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Kise Khabar Hai Ki Umr Bas Us Pe Ghaur - Tehzeeb Hafi Lyrics | Urdu Shayari

किसे ख़बर है कि उम्र बस उस पे ग़ौर करने में

Kise Khabar Hai Ki Umr Bas Us Pe Ghaur

Tehzeeb Hafi Shayari
Tehzeeb Hafi - Kise Khabar Hai Ki Umr Bas Us Pe Ghaur Shayari Lyrics

किसे ख़बर है कि उम्र बस उस पे ग़ौर करने में कट रही है
कि ये उदासी हमारे जिस्मों से किस ख़ुशी में लिपट रही है

ज़रूर पढ़ें: मेरी आधी उम्र गुज़र गई (इरफ़ान सत्तार) →

अजीब दुख है हम उस के हो कर भी उस को छूने से डर रहे हैं
अजीब दुख है हमारे हिस्से की आग औरों में बट रही है

(पढ़ें: पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा - तहज़ीब हाफ़ी)

मैं उस को हर रोज़ बस यही एक झूट सुनने को फ़ोन करता
सुनो यहाँ कोई मसअला है तुम्हारी आवाज़ कट रही है

(देखें: तेरा चुप रहना मेरे ज़हन में क्या बैठ गया)

मुझ ऐसे पेड़ों के सूखने और सब्ज़ होने से क्या किसी को
ये बेल शायद किसी मुसीबत में है जो मुझ से लिपट रही है

(सम्बंधित: बता ऐ अब्र मसावात क्यों नहीं करता)

ये वक़्त आने पे अपनी औलाद अपने अज्दाद बेच देगी
जो फ़ौज दुश्मन को अपना सालार गिरवी रख कर पलट रही है

सूफी कलाम: चढ़दे सूरज ढलदे देखे (बुल्ले शाह) →

सो इस त'अल्लुक़ में जो ग़लत-फ़हमियाँ थीं अब दूर हो रही हैं
रुकी हुई गाड़ियों के चलने का वक़्त है धुंध छट रही है

राहगीर की कविता: ये हम कौनसी गाड़ी पे चढ़ गए →


Roman Urdu / Hinglish Lyrics

Kise ḳhabar hai ki umr bas us pe ġhaur karne meñ kaT rahī hai
Ki ye udāsī hamāre jismoñ se kis ḳhushī meñ lipaT rahī hai

Ajiib dukh hai ham us ke ho kar bhī us ko chhūne se Dar rahe haiñ
Ajiib dukh hai hamāre hisse kī aag auroñ meñ baT rahī hai

Maiñ us ko har roz bas yahī ek jhuuT sunñe ko phone kartā
Suno yahāñ koī mas.ala hai tumhārī āvāz kaT rahī hai

Mujh aise peḌoñ ke sūkhne aur sabz hone se kyā kisī ko
Ye bel shāyad kisī musībat meñ hai jo mujh se lipaT rahī hai

Ye vaqt aane pe apnī aulād apne ajdād bech degī
Jo fauj dushman ko apnā sālār girvī rakh kar palaT rahī hai

So is ta'alluq meñ jo ġhalat-fahmiyāñ thiiñ ab duur ho rahī haiñ
Rukī huī gāḌiyoñ ke chalne kā vaqt hai dhundh chaT rahī hai

Ghazal Ka Matlab / Explanation

1. अकेलेपन का एहसास (Loneliness):
शायर तहज़ीब हाफ़ी कहते हैं कि "ये उदासी हमारे जिस्मों से किस ख़ुशी में लिपट रही है" - यानी इंसान इतना अकेला हो गया है कि उदासी ही उसकी साथी बन गई है, और यह उदासी उसे किसी अनजानी ख़ुशी की तरह गले लगा रही है।

2. रिश्तों में दूरी (Distance in Relations):
"हम उसके होकर भी उसको छूने से डर रहे हैं" - यह शेर आज के दौर के रिश्तों की सच्चाई बयां करता है, जहाँ नज़दीकियां होने के बावजूद रूहानी तौर पर लोग दूर हैं।

3. समाज और सियासत (Society & Politics):
"जो फ़ौज दुश्मन को अपना सालार गिरवी रख कर पलट रही है" - यहाँ शायर ने समाज और सियासत के उस कड़वे सच को उजागर किया है जहाँ लोग अपने फ़ायदे के लिए अपनी सुरक्षा और इज़्ज़त (सालार/नेता) तक को दुश्मनों के हाथों बेच देते हैं।

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