व्याल विजय: तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ - Ramdhari Singh Dinkar
जब हम राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar) की ओजस्वी लेखनी का स्मरण करते हैं, तो अक्सर हमारे मन में वीर रस की उग्र कविताएँ गूंज उठती हैं। लेकिन 'व्याल विजय' (Vyal Vijay) एक ऐसी अद्वितीय रचना है, जो अंधकार पर प्रकाश की और विष पर अमृत की अंतिम विजय का शंखनाद करती है।
भगवान श्रीकृष्ण और कालिया नाग के पौराणिक प्रसंग को आधार बनाकर रची गई यह कविता मात्र एक कथा नहीं है, बल्कि मानव मन के भीतर उठने वाले शंका और ईर्ष्या के विष को शांत करने का एक दार्शनिक गीत है। जैसे दिनकर जी की कृष्ण की चेतावनी में कुरुक्षेत्र का उग्र रूप दिखता है, वैसे ही यहाँ बाँसुरी के स्वर से त्रिलोक को वश में करने की शक्ति झलकती है। क्या आपने कभी सोचा है कि एक कोमल बाँसुरी कैसे भयंकर विषधर को नचा सकती है? आइए, इस अद्भुत रहस्य को समझें!
कविता: तान, तान, फण व्याल! (व्याल विजय)
झूमें झर चरण के नीचे मैं उमंग में गाऊँ. तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ। यह बाँसुरी बजी माया के मुकुलित आकुंचन में, यह बाँसुरी बजी अविनाशी के संदेह गहन में अस्तित्वों के अनस्तित्व में,महाशांति के तल में, यह बाँसुरी बजी शून्यासन की समाधि निश्चल में। कम्पहीन तेरे समुद्र में जीवन-लहर उठाऊँ तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ। अक्षयवट पर बजी बाँसुरी,गगन मगन लहराया दल पर विधि को लिए जलधि में नाभि-कमल उग आया जन्मी नव चेतना, सिहरने लगे तत्व चल-दल से, स्वर का ले अवलम्ब भूमि निकली प्लावन के जल से। अपने आर्द्र वसन की वसुधा को फिर याद दिलाऊँ. तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ। फूली सृष्टि नाद-बंधन पर, अब तक फूल रही है, वंशी के स्वर के धागे में धरती झूल रही है। आदि-छोर पर जो स्वर फूँका,दौड़ा अंत तलक है, तार-तार में गूँज गीत की,कण-कण-बीच झलक है। आलापों पर उठा जगत को भर-भर पेंग झूलाऊँ. तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।
जगमग ओस-बिंदु गुंथ जाते सांसो के तारों में, गीत बदल जाते अनजाने मोती के हारों में। जब-जब उठता नाद मेघ,मंडलाकार घिरते हैं, आस-पास वंशी के गीले इंद्रधनुष तिरते है। बाँधू मेघ कहाँ सुरधनु पर? सुरधनु कहाँ सजाऊँ? तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ। उड़े नाद के जो कण ऊपर वे बन गए सितारे, नीचे जो रह गए, कहीं है फूल, कहीं अंगारे। भीगे अधर कभी वंशी के शीतल गंगा जल से, कभी प्राण तक झुलस उठे हैं इसके हालाहल से। शीतलता पीकर प्रदाह से कैसे ह्रदय चुराऊँ? तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ। इस वंशी के मधुर तन पर माया डोल चुकी है पटावरण कर दूर भेद अंतर का खोल चुकी है। झूम चुकी है प्रकृति चांदनी में मादक गानों पर, नचा चुका है महानर्तकी को इसकी तानों पर। विषवर्षी पर अमृतवर्षिणी का जादू आजमाऊँ, तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ। यह बाँसुरी बजी, मधु के सोते फूटे मधुबन में, यह बाँसुरी बजी, हरियाली दौड गई कानन में। यह बाँसुरी बजी, प्रत्यागत हुए विहंग गगन से, यह बाँसुरी बजी, सरका विधु चरने लगा गगन से। अमृत सरोवर में धो-धो तेरा भी जहर बहाऊँ। तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ। यह बाँसुरी बजी, पनघट पर कालिंदी के तट में, यह बाँसुरी बजी, मुरदों के आसन पर मरघट में। बजी निशा के बीच आलुलायित केशों के तम में, बजी सूर्य के साथ यही बाँसुरी रक्त-कर्दम में। कालिय दह में मिले हुए विष को पीयूष बनाऊँ. तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ। फूँक-फूँक विष लपट, उगल जितना हों जहर ह्रदय में, वंशी यह निर्गरल बजेगी सदा शांति की लय में। पहचाने किस तरह भला तू निज विष का मतवाला? मैं हूँ साँपों की पीठों पर कुसुम लादने वाला। विष दह से चल निकल फूल से तेरा अंग सजाऊँ तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ। ओ शंका के व्याल! देख मत मेरे श्याम वदन को, चक्षुःश्रवा! श्रवण कर वंशी के भीतर के स्वर को। जिसने दिया तुझको विष उसने मुझको गान दिया है, ईर्ष्या तुझे, उसी ने मुझको भी अभिमान दिया है। इस आशीष के लिए भाग्य पर क्यों न अधिक इतराऊँ? तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ। विषधारी! मत डोल, कि मेरा आसन बहुत कड़ा है, कृष्ण आज लघुता में भी साँपों से बहुत बड़ा है। आया हूँ बाँसुरी-बीच उद्धार लिए जन-गण का, फन पर तेरे खड़ा हुआ हूँ भार लिए त्रिभुवन का। बढ़ा, बढ़ा नासिका रंध्र में मुक्ति-सूत्र पहनाऊँ तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।
भावार्थ और साहित्यिक विश्लेषण (Summary & Deep Meaning)
दिनकर जी ने इस कविता में केवल कालिया दमन का वर्णन नहीं किया है, अपितु इसे सृष्टि की उत्पत्ति, लय और जीवन के शाश्वत सत्य से जोड़ दिया है। जैसे महाभारत की कविताओं में धर्म और अधर्म का द्वंद्व है, वैसे ही यहाँ विष (नकारात्मकता) और बाँसुरी की तान (प्रेम और शांति) के बीच का अद्भुत संघर्ष दर्शाया गया है।
1. सृष्टि का नाद (The Cosmic Sound)
कवि कहते हैं कि यह वही बाँसुरी है जो अनादि काल से बज रही है। शून्यावस्था में, महाशांति के तल में जब सृष्टि का निर्माण हो रहा था, तब भी यही नाद गूंजा था। यह दर्शन हमें उर्वशी (Urvashi) जैसे महाकाव्य की दार्शनिक गहराई की याद दिलाता है। वंशी के स्वर के धागे में ही पूरी धरती झूल रही है।
2. विष पर अमृत की विजय
"कालिय दह में मिले हुए विष को पीयूष बनाऊँ" — श्रीकृष्ण कालिया नाग से कहते हैं कि तू जितना चाहे जहर उगल ले, मेरी बाँसुरी हमेशा शांति और प्रेम की लय में ही बजेगी। यह पंक्तियाँ हमें जीवन में आने वाले संकटों से लड़ने की प्रेरणा देती हैं। जब हम सच है विपत्ति जब आती है (Sach Hai Vipatti Jab Aati Hai) पढ़ते हैं, तो भी दिनकर जी यही संदेश देते हैं कि शूरवीर कभी विचलित नहीं होते। कृष्ण यहाँ शूरवीरता को बाँसुरी की मधुरता के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं।
3. अहंकार और ईर्ष्या का मर्दन
कृष्ण नाग से कहते हैं— "ओ शंका के व्याल! देख मत मेरे श्याम वदन को... जिसने दिया तुझको विष उसने मुझको गान दिया है।" यह संवाद बहुत ही गहरा है। परमात्मा ने अगर किसी को ईर्ष्या या क्रोध दिया है, तो किसी को उसे शांत करने का गान (प्रेम) भी दिया है। दिनकर की परशुराम की प्रतीक्षा और सिंहासन खाली करो कि जनता आती है जैसी कविताओं में भी हुंकार है, लेकिन 'व्याल विजय' की हुंकार में एक दिव्य शांति और जन-गण के उद्धार का संकल्प है।
"आया हूँ बाँसुरी-बीच उद्धार लिए जन-गण का, फन पर तेरे खड़ा हुआ हूँ भार लिए त्रिभुवन का।"
- यहाँ कृष्ण की लघुता (छोटा रूप) में भी उनकी विराटता के दर्शन होते हैं। ठीक वैसे ही जैसे रश्मिरथी सर्ग 1 और रश्मिरथी सर्ग 2 में कर्ण के साधारण दिखने वाले रूप के पीछे उसका विराट पौरुष छिपा था, या जैसे कहानी कर्ण की में उसके संघर्ष की गूंज है।
प्रामाणिक स्रोत एवं संदर्भ (Authoritative References)
वीडियो: तान तान फण व्याल कविता पाठ
Video Credit: साहित्य सौरभ / YouTube (Link)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. 'व्याल विजय' कविता के रचयिता कौन हैं?
'व्याल विजय' कविता महान हिंदी कवि एवं राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' जी द्वारा रचित है।
2. इस कविता का मुख्य विषय (Theme) क्या है?
इस कविता का मुख्य विषय भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कालिया नाग का दमन है, जिसे दिनकर जी ने बुराई (विष) पर अच्छाई (वंशी के अमृत स्वर) की जीत के एक दार्शनिक रूप में प्रस्तुत किया है।
3. "तान तान फण व्याल" पंक्ति में 'व्याल' का क्या अर्थ है?
'व्याल' का अर्थ होता है - सर्प या सांप। यहाँ व्याल शब्द का प्रयोग कालिया नाग और मानव मन के अंदर छिपे शंका व ईर्ष्या रूपी विषधर के लिए किया गया है।
निष्कर्ष (Conclusion)
रामधारी सिंह दिनकर जी की कविता 'व्याल विजय' मात्र एक बाल-लीला या पौराणिक कथा का पद्यानुवाद नहीं है। यह जीवन के चरम सत्यों का उद्घाटन करती है। यह बताती है कि सच्चे साधक या युग-प्रवर्तक के पास चाहे कितनी भी भयंकर चुनौतियां (कालिया नाग) क्यों न आएं, वह अपनी साधना, प्रेम और धैर्य (बाँसुरी) के बल पर उन्हें वश में कर ही लेता है।
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