नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम
(Naya Ik Rishta Paida Kyun Karen Hum - John Elia)
उर्दू शायरी में जौन एलिया (Jaun Elia) का नाम एक ऐसे शायर के रूप में लिया जाता है जिन्होंने प्रेम की पीड़ा को कड़वाहट और बेबाकी के साथ पेश किया। उनकी यह ग़ज़ल रिश्तों के खोखलेपन, अलगाव और दुनियादारी पर एक गहरा व्यंग्य है।
जब कोई रिश्ता टूटने की कगार पर हो, तो उसे जबरदस्ती खींचना या उस पर तमाशा खड़ा करना जौन को गंवारा नहीं। आइये पढ़ते हैं यह मशहूर ग़ज़ल।
मूल ग़ज़ल (Original Lyrics)
नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम?
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम?
ख़मोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी,
कोई हंगामा बरपा क्यूँ करें हम?
ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं,
वफ़ा-दारी का दावा क्यूँ करें हम?
वफ़ा, इख़्लास, क़ुर्बानी, मोहब्बत,
अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँ करें हम?
सुना दे अस्मत-ए-मरियम का किस्सा,
पर इस बात को वाज़ह क्यूँ करें हम?
ज़लैख़ा-ए-अज़ीज़ां बात ये है,
भला घाटे का सौदा क्यूँ करें हम?
हमारी ही तमन्ना क्यूँ करो तुम?
तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँ करें हम?
किया था अहद जब लम्हों में हमने,
तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँ करें हम?
उठाकर क्यूँ न फेंके सारी चीज़ें,
फ़क़त कमरों में टहला क्यूँ करें हम?
नहीं दुनिया को जब परवाह हमारी,
तो फिर दुनिया की परवाह क्यूँ करें हम?
बरहना हैं सरे-बाज़ार तो क्या?
भला अंधों से पर्दा क्यूँ करें हम?
हैं बाशिंदे इसी बस्ती के हम भी,
तो खुद पर भी भरोसा क्यूँ करें हम?
पड़ी रहने दो इंसानों की लाशें,
ज़मीन का बोझ हल्का क्यूँ करें हम?
ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती,
यहाँ कार-ए-मसीहा क्यूँ करें हम?
कठिन शब्दों के अर्थ (Word Meanings)
- रस्म-ए-दूरी (Rasm-e-doori): अलग होने की रस्म / जुदाई का रिवाज।
- बरपा करना (Barpa): खड़ा करना, हंगामा मचाना।
- इख़्लास (Ikhlaas): निस्वार्थ प्रेम, शुद्धता, अपनापन।
- अस्मत-ए-मरियम: मरियम (Mother Mary) की पवित्रता।
- ईफ़ा (Eefa): वादा पूरा करना, निभाना।
- बरहना (Barahna): नग्न, बिना कपड़ों के (Naked/Exposed)।
- कार-ए-मसीहा (Kaar-e-Masiha): मसीहा (ईसा मसीह) जैसा काम, यानी मुर्दों को ज़िंदा करना या भलाई करना।
ग़ज़ल का भावार्थ और विश्लेषण (Analysis)
1. रिश्तों का मोहभंग (Nihilism in Relationships):
जौन एलिया की यह ग़ज़ल निराशावाद (Nihilism) की पराकाष्ठा है। शायर कहता है कि जब अंत में बिछड़ना ही है, तो हम नए रिश्ते बनाकर खुद को और दूसरों को धोखे में क्यों रखें? "झगड़ा क्यों करें हम" पंक्ति यह दर्शाती है कि शायर अब लड़ने-झगड़ने की ऊर्जा भी खो चुका है, वह बस शांति से अलग होना चाहता है।
2. समाज और धर्म पर व्यंग्य:
अंतिम शेर में जौन ने समाज की धार्मिक कट्टरता पर चोट की है— "ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती, यहाँ कार-ए-मसीहा क्यूँ करें हम?"। यानी, जहाँ लोग इंसानियत से ज़्यादा धर्म को महत्व देते हैं, वहां किसी को बचाने या भलाई (मसीहाई) करने का कोई फायदा नहीं है। यह शेर हबीब जालिब की क्रांतिकारी शायरी (दस्तूर) और हुक्मरान हो गए कमीने लोग जैसी तल्खी लिए हुए है।
3. वफ़ा और वादे:
शायर वफ़ा, कुर्बानी और मोहब्बत जैसे शब्दों को अब बेमानी मानता है। यह आधुनिक युग के "Use and Throw" रिश्तों का पूर्व-आभास है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
A: इस मशहूर ग़ज़ल के रचयिता जौन एलिया (John Elia) हैं।
A: इसका अर्थ है 'मसीहा जैसा काम', यानी किसी को जीवनदान देना या दूसरों के दुःख दूर करना।