़ों की दरारों में

बक्से के तले पर रह लेंगी
नीम की निबौलियाँ और कमलगट्टे खा लेंगी

हम रात झींगुरों की तरह बोलेंगी
कुनबे की नींद को सहारा देती हमीं होंगी झींगुर।’

कोयला हो चुकी हैं हम
बहनों ने कहा रेत में धँसते हुए

कोयला हो चुकीं
कहा जूतों से पिटते हुए

कोयला
सुबकते हुए

बहनें सुबकती हैः ‘राख हैं हम
राख हैं हम : गर्द उड़कर बैठ जाएँगी सभी के माथे पर


सूखेंगी तुम्हारी आँखों में ग्लनि की पपड़ियाँ
गरदन पर तेल की तह जमेगी, देखना!’

बहनें मैल बनेंगी एक दिन
एक दिन साबुन के साथ निकल जाएँगी यादों से

घुटनों और कोहनियों को छोड़कर
मरती नहीं पर वे, बैठी रहती हैं शताब्दियों तक घरों में

बहनों को दबाती दुनिया गुज़रती जाती है जीवन के
चरमराते पुल से परिवारों के चीख़ते भोंपू को

जैसे-तैसे दबाती गर्दन झुकाए अपने फफोलों को निहारती
एक दिन रास्ते में जब हमारी नाक से ख़ून निकलता होगा

मिट्टी में जाता हुआ
पृथ्वी में जाता हुआ

पृथ्वी की सलवटों में खोई बहनों के खारे शरीर जागेंगे
श्रम के कीचड़ से लिथड़े अपने आँचलों से हमें घेरने आएँगी बहनें

बचा लेना चाहेंगी हमें अपने रूखे हाथों से
बहुत बरस गुज़र जाएँगे

इतने कि हम बच नहीं पाएँगे।

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"लकड़ियाँ चलती हैं जैसे हम जानती हैं तुम जानते हो, लकड़ियाँ हैं हम लड़कियाँ... जब तक गीली हैं धुआँ देंगी पर इसमें हमारा क्या बस?" - असद ज़ैदी


5. मेरी बहिन — जितेंद्र कुमार

जितेंद्र कुमार की यह रचना बहन के वजूद को एक आध्यात्मिक और भावुक धरातल पर रखती है। यह कविता उस अपरिभाषित स्नेह की बात करती है जो हमें संसार से जोड़ता है। भारतीय साहित्य कोश Hindwi.org पर ऐसी अनेक कविताएँ उपलब्ध हैं। जिस प्रकार प्राचीन साहित्य में विद्यापति ने 'सिंह पर एक कमल राजित' कहकर अद्वितीय सौंदर्य का वर्णन किया, या जैसे शोएब कियानी की नज़्मों में एक आधुनिक तड़प है (जिसे आप Rekhta पर पढ़ सकते हैं), ठीक वैसे ही जितेंद्र कुमार की यह कविता भाई-बहन के रिश्ते के निश्छल सौंदर्य को स्थापित करती है।

मेरी बहिन कविता - जितेंद्र कुमार, बहन और भाई के बीच गहरे आध्यात्मिक और भावनात्मक जुड़ाव पर
मुझे मिला है अर्थ
और वह तू है ओ मेरी बहिन
जो मुझे संसार से जोड़ देती है

जैसे जोड़ती है नाल
गर्भस्थ शिशु को माँ से

तू जो खड़ी है
सारे दुख सहती चुप
तू जो केवल हँसती है
अट्टहास
जो तेरे रोग जर्जर शरीर को
शिथिल कर देता है

और मेरी पत्थर आँखों में अनायास
आँसू छलक आते हैं
तू मेरे जीवन को अर्थ देती
ओ मेरी बहिन


तू मुझमें सामान्य मानवीय भावों को
उजागर करती
ओ मेरी बहिन
अब मैं तरसता नहीं
कि कोई मुझे देखे
मुझे सुने
मेरी प्रतिभा स्वीकारे
मैं सहज भक्ति से

तेरे चरणों मैं सिर रख देता हूँ
और तू संकोच से हँस भर देती है

तू अपने परिचय से
मुझे गर्व से भर देती ओ मेरी बहिन!

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"तू मेरे जीवन को अर्थ देती ओ मेरी बहिन... मैं सहज भक्ति से तेरे चरणों मैं सिर रख देता हूँ, और तू संकोच से हँस भर देती है।" - जितेंद्र कुमार

💔 अगर बहन नहीं होगी तो पट्टी कौन बांधेगा?

रक्षाबंधन के अवसर पर इस रुला देने वाले वीडियो को अपनी बहन के साथ ज़रूर साझा करें:

निष्कर्ष (Conclusion)

बहन और भाई का रिश्ता महज एक दिन (सिस्टर्स डे या रक्षाबंधन) के उत्सव का मोहताज नहीं है। यह जीवनपर्यंत चलने वाला वह काव्य है जिसे हम रोज़ जीते हैं। गांधी दर्शन भी अहिंसा और प्रेम की जिस नीव पर खड़ा है, वह परिवार की इसी निश्छल इकाई से शुरू होती है।

इस रक्षाबंधन और सिस्टर्स डे पर, केवल तोहफे ही नहीं, बल्कि इन कविताओं की पंक्तियाँ भी अपनी बहनों के साथ साझा करें। साहित्यशाला के साथ जुड़े रहें और हिंदी साहित्य के इन अनमोल मोतियों को हमेशा अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. रक्षाबंधन और सिस्टर्स डे पर पढ़ने के लिए सबसे अच्छी हिंदी कविताएँ कौन सी हैं? (Rakhi wishes kavita)
सुभद्राकुमारी चौहान की 'राखी की चुनौती', भवानीप्रसाद मिश्र की 'घर की याद', इब्बार रब्बी की 'बहन', असद ज़ैदी की 'बहनें', और जितेंद्र कुमार की 'मेरी बहिन' रक्षाबंधन और सिस्टर्स डे के लिए सबसे बेहतरीन (Emotional Raksha Bandhan quotes in Hindi) कविताएँ मानी जाती हैं।
Q2. 'राखी की चुनौती' कविता का मुख्य संदेश क्या है?
सुभद्रा जी की यह कविता रक्षाबंधन को स्वाधीनता संग्राम से जोड़ती है। इसमें राखी को एक 'हथकड़ी' और चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो भाइयों को देश की आज़ादी के लिए प्रेरित करती है।
Q3. भवानीप्रसाद मिश्र ने 'घर की याद' कविता कहाँ और कब लिखी थी?
भवानीप्रसाद जी ने यह मर्मस्पर्शी कविता 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल में लिखी थी, जहाँ सावन की बारिश को देखकर उन्हें अपने घर के 'चार भाई और चार बहनों' की बहुत याद आती है।
Q4. क्या मुझे रक्षाबंधन के लिए बहन पर दिल छू लेने वाली कविता (Heart touching poem for sister) मिल सकती है?
हाँ, 'मेरी बहिन' (जितेंद्र कुमार) और 'घर की याद' (भवानीप्रसाद मिश्र) दोनों ही बहन के प्यार पर आधारित अत्यंत भावुक कविताएँ हैं जिन्हें आप WhatsApp Status के रूप में उपयोग कर सकते हैं।

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“झाँसी की रानी” 1857 के विद्रोह को लोक-स्मृति, वीर रस और नारी शक्ति के रूप में रूपांतरित करने वाली अमर कविता है। झाँसी की रानी (Jhansi Ki Rani) केवल एक कविता नहीं, बल्कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम का 'विजय गीत' है। सुभद्रा कुमारी चौहान की यह रचना 1857 की क्रांति और नारी शक्ति का सर्वोच्च उदाहरण है। साहित्यशाला (Sahityashala) पर आज हम इस कविता का संपूर्ण पाठ (Full Text) , Hinglish Transliteration , और गहन विश्लेषण (Detailed Analysis) प्रस्तुत कर रहे हैं। "बुझा दीप झाँसी का..." – The fierce defense of Jhansi Fort. यह कविता हमें याद दिलाती है कि कैसे महिलाओं ने अपनी इच्छा से विद्रोह किया और इतिहास बदल दिया, ठीक वैसे ही जैसे हमने कुछ औरतों की विद्रोही कहानियों में पढ़ा है। Exam Relevance (UPSC / NET / Academic) विषय: 1857 का स्वतंत्रता संग्राम (History) साहित्य: वीर रस और राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा (Hindi Literature) महत्व: ...

Mahabharata Poem in Hindi: कृष्ण-अर्जुन संवाद (Amit Sharma) | Lyrics & Video

Last Updated: November 2025 Table of Contents: 1. Introduction 2. Full Lyrics (Krishna-Arjun Samvad) 3. Watch Video Performance 4. Literary Analysis (Sahitya Vishleshan) महाभारत पर रोंगटे खड़े कर देने वाली कविता Mahabharata Poem On Arjuna by Amit Sharma Visual representation of the epic dialogue between Krishna and Arjuna. This is one of the most requested Inspirational Hindi Poems based on the epic conversation between Lord Krishna and Arjuna. Explore our Best Hindi Poetry Collection for more Veer Ras Kavitayein. तलवार, धनुष और पैदल सैनिक कुरुक्षेत्र में खड़े हुए, रक्त पिपासु महारथी इक दूजे सम्मुख अड़े हुए | कई लाख सेना के सम्मुख पांडव पाँच बिचारे थे, एक तरफ थे योद्धा सब, एक तरफ समय के मारे थे | महा-समर की प्रतिक्षा में सारे ताक रहे थे जी, और पार्थ के रथ को केशव स्वयं हाँक रहे थे जी || रणभूमि के सभी नजारे देखन में कुछ खास लगे, माधव ने अर्जुन को देखा, अर्जुन उन्हें उदास लगे | ...

Chadhde Suraj Dhalde Dekhe Lyrics Meaning in Hindi – Baba Bulleh Shah | Sufi Qawwali

ज़िंदगी की हकीकत और वक्त के बदलाव को जितनी खूबसूरती से सूफी शायरों ने बयां किया है, शायद ही किसी और ने किया हो। बाबा बुल्लेशाह (Baba Bulleh Shah) की कलम से निकली यह रचना— "चढ़दे सूरज ढलदे देखे" —सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि जीवन का एक ऐसा फलसफा है जो इंसान को फर्श से अर्श और अर्श से फर्श तक के सफर की याद दिलाता है। एक तरफ ढलता हुआ सूरज और दूसरी तरफ जलता हुआ दीया—वक्त की करवट का प्रतीक। अक्सर जब हम तनम फरसूदा जां पारा (Tanam Farsooda) जैसी रूहानी रचनाओं को सुनते हैं, तो हमें अहसास होता है कि इंसान का गुरूर कितना क्षणभंगुर है। बुल्लेशाह का यह कलाम हमें सिखाता है कि वक्त बदलते देर नहीं लगती। जिस तरह नुसरत फतेह अली खान साहब ने तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी गाकर इश्क़ और इबादत का फर्क समझाया, उसी तरह यह कलाम हमें 'शुक्र' (Gratitude) का पाठ पढ़ाता है। इस लेख में हम इस कालजयी रचना के हिंदी बोल (Lyrics), उसके गूढ़ अर्थ और शब्दार्थ को विस्तार से समझेंगे। ...

100+ Hindi Proverbs & Their English Equivalents: The Ultimate Muhavare Guide

Home » English Literature » Hindi Proverbs & Idioms Have you ever tried to translate a Hindi Muhavara literally and ended up sounding ridiculous? You tell someone "My buffalo is dancing," and they look at you like you’ve lost your mind. That is the tragedy of literal translation. To truly master a language—whether you are analyzing the Eras of English Literature or cracking a joke in a Delhi metro—you need the soul of the saying, not just the body. Stop Saying "My Buffalo is Dancing"! Learn the correct English equivalents for famous Hindi idioms before your next exam. In 2010, the internet struggled to find the meaning of "Sau sonaar ki, ek lohaar ki." We are here to settle that debate once and for all. Whether you are a student eyeing the lucrative RBI Rajbhasha Adhikari Salary & Job Profile , a scholar researching Vidyapati...

Charkha Song Lyrics: Original Punjabi, English Translation & Meaning

Charkha Song Lyrics: Original Punjabi, English Translation & Meaning Traditional Punjabi Folk Masterpiece | Popularized by: Wadali Brothers, Lakhwinder Wadali, Mukhtar Sahota Looking for a specific section? Jump straight to: ↓ Original Punjabi Lyrics | ↓ Hindi Translation | ↓ English Translation | ↓ Deep Symbolism & Meaning Complete guide to Charkha lyrics, translations, and deep poetic explanation. Original Punjabi Lyrics Ve mahiya tere vekhan nu, Chuk charkha gali de vich paanwan, Ve loka paane main katdi, Tand teriyan yaadan de paanwan. Charkhe di oo kar de ole, Yaad teri da tumba bole. Ve nimma nimma geet ched ke, Tand kaat di hullare paanwan. Vassan ni de rahe saure peke, Mainu tere pain pulekhe. Ve hoon mainu das mahiya, Tere baaju kidhar main jaayan. Ho eid aayi, mera yaar na aaya, Tera ve khair h...