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'ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं': क्या यह दिनकर की कविता है? सच जानें

Sach Hai Vipatti Jab Aati Hai: Lyrics, Bhavarth & PDF | Ramdhari Singh Dinkar

सच है, विपत्ति जब आती है (Sach Hai Vipatti Jab Aati Hai) - Ramdhari Singh Dinkar

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हिंदी साहित्य के ओजस्वी कवि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की यह रचना केवल एक कविता नहीं, बल्कि संघर्षों का सामना करने के लिए एक युद्धघोष है। 'रश्मिरथी' (Rashmirathi) के तृतीय सर्ग से ली गई यह पंक्तियाँ—"सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है"—आज भी निराश मन में आशा का संचार करती हैं।

जिस प्रकार प्रभु राम ने अपने जीवन में संघर्षों को गले लगाया, उसी प्रकार दिनकर जी हमें यह सिखाते हैं कि विपत्तियां केवल कमजोरों को डराती हैं, शूरवीर तो उनसे और निखरते हैं। यदि आप जीवन में हताश महसूस कर रहे हैं, तो मोटिवेशनल कविताओं की श्रेणी में यह रचना सबसे ऊपर आती है।

Sach Hai Vipatti Jab Aati Hai - Ramdhari Singh Dinkar Motivational Poem

Sach Hai Vipatti Jab Aati Hai Lyrics

सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
शूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।


मुख से न कभी उफ कहते हैं,
संकट का चरण न गहते हैं,
जो आ पड़ता सब सहते हैं,
उद्योग-निरत नित रहते हैं,
शूलों का मूल नसाने को,
बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।


है कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके वीर नर के मग में?
खम ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।

भावार्थ और विश्लेषण (Meaning & Analysis)

इस कविता में 'मानव जब जोर लगाता है' वाली पंक्ति हमें याद दिलाती है कि मनुष्य की इच्छाशक्ति के आगे पत्थर भी पानी बन सकता है। यह उसी तरह का ओज है जो हम हरिवंश राय बच्चन की कविताओं में देखते हैं, जहाँ लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती।

दिनकर जी प्रकृति के उदाहरणों का उपयोग करते हैं—जैसे मेंहदी और फूल। यदि आप प्रकृति पर हिंदी कविताएं पढ़ना पसंद करते हैं, तो आप पाएंगे कि दिनकर ने यहाँ प्रकृति को कोमलता का नहीं, बल्कि शक्ति का प्रतीक माना है।

गुण बड़े एक से एक प्रखर,
हैं छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो,
वर्तिका-बीच उजियाली हो।
बत्ती जो नहीं जलाता है,
रोशनी नहीं वह पाता है।


पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,
झरती रस की धारा अखण्ड,
मेंहदी जब सहती है प्रहार,
बनती ललनाओं का सिंगार।
जब फूल पिरोये जाते हैं,
हम उनको गले लगाते हैं।


वसुधा का नेता कौन हुआ?
भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?
अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?
नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?
जिसने न कभी आराम किया,
विघ्नों में रहकर नाम किया।


जब विघ्न सामने आते हैं,
सोते से हमें जगाते हैं,
मन को मरोड़ते हैं पल-पल,
तन को झँझोरते हैं पल-पल।
सत्पथ की ओर लगाकर ही,
जाते हैं हमें जगाकर ही।


वाटिका और वन एक नहीं,
आराम और रण एक नहीं।
वर्षा, अंधड़, आतप अखंड,
पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड।
वन में प्रसून तो खिलते हैं,
बागों में शाल न मिलते हैं।


कंकरियाँ जिनकी सेज सुघर,
छाया देता केवल अम्बर,
विपदाएँ दूध पिलाती हैं,
लोरी आँधियाँ सुनाती हैं।
जो लाक्षा-गृह में जलते हैं,
वे ही शूरमा निकलते हैं।


बढ़कर विपत्तियों पर छा जा,
मेरे किशोर! मेरे ताजा!
जीवन का रस छन जाने दे,
तन को पत्थर बन जाने दे।
तू स्वयं तेज भयकारी है,
क्या कर सकती चिनगारी है?

निष्कर्ष (Conclusion)

यह कविता हमें याद दिलाती है कि परिवर्तन तभी संभव है जब हम 'लाक्षा-गृह' में जलने का साहस रखें। चाहे वह बाबा नागार्जुन की जनवादी चेतना हो या रवींद्रनाथ टैगोर का दार्शनिक चिंतन, हर महान कवि ने संघर्ष को ही जीवन का सत्य माना है।

यहाँ तक कि मैथिली कोकिल विद्यापति के गीतों में भी प्रेम के साथ विरह का संघर्ष है। विपत्ति का यह 'सन्नाटा' हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि भवानी प्रसाद मिश्र के सन्नाटे की तरह हमें स्वयं से मिलाने के लिए आता है।

यदि आप भी ऐसी प्रभावशाली कविताएं लिखना चाहते हैं, तो हमारे इस लेख को जरूर पढ़ें: अच्छी कविता कैसे लिखें?

इस कविता को पीडीऍफ़ (PDF) में डाउनलोड करें:

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Frequently Asked Questions

"सच है विपत्ति जब आती है" कविता किस रसमिरथी सर्ग से है?

यह कविता रामधारी सिंह दिनकर के महाकाव्य 'रश्मिरथी' (Rashmirathi) के तृतीय सर्ग (Third Canto) से ली गई है।

इस कविता का मुख्य संदेश क्या है?

कविता का मुख्य संदेश है कि विपत्ति मनुष्य की परीक्षा लेती है। कायर इससे डरते हैं, लेकिन शूरवीर इसका डटकर सामना करते हैं और पत्थर को भी पानी बना देते हैं।

"मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है" का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है कि जब मनुष्य अपनी पूर्ण इच्छाशक्ति और परिश्रम (जोर) के साथ प्रयास करता है, तो असंभव कार्य (पत्थर) भी संभव (पानी) हो जाते हैं।

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