अवधी साहित्य और हिंदी व्यंग्य की दुनिया में रफ़ीक शादानी (Rafeek Shadani) का नाम एक बेबाक आवाज़ के रूप में गूँजता है। उनकी कलम सिर्फ स्याही से नहीं, बल्कि आम आदमी के पसीने और गुस्से से चलती थी।
उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक, "जियौ बहादुर खद्दर धारी" (Jiyo Bahadur Khaddar Dhari), आज भी भारतीय राजनीति और समाज की विडंबनाओं पर एक करारा तमाचा है। जिस तरह पाकिस्तान में हबीब जालिब ने 'दस्तूर' लिखकर सत्ता को चुनौती दी थी, उसी तरह शादानी साहब ने इस कविता के माध्यम से 'खद्दर' (खादी) पहनने वाले भ्रष्ट नेताओं की पोल खोली है।
आइये, इस कालजयी व्यंग्य को पढ़ते हैं और इसके गहरे अर्थ को समझते हैं।
|
| "हम भूखा तू खाव सोहारी..." — The stark contrast between the ruler and the ruled. |
जियौ बहादुर खद्दर धारी!
शायर: रफ़ीक शादानी
ई मँहगाई ई बेकारी, नफ़रत कै फ़ैली बीमारी
दुखी रहै जनता बेचारी, बिकी जात बा लोटा-थारी।
जियौ बहादुर खद्दर धारी!
मनमानी हड़ताल करत हौ, देसवा का कंगाल करत हौ
खुद का मालामाल करत हौ, तोहरेन दम से चोर बज़ारी।
जियौ बहादुर खद्दर धारी!
धूमिल भै गाँधी कै खादी, पहिरै लागै अवसरवादी
या तो पहिरैं बड़े प्रचारी, देश का लूटौ बारी-बारी।
जियौ बहादुर खद्दर धारी!
तन कै गोरा, मन कै गन्दा, मस्जिद मंदिर नाम पै चंदा
सबसे बढ़ियाँ तोहरा धंधा, न तौ नमाज़ी, न तौ पुजारी
जियौ बहादुर खद्दर धारी!
सूखा या सैलाब जौ आवै, तोहरा बेटवा ख़ुसी मनावै
घरवाली आँगन मा गावै, मंगल भवन अमंगल हारी।
जियौ बहादुर खद्दर धारी!
झंडै झंडा रंग-बिरंगा, नगर-नगर मा कर्फ़्यू दंगा
खुसहाली मा पड़ा अड़ंगा, हम भूखा तू खाव सोहारी
जियौ बहादुर खद्दर धारी!
बरखा मा विद्यालय ढहिगा, वही के नीचे टीचर रहिगा
नहर के खुलतै दुई पुल बहिगा, तोहरेन पूत कै ठेकेदारी।
जियौ बहादुर खद्दर धारी!
|
| "बिकी जात बा लोटा-थारी..." — When inflation forces the common man to sell his dignity. |
काव्य विश्लेषण और सामाजिक संदर्भ (Analysis)
रफ़ीक शादानी की यह कविता अवधी भाषा में लिखी गई एक ऐसी व्यंग्यात्मक टिप्पणी है जो दशकों बाद भी प्रासंगिक है। यहाँ 'खद्दर धारी' शब्द उन राजनेताओं का प्रतीक है जो गाँधीजी के सादगी भरे वस्त्र (खादी) तो पहनते हैं, लेकिन उनके कर्म भ्रष्टाचार और शोषण से भरे हैं。
कवि ने बड़ी बेबाकी से दिखाया है कि कैसे आपदा (सूखा या बाढ़) में भी नेता अपना घर भरते हैं ("सूखा या सैलाब जौ आवै, तोहरा बेटवा ख़ुसी मनावै")। यह कटाक्ष हमें हबीब जालिब की रचना 'हुक्मरान हो गए कमीने लोग' की याद दिलाता है, जहाँ सत्ता के नशे में चूर शासकों की असलियत बयां की गई है。
शादानी साहब ने शिक्षा व्यवस्था और इंफ्रास्ट्रक्चर की बदहाली पर भी चोट की है ("बरखा मा विद्यालय ढहिगा"), जो आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों की सच्चाई है। ऐसी ही सामाजिक चेतना हमें इरफ़ान सत्तार और शोएब कियानी की नज़्मों में भी देखने को मिलती है。
साहित्यशाला पर अन्य बेहतरीन व्यंग्य रचनाएँ
- रफ़ीक शादानी साहब की अन्य कवितायेँ - अवधी के इस महान शायर का पूरा संग्रह।
- तुम चाहत हौ भाईचारा, उल्लू हौ! - शादानी साहब का एक और मशहूर व्यंग्य।
- एक शिकार इतने शिकारी (ओह-फ़ोह) - रफ़ीक शादानी की हास्य-व्यंग्य रचना।
अन्य रुचिकर ब्लॉग्स देखें: Finance Sahityashala | English Literature | Maithili Poems
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'जियौ बहादुर खद्दर धारी' कविता किसने लिखी है?
यह प्रसिद्ध व्यंग्य कविता अवधी भाषा के महान शायर रफ़ीक शादानी ने लिखी है।
'खद्दर धारी' का क्या अर्थ है?
शाब्दिक अर्थ में इसका मतलब है 'खादी पहनने वाला', लेकिन इस कविता में यह उन भ्रष्ट नेताओं के लिए प्रयुक्त हुआ है जो गाँधीवादी वेशभूषा की आड़ में जनता को लूटते हैं।