हिंदी साहित्य के आकाश में दुष्यंत कुमार वह नाम हैं जिन्होंने ग़ज़ल को महबूब की गलियों से निकालकर संसद के गलियारों और आम आदमी के संघर्ष तक पहुँचाया। जिस दौर में आधुनिक उर्दू ग़ज़ल अपने शिल्प और यथार्थ के नए प्रयोग कर रही थी, दुष्यंत कुमार हिंदी में एक नई आग पैदा कर रहे थे.
"मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए..." लिखने वाले दुष्यंत की एक और कालजयी रचना है—'इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है'। यह ग़ज़ल उनके संग्रह 'साये में धूप' से ली गई है और यह सिर्फ़ कविता नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति का सहारा है जो विषम परिस्थितियों में भी हार मानने को तैयार नहीं है.
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| The 'Jharjhar Naav' (dilapidated boat) and 'Tel se bheegi baati' (oil-soaked wick) symbolize the enduring spirit of resistance against the flow of the river. |
यदि आप दुष्यंत कुमार, विद्यापति और नागार्जुन की तुलना करें, तो पाएंगे कि दुष्यंत की भाषा सबसे ज्यादा बेबाक और सीधी चोट करने वाली है। आइए, इस बेहतरीन ग़ज़ल का पाठ करते हैं और इसके गहरे अर्थों को समझते हैं.
इस नदी की धार में (हिंदी ग़ज़ल)
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है.
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है.
आदमी की पीर गूँगी ही सही, गाती तो है.
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है.
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है.
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है.
Is nadi ki dhaar mein thandi hawa aati to hai,
Naav jarjar hi sahi, lehron se takraati to hai.
Ek chingari kahin se dhoond laao doston,
Is diye mein tel se bheegi hui baati to hai.
Ek khandhar ke hriday-si, ek jungli phool-si,
Aadmi ki peer goongi hi sahi, gaati to hai.
Ek chadar saanjh ne saare nagar par daal di,
Yeh andhere ki sadak us bhor tak jaati to hai.
Nirvachan maidan mein leti hui hai jo nadi,
Pattharon se, ot mein ja-jaake batiyati to hai.
Dukh nahi koi ki ab uplabdhiyon ke naam par,
Aur kuch ho ya na ho, aakash-si chaati to hai.
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| A visual tribute to the rebellious spirit of the ghazal, capturing the essence of the line "Ek chingari kahin se dhoond laao doston." |
भावार्थ और विस्तृत विश्लेषण (Analysis & Meaning)
दुष्यंत कुमार की यह ग़ज़ल हताशा और आशा के बीच के द्वंद्व (Dialectics) को बहुत खूबसूरती से पेश करती है। यह केवल हो गई है पीर पर्वत-सी की तरह सीधी क्रांति नहीं है, बल्कि यह धैर्य और सहनशीलता की कविता है.
1. संघर्ष का जज़्बा (The Spirit of Resistance)
"नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है..."
यहाँ 'नदी' उस व्यवस्था (System) या समय का प्रतीक है जो क्रूर हो सकता है, लेकिन उसमें भी कहीं न कहीं 'ठंडी हवा' यानी सुकून की गुंजाइश है। 'जर्जर नाव' हमारे सीमित संसाधनों या कमजोर स्थिति का प्रतीक है। कवि कहना चाहते हैं कि साधन चाहे कितने भी कमज़ोर क्यों न हों, महत्वपूर्ण यह है कि हम संघर्ष (लहरों से टकराना) छोड़ नहीं रहे हैं.
2. नेतृत्व की आवश्यकता (Need for Leadership)
"इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है..."
यह शेर सामाजिक बदलाव की तैयारी का संकेत है। 'तेल से भीगी हुई बाती' का अर्थ है कि समाज बदलाव के लिए तैयार है, जनता में ऊर्जा है। कमी सिर्फ एक 'चिंगारी' की है—एक ऐसे नेतृत्व या घटना की जो इस सुप्त ऊर्जा को क्रांति में बदल सके। यह भाव उनकी एक और ग़ज़ल कहाँ तो तय था चराग़ाँ से भी मेल खाता है, जहाँ वे उजाले की कमी पर प्रश्न उठाते हैं.
3. पीड़ा का सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics of Pain)
"आदमी की पीर गूँगी ही सही..."
दुष्यंत कुमार ने यहाँ मानवीय पीड़ा की तुलना 'खंडहर' और 'जंगली फूल' से की है। यह उपमा बताती है कि दुख में भी एक गरिमा होती है। भले ही आम आदमी का दर्द सत्ता के गलियारों तक न पहुँच पाए (गूँगी पीर), लेकिन उसका अपना अस्तित्व और अपना संगीत है। इस अकेलेपन की गूंज आप उनकी रचना आज वीरान अपना घर देखा में भी महसूस कर सकते हैं.
4. स्वाभिमान ही उपलब्धि है (Self-Respect as Achievement)
"और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है..."
अंतिम शेर (मक़्ता) में कवि भौतिक उपलब्धियों (Material Achievements) को नकारते हैं। जैसे उन्होंने मापदंड बदलो में कहा है, वैसे ही यहाँ भी वे कहते हैं कि सबसे बड़ी दौलत 'आकाश-सी छाती' यानी असीम साहस और स्वाभिमान है। यह पंक्ति उस 'आदमी' की पहचान है जो मुकम्मल बयान बनकर उभरता है.
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| Dushyant Kumar (1933–1975), whose voice brought the Ghazal form out of aristocratic courts and into the struggles of the common Indian man. |
साहित्यिक संदर्भ: हिंदी ग़ज़ल की परंपरा में स्थान
दुष्यंत कुमार ने जब यह ग़ज़ल लिखी, तब देश 1970 के दशक की राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा था। उस समय की निराशा (Disillusionment) के बीच यह ग़ज़ल एक 'थेरेपी' की तरह आई। जहाँ पारंपरिक उर्दू ग़ज़ल (मीर या ग़ालिब) में 'नाव' अक्सर इश्क़ के तूफ़ान में फँसी होती थी, दुष्यंत की 'नाव' रोटी और संसद की बहस के बीच फँसी है। यदि आप उनके व्यक्तिगत और रूमानी पक्ष को देखना चाहते हैं, तो ओ मेरी ज़िंदगी ज़रूर पढ़ें, जहाँ संघर्ष का एक अलग रंग दिखाई देता है.
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
ग़ज़ल पाठ (Recitation)
निष्कर्ष
दुष्यंत कुमार की "इस नदी की धार में" सिर्फ़ शब्दों का जमावड़ा नहीं, बल्कि एक विचार है। यह हमें सिखाती है कि पूर्णता (Perfection) का इंतज़ार मत करो। अगर नाव टूटी भी है, तो भी उसे पानी में उतारो। संघर्ष का सौंदर्य परिणाम में नहीं, प्रयास में है। साहित्यशाला पर आप दुष्यंत कुमार की ऐसी ही और भी कालजयी रचनाएँ पढ़ सकते हैं जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी 50 साल पहले थीं.
संदर्भ: रेख़्ता और हिन्दवी (प्रामाणिक पाठ सत्यापन हेतु)।


