'हेमन्त में बहुधा घनों से' किसकी रचना है?
यह प्रश्न हिंदी साहित्य में अक्सर पूछा जाता है। इसका उत्तर है—राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त।
भारतीय किसान का जीवन एक तपस्या है। गुप्त जी की यह कविता हमें दिखाती है कि कैसे एक किसान नदी की धार के विपरीत बहकर भी अपना धर्म निभाता है। जिस तरह पुष्प की अभिलाषा त्याग की होती है, वैसे ही किसान अपना जीवन धरती मां के लिए समर्पित कर देता है।
नीचे हम इस कविता का हिंदी पाठ, Hinglish (Roman) अनुवाद और भावार्थ (Summary) पढ़ेंगे।
किसान (Kisan)
हेमन्त में बहुधा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
हेमन्त में बहुधा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है
हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ
आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में
बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा
देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे
घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा
तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं
बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है
है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है
तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते
सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है
मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है
Kisan Poem in Hinglish (Roman Script)
Poet: Maithilisharan Gupt
Hemant mein bahudha ghanon se purna rehta vyom hai
Paavas nishaon mein tatha hasta sharad ka som hai
Ho jaye achhi bhi fasal, par laabh krishakon ko kahan
Khaate, khawai, beej rin se hain range rakkhe jahan
Aata mahajan ke yahan wah ann saara ant mein
Adhpet khakar phir unhe hai kaanpna hemant mein
Dekho krishak shoshit, sukhakar hal tathapi chala rahe
Kis lobh se is aanch mein, ve nij shareer jala rahe
To bhi krishak maidan mein karte nirantar kaam hain
Kis lobh se ve aaj bhi, lete nahi vishram hain...
Kisan Poem Summary (Hinglish): Is kavita mein Maithilisharan Gupt ji ne bataya hai ki kisan har mausam mein—chahe wo Hemant ki thand ho ya garmi ki dhoop—mehnat karta hai. Lekin ant mein sara anaj Mahajan ke karz (loan) mein chala jata hai aur kisan ko bhookha rehna padta hai.
भावार्थ और विश्लेषण (Analysis)
मैथिलीशरण गुप्त ने इस कविता में प्रकृति और किसान के द्वंद्व को दर्शाया है।
- ऋतुओं का कोप: 'हेमन्त' में आकाश बादलों से भरा है। नागार्जुन की बादल को घिरते देखा है में जहाँ प्रकृति सुंदर है, यहाँ वही ठंड किसान के लिए जानलेवा है।
- कर्ज की पीड़ा: "आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में" - यह पंक्ति बताती है कि किसान बूढ़े पेड़ के दुख की तरह सब कुछ लुटाकर भी खाली हाथ रह जाता है।
- अडिग संकल्प: काश मैं वृक्ष होता, तो शायद दर्द कम होता। लेकिन किसान हाड़-मांस का होकर भी मशीन की तरह काम करता है।
हिंदी काव्य में रस, छंद और अलंकार का यह प्रयोग करुण रस का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे पढ़ने के बाद कदम्ब का पेड़ जैसी कविताओं की सरलता याद आती है, पर यहाँ यथार्थ की कठोरता है।
कविता पाठ सुनें (Watch Video)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'हेमन्त में बहुधा घनों से' किसकी रचना है?
यह कविता राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित है।
'किसान' कविता का मुख्य भाव क्या है?
यह कविता भारतीय किसान के शोषण, गरीबी और कठिन परिश्रम को दर्शाती है।
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