यह ग़ज़ल प्रेम के ख़त्म होने का मातम नहीं, बल्कि प्रेम के 'सभ्य' (Civilized) हो जाने की दास्तां है।
उर्दू अदब में अहमद फ़राज़ (Ahmad Faraz) उस मक़ाम पर खड़े हैं जहाँ रूमानियत हक़ीक़त से मिलती है। उनकी यह शाहकार ग़ज़ल "अब उसकी याद रात दिन" (Ab Uski Yaad Raat Din) बताती है कि जब दो लोग अलग होते हैं, तो ज़रूरी नहीं कि सिर्फ नफ़रत बचे—कभी-कभी एक ठहरा हुआ खालीपन भी बचता है।
साहित्यशाला के इस लेख में हम इस ग़ज़ल के Hindi और Hinglish Lyrics के साथ-साथ इसकी गहराई (Tashreeh) को भी समझेंगे। (ग़ज़ल की तकनीकी समझ के लिए हमारी पिंगल शास्त्र गाइड पढ़ें।)
Ab Uski Yaad Raat Din - Lyrics in Hindi
भले दिनों की बात थी
भली सी एक शक्ल थी
ना ये कि हुस्ने ताम हो
ना देखने में आम सी
ना ये कि वो चले तो कहकशां सी रहगुजर लगे
मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे
कोई भी रुत हो उसकी छब
फ़जा का रंग रूप थी
वो गर्मियों की छांव थी
वो सर्दियों की धूप थी
ना मुद्दतों जुदा रहे
ना साथ सुबहो शाम हो
ना रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद
ना ये कि इज्ने आम हो
ना ऐसी खुश लिबासियां
कि सादगी हया करे
ना इतनी बेतकल्लुफ़ी
की आईना हया करे
ना इखतिलात में वो रम
कि बदमजा हो ख्वाहिशें
ना इस कदर सुपुर्दगी
कि ज़िच करे नवाजिशें
ना आशिकी ज़ुनून की
कि ज़िन्दगी अजाब हो
ना इस कदर कठोरपन
कि दोस्ती खराब हो
कभी तो बात भी खफ़ी
कभी सुकूत भी सुखन
कभी तो किश्ते ज़ाफ़रां
कभी उदासियों का बन
सुना है एक उम्र है
मुआमलाते दिल की भी
विसाले-जाँफ़िजा तो क्या
फ़िराके-जाँ-गुसल की भी
सो एक रोज क्या हुआ
वफ़ा पे बहस छिड़ गई
मैं इश्क को अमर कहूं
वो मेरी ज़िद से चिढ़ गई
मैं इश्क का असीर था
वो इश्क को कफ़स कहे
कि उम्र भर के साथ को
वो बदतर अज़ हवस कहे
शजर हजर नहीं कि हम
हमेशा पा ब गिल रहें
ना ढोर हैं कि रस्सियां
गले में मुस्तकिल रहें
मोहब्बतें की वुसअतें
हमारे दस्तो पा में हैं
बस एक दर से निस्बतें
सगाने-बावफ़ा में हैं
मैं कोई पेन्टिंग नहीं
कि एक फ़्रेम में रहूं
वही जो मन का मीत हो
उसी के प्रेम में रहूं
तुम्हारी सोच जो भी हो
मैं उस मिजाज की नहीं
मुझे वफ़ा से बैर है
ये बात आज की नहीं
न उसको मुझपे मान था
न मुझको उसपे ज़ोम ही
जो अहद ही कोई ना हो
तो क्या गमे शिकस्तगी
सो अपना अपना रास्ता
हंसी खुशी बदल दिया
वो अपनी राह चल पड़ी
मैं अपनी राह चल दिया
भली सी एक शक्ल थी
भली सी उसकी दोस्ती
अब उसकी याद रात दिन
नहीं, मगर कभी कभी
Ab Uski Yaad Raat Din Lyrics in Hinglish
Bhale dino ki baat thi
Bhali si ek shakl thi
Na ye ki husn-e-taam ho
Na dekhne mein aam si
Na ye ki wo chale to kehkashan si rahguzar lage
Magar wo saath ho to phir bhala bhala safar lage
Koi bhi rut ho uski chhab
Fiza ka rang roop thi
Wo garmiyon ki chhanv thi
Wo sardiyon ki dhoop thi
Na muddaton juda rahe
Na saath subho-shaam ho
Na rishta-e-wafa pe zid
Na ye ki izn-e-aam ho
Na aisi khush libaasiyan
Ki saadgi haya kare
Na itni betakallufi
Ki aaina haya kare
Na ikhtilaat mein wo ram
Ki badmaza ho khwahishein
Na is qadar supurdagi
Ki zich kare nawazishein
Na aashiqui junoon ki
Ki zindagi azaab ho
Na is qadar kathorpan
Ki dosti kharaab ho
So ek roz kya hua
Wafa pe behas chhid gayi
Main ishq ko amar kahun
Wo meri zid se chidh gayi
So apna apna raasta
Hansi khushi badal diya
Wo apni raah chal padi
Main apni raah chal diya
Bhali si ek shakl thi
Bhali si uski dosti
Ab uski yaad raat din
Nahin, magar kabhi kabhi...
ग़ज़ल का मर्म और भावार्थ (Analysis)
अहमद फ़राज़ की यह नज़्म एक ऐसे रिश्ते की दास्तां है जो बहुत खूबसूरती से शुरू हुआ और उतनी ही संजीदगी (Maturity) के साथ खत्म हो गया। इसमें चीख-पुकार नहीं है, बल्कि एक धीमा दर्द है। शायर कहता है कि "अब उसकी याद रात दिन नहीं, मगर कभी-कभी" - यह पंक्ति ही इस रचना की जान है। यह स्वीकारोक्ति है कि हम अतीत से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाते।
एक ज़रूरी बात: यहाँ फ़राज़ की भाषा नज़ीर अकबराबादी की याद दिलाती है। हालाँकि फ़राज़ ग़ज़ल की क्लासिक परंपरा के शायर हैं, लेकिन यहाँ उन्होंने नज़ीर जैसी 'आवामी' (आम बोलचाल की) और बेबाक शैली अपनाई है।
मुख्य पंक्तियाँ: "वो गर्मियों की छांव थी, वो सर्दियों की धूप थी" - यह उपमा (Metaphor) दिखाती है कि महबूब का होना हर मौसम में सुकून देने वाला था। यह एहसास वैसा ही है जैसा अहमद सलमान की ग़ज़ल 'जो हम पे गुज़रे' में रंज और गम का ज़िक्र मिलता है, लेकिन फराज़ यहाँ गम को हावी नहीं होने देते, बल्कि उसे स्वीकार कर लेते हैं।
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नीचे प्रस्तुत पाठ/गायन इस ग़ज़ल की भावनात्मक परतों को और गहरा करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'अब उसकी याद रात दिन' ग़ज़ल किस शायर की है?
यह प्रसिद्ध ग़ज़ल जनाब अहमद फ़राज़ द्वारा लिखी गई है, जो पाकिस्तान के एक महान उर्दू शायर थे।
इस ग़ज़ल को एक 'Mature' (परिपक्व) रचना क्यों माना जाता है?
क्योंकि इसमें विरह का रोना नहीं है। यह ग़ज़ल स्वीकार करती है कि इश्क़ का खत्म होना बर्बादी नहीं, बल्कि जीवन का एक पड़ाव है। इसमें प्रेमी एक-दूसरे को दुआ देकर अलग होते हैं, जो इसे एक सभ्य रचना बनाता है।
क्या अहमद फ़राज़ की शायरी में रोमांस और दर्द दोनों हैं?
जी हाँ, अहमद फ़राज़ को 'इश्क़ और इंकलाब' दोनों का शायर माना जाता है। उनका कलाम युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय है।